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Pasmanda Muslim Reservation Case: पसमांदा मुसलमान 10% आरक्षण की मांग क्यों कर रहे हैं? SC में क्या-क्या हुआ

Supreme Court on Pasmanda Muslim OBC Reservation: भारत में मुस्लिम समुदाय के भीतर मौजूद सामाजिक असमानता और 'पसमांदा' (पिछड़े एवं दलित) वर्ग के आरक्षण का मुद्दा अब शीर्ष अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है। सोमवार, 23 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई हुई, जो आने वाले समय में देश की आरक्षण नीति और मुस्लिम समाज के आंतरिक ढांचे पर बड़ी बहस छेड़ सकती है।

दरअसल मोहम्मद वसीम सैफी द्वारा दायर याचिका में मांग की गई है कि मुस्लिम समाज के अति-पिछड़े वर्ग, जिन्हें 'पसमांदा' कहा जाता है, उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के भीतर सब-क्लासिफाईड कर 10% आरक्षण दिया जाए।

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चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता से बड़े डेटा की मांग की है। अदालत ने इस दौरान कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। विस्तार से जानिए क्या है पूरा मामला, कोर्ट ने सुनवाई में क्या कहा...

Pasmanda Muslim Reservation का क्या है पूरा मामला?

यह जनहित याचिका मोहम्मद वसीम सैफी की ओर से दायर की गई है। याचिका में मांग की गई है कि पसमांदा मुसलमानों को OBC के भीतर उप-वर्गीकरण (sub-classification) करते हुए 10% आरक्षण दिया जाए, ताकि सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदायों को वास्तविक लाभ मिल सके।

याचिका में 2007 के रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों का हवाला दिया गया है, जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की सिफारिश की गई थी। इसके साथ ही 2006 की सच्चर समिति रिपोर्ट को भी आधार बनाया गया है, जिसने देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को कमजोर बताया था।

Who Is Pasmanda Muslims: कौन हैं पसमांदा मुस्लिम?

'पसमांदा' का मतलब है पिछड़ा हुआ यानि पसमांदा मुसलमान वे समुदाय हैं जो सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े माने जाते हैं। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि उन्हें मुख्यधारा के आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश ने अदालत को बताया कि भारतीय मुस्लिम समाज तीन स्पष्ट वर्गों में बांटा हुआ है।

  • अशरफ (उच्च वर्ग): इनमें सैयद, पठान और मुगल जैसे समुदाय शामिल हैं जो खुद को विदेशी वंश का मानते हैं और सत्ता व संस्थानों पर काबिज हैं।
  • अज्लाफ (पिछड़ा वर्ग): ये हिंदू धर्म से धर्मांतरित पिछड़ी जातियों के लोग हैं जैसे बुनकर, कसाई और कारीगर।
  • अर्सल (दलित वर्ग): ये वे लोग हैं जो परंपरागत रूप से दलित माने जाते हैं और वाले या भारी श्रम जैसे लेबर, मजदूरी जैसे कामों से जुड़े हैं।

आखिर क्यों उठ रही है पासमांदा मुस्लिम आरक्षण की मांग?

अधिवक्ता अंजना प्रकाश ने दलील दी कि पसमांदा मुसलमान (अज्लाफ और अर्सल) देश की कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हैं, लेकिन शिक्षा, रोजगार, राजनीति और धार्मिक संस्थानों में उनका प्रतिनिधित्व बेहद कम है। याचिका के अनुसार, पसमांदा (अज्लाफ और अर्सल) भारत की कुल मुस्लिम आबादी का 80-85% हैं लेकिन शिक्षा, राजनीति और नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है। वर्चस्व केवल 'अशरफ' वर्ग का है।

इस याचिका में दो प्रमुख रिपोर्टों को आधार बनाया गया है। पहला सच्चर समिति (2006) की रिपोर्ट जिसने पहली बार आधिकारिक तौर पर माना था कि मुसलमानों की स्थिति दलितों से भी बदतर है और उनके भीतर भेदभाव की निगरानी के लिए 'समान अवसर आयोग' की जरूरत है।

यहां समझना होगा कि पसमांदा समुदायों में बुनकर, कारीगर, कसाई, सफाईकर्मी जैसे पारंपरिक पेशों से जुड़े लोग शामिल हैं जो दशकों से कमजोर और दलित वर्ग में आते हैं।

दूसरी रंगनाथ मिश्रा आयोग (2007) की रिपोर्ट। इस आयोग ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की स्पष्ट सिफारिश की थी।

सुनवाई के दौरान Supreme Court की अहम टिप्पणियां

गौरतलब है कि सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने आरक्षण के तकनीकी और नीतिगत पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एक समुदाय को चुनकर आरक्षण देना संवैधानिक रूप से जटिल है।

सामाजिक बनाम आर्थिक आधार को समझते हुए बेंच ने पूछा कि यदि पसमांदा को अलग से आरक्षण मिलता है, तो अन्य गरीब मुस्लिम समुदायों का क्या होगा? चूंकि ओबीसी आरक्षण सामाजिक और आर्थिक, दोनों मानदंडों पर टिका है।

अदालत ने सख्त टिप्पणी की कि अनुच्छेद 32 जो संवैधानिक उपचारों का अधिकार देता है और जिसके तहत याचिका दायर की गई है इस में किसी तरह के जटिल नीतिगत फैसले नहीं लिए जा सकते। किसी भी समुदाय को आरक्षण सूची में जोड़ना सरकार का काम है, जिसके लिए विस्तृत सर्वेक्षण और डेटा की आवश्यकता होती है।

आंध्र प्रदेश आरक्षण मामले से जुड़ेंगे तार?

यह मामला 2005 के उस कानून से जुड़ा है, जिसे आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से अनुरोध किया कि इस PIL को एक अन्य लंबित मामले 'स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश बनाम बी. अर्चना रेड्डी' के साथ जोड़ा जाए। इस मामले में संविधान पीठ यह तय कर रही है कि क्या आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग मानते हुए 4% आरक्षण दिया जा सकता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि आर्टिकल 32 के तहत दायर याचिका में इस तरह के व्यापक नीतिगत फैसले नहीं लिए जा सकते। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ यह तय कर रही है कि क्या मुसलमानों को सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ा मानकर अलग से आरक्षण दिया जा सकता है।

याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगें क्या हैं?

एडवोकेट विजय कसाना की सहायता से दायर इस याचिका में निम्नलिखित राहतें मांगी गई हैं:

  • केंद्र सरकार को सच्चर समिति की सिफारिशें तुरंत लागू करने का निर्देश दिया जाए।
  • पसमांदा मुसलमानों के लिए 10% आरक्षण सुनिश्चित हो।
  • ओबीसी के भीतर उप-वर्गीकरण के लिए एक वैधानिक आयोग गठित किया जाए।

अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों को सुनने के बाद उन्हें इस मुद्दे पर एक विस्तृत नोट और ठोस डेटा दाखिल करने के लिए समय दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है, क्योंकि यह सीधे तौर पर वोट बैंक और सामाजिक न्याय की नई परिभाषा तय कर सकता है।

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