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Part 2- मनोज वाजपेयी के फैमिली मैन-2 के पीछे की असली कहानी,क्या है श्रीलंका, लिट्टे, तमिल विवाद

पार्ट-1 से आगे- तमिल गुट के जो लोग अहिसंक लड़ाई लड़ रहे थे वो खुद के अधिकार और कुछ हद तक स्वायत्तता की मांग कर रहे थे लेकिन हिंसक गुट के लोग श्रीलंका में एक अलग देश की मांग कर रहे थे। दुनियाभर में तमिल बोलने वाले लोगों ने इन गुटों का समर्थन किया, इन्हें फंडिंग भी करते थे। सबसे ज्यादा चर्चित संगठन LTTE की बात करें तो उनका मुख्य नेता वेल्लुपिल्लई प्रभाकरन। इन लोगो की विचारधारा बिल्कुल साफ थी कि उन्हें एक अलग तमिल ईलम यानि अलग तमिल देश चाहिए था। एलटीटीआई के लोगों की ट्रेनिंग एकदम फौज के लोगों की तरह होती थी। ये लोग हमेशा अपने पास साइनाइट रखते थे और पकड़े जाने से पहले वो इसे खाकर अपनी जान दे देते थे। दुनिया में सबसे ज्यादा फिदायीन हमला (सुसाइड बॉम्बिंग) एलटीटीआई ने किए हैं। ये लोग पूर्वी और उत्तर श्रीलंका में अलग सरकार चला रहे थे। एलटीटीई ने अपनी नेवी और एयर फोर्स बनाई थी। यह दुनिया का एकमात्र आतंकी संगठन था जिसके पास एयरफोर्स थी। एलटीटीआई में महिलाएं भी शामिल थी, जिसमे से एक महिला ने भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी को आत्मघाती हमले में मार दिया था। एलटीटीई ने श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा को 1993 में आत्मघाती हमले में मार दिया था। 20 साल में एलटीटीआई ने श्रीलंका के 7 कैबिनेट मंत्रियों को इन लोगो ने मार दिया था।

क्या है LTTE यानि लिट्टे

क्या है LTTE यानि लिट्टे

तमिल गुट के जो लोग अहिसंक लड़ाई लड़ रहे थे वो खुद के अधिकार और कुछ हद तक स्वायत्तता की मांग कर रहे थे लेकिन हिंसक गुट के लोग श्रीलंका में एक अलग देश की मांग कर रहे थे। दुनियाभर में तमिल बोलने वाले लोगों ने इन गुटों का समर्थन किया, इन्हें फंडिंग भी करते थे। सबसे ज्यादा चर्चित संगठन LTTE की बात करें तो उनका मुख्य नेता वेल्लुपिल्लई प्रभाकरन। इन लोगो की विचारधारा बिल्कुल साफ थी कि उन्हें एक अलग तमिल ईलम यानि अलग तमिल देश चाहिए था। एलटीटीआई के लोगों की ट्रेनिंग एकदम फौज के लोगों की तरह होती थी। ये लोग हमेशा अपने पास साइनाइट रखते थे और पकड़े जाने से पहले वो इसे खाकर अपनी जान दे देते थे। दुनिया में सबसे ज्यादा फिदायीन हमला (सुसाइड बॉम्बिंग) एलटीटीआई ने किए हैं। ये लोग पूर्वी और उत्तर श्रीलंका में अलग सरकार चला रहे थे। एलटीटीई ने अपनी नेवी और एयर फोर्स बनाई थी। यह दुनिया का एकमात्र आतंकी संगठन था जिसके पास एयरफोर्स थी। एलटीटीआई में महिलाएं भी शामिल थी, जिसमे से एक महिला ने भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी को आत्मघाती हमले में मार दिया था। एलटीटीई ने श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा को 1993 में आत्मघाती हमले में मार दिया था। 20 साल में एलटीटीआई ने श्रीलंका के 7 कैबिनेट मंत्रियों को इन लोगो ने मार दिया था।

 भारत करता था LTTE का समर्थन

भारत करता था LTTE का समर्थन

वर्ष 1983 में एलटीटीई ने श्रीलंका के 13 फौजियों को मार दिया। इसके बाद पूरे श्रीलंका में दंगे भड़क गए और तकरीबन 3000 तमिल लोग मारे गए थे। जिसके बाद एलटीटीई और श्रीलंका की सेनाओं के बीच युद्ध शुरू हो गया। 1987 तक भारत सरकार ने तमिल गुट का समर्थन कर रही थी। यही नहीं एलटीटीई के लोगों को भारत में बुलाकर उन्हें ट्रेनिंग भी दी। तमिलनाडु में भी लोगों ने लोगों का समर्थन किया। भारत सरकार पर्दे के पीछे से एलटीटीई की मदद कर रही थी। 1987 में श्रीलंका सरकार ने ऑपरेशन लिबरेशन शुरू किया, जिसका मकसद एलटीटीई के नेता वडामराची को पकड़ना था। इस ऑपरेशन में कई श्रीलंका के तमिल मारे गए। इसके बाद भारत के तमिल लोगों ने सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करे। जिसके बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन गारलैंड शुरू किया। भारत सरकार ने शिप के जरिए खाना, तेल आदि भेजा लेकिन श्रीलंका की नौसेना ने इन शिप को रोक दिया, जिसके बाद भारत ने कार्गो प्लेन से यह मदद भेजी। भारत के इस कदम से श्रीलंका खुश नहीं था और उसने आरोप लगाया कि भारत ने हमारी सीमा का उल्लंघन किया। भारत ने इस मिशन के जरिए साफ कर दिया था कि हम सिर्फ खाना और मदद नहीं भेज रहे हैं, अगर हालात बिगड़े तो हम सेना भी भेज सकते हैं।

भारत क्यों नहीं कर सकता था LTTE के अलग देश की मांग का समर्थन

भारत क्यों नहीं कर सकता था LTTE के अलग देश की मांग का समर्थन

भारत एलटीटीई की अलग देश की मांग का समर्थन इसलिए भी नहीं कर सकता था क्योंकि अगर वह भाषा के आधार पर अलग देश का समर्थन करता तो उसे नागालैंड और पंजाब के खालिस्तान के लोगों को जवाब देना मुश्किल हो जाता। ये लोग भी इसी आधार पर अलग देश की मांग करते आए हैं। ऐसे में भारत चाहता था कि वह एलटीटीई की इतनी मदद करेगा कि श्रीलंका सरकार पर यह दबाव बने कि वह तमिल लोगों के लिए कुछ करे लेकिन इतनी मदद भी ना करे कि अलग देश बन जाए। यही वजह है कि श्रीलंका भारत खुश नहीं था और उसने पाकिस्तान, चीन, अमेरिका से मदद मांगनी शुरू कर दिया और श्रीलंका ने भारत से कहा कि वह एलटीटीआई की मदद करना बंद करे। जिसके बाद भारत और श्रीलंका के बीच समझौता हुआ।

भारत-श्रीलंका के बीच समझौता

भारत-श्रीलंका के बीच समझौता

1987 में श्रीलंका और भारत के बीच समझौता हुआ और श्रीलंका ने भारत से कहा कि वह एलटीटीई को मदद करना बंद कर दे। जिसके बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने जुलाई 1987 में समझौता किया। इस समझौते में भारत ने कहा कि आप तमिल लोगों को उनकी भाषा को स्वीकार करिए। पूर्वी और उत्तरी श्रीलंका के लोगों के अधिकारों को बढ़ाया जाए। उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका को एक कर दिया जाए, जिसके बाद हम पीस कीपिंग फोर्स भेजेंगे जो माहौल को बेहतर करने का काम करेगा। जिसे श्रीलंका ने स्वीकार कर लिया। ऐसे में जिस तरह से भारत ने इस पूरे मामले में हस्तक्षेप किया वह एलटीटीई को अच्छा नहीं लगा। तमाम गुटों ने हथियार डाल दिए लेकिन एलटीटीई ने हथियार डालने से इनकार कर दिया।

1000 भारतीय जवान मारे गए

1000 भारतीय जवान मारे गए

भारत ने जब श्रीलंका में ऑपरेशन पवन के तहत पीस कीपिंग फोर्स को भेजा तो एलटीटीई ने भारत की फौज पर हमला करना शुरू कर दिया। दरअसल एलटीटीआई का मानना था कि भारत उनकी तरफ से श्रीलंका के साथ क्यों समझौता कर रहा है, पहले भारत एलटीटीई का समर्थन करता था और अब वह श्रीलंका का समर्थन कर रहा है। शुरुआत में भारतीय सेना ने जाफना से एलटीटीई की सेना को खदेड़ दिया, बाद में एलटीटीआई ने गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया। 1987 से 1990 तक भारत की सेना यहां रही। इस दौरान हुई हिंसा में जाफना के कई तमिल मारे गए, जिसके चलते भारतीय सेना तमिल के बीच काफी बदनाम हो गई थी। तीन साल चले पीस कीपिंग फोर्स और तमिल के बीच चले युद्ध में 1000 से ज्यादा भारतीय सैनिक मारे गए और 1000 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े।

राजीव गांधी की हत्या

राजीव गांधी की हत्या

इस बीच भारत भारत में राजीव गांधी की सरकार गिर गई थी, श्रीलंका में सिंहला लोग इस बात का विरोध करने लगे कि भारत की फौज तीन साल से श्रीलंका में क्यों है। सिंहला के विरोध के चलते श्रीलंका ने भारत से अपनी सेना वापस ले जाने को कहा और भारत ने अपनी सेना को वापस बुला लिया। 1991 में फिर से भारत में चुनाव होना था और राजीव गांधी का जीतना लगभग तया था। ऐसे में एलटीटीई को लगता था कि अगर राजीव गांधी जीतते हैं तो फिर से वह श्रीलंका में सेना को भेजेंगे और वह हमसे युद्ध करेगा। यही वजह है कि एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या कर दी। राजीव गांधी की हत्या के बाद ईलम युद्ध चलता रहा। 1999 में श्रीलंका की तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रिका कुमारतुंगा पर हमला किया था, इस हमले में कुमारतुंगा बच गई लेकिन उनकी एक आंख चोटिल हो गई थी।

2009 में मारा गया LTTE चीफ प्रभाकरन, खत्म हुआ सिविल वॉर

2009 में मारा गया LTTE चीफ प्रभाकरन, खत्म हुआ सिविल वॉर

21वीं शताब्दी में 9/11 हुआ, जिसके बाद अमेरिका ने दुनियाभर में आतंकियों के खिलाफ मुहिम छेड़ दिया। अमेरिका ने दुनियाभर के देशों को आतंकवाद के खिलाफ अपना समर्थन देना शुरू कर दिया। हालांकि प्रभाकरन का कहना था कि वह किसी धर्म के लिए लड़ाई नहीं लड़ रहा है। वह सरकार से अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है। यहां तक कि प्रभाकरन ने ओसामा बिन लादेन की खुलकर आलोचना की थी। लेकिन जिस तरह से अमेरिका ने श्रीलंका का साथ दिया उसके बाद एलटीटीई ने श्रीलंका के साथ शांति समझौता किया। इसमे नॉर्वे ने मध्यस्थता की। 2002 में एलटीटीई और श्रीलंका के बीच शांति समझौता हुआ। इस समझौते ने पहली बार एलटीटीई ने अलग देश की मांग को दरकिनार कर दिया और राज्य सरकार को ताकतवर बनाने की मांग की, जिसे श्रीलंका की सरकार ने स्वीकार कर लिया। 2004 तक इसपर बात चलती रही। लेकिन 2004 में एलटीटीई का कहना था कि श्रीलंका की सरकार शांति समझौते की शर्तों का पालन नहीं कर रही है। इसी बीच एलटीटीआई में दो गुट हो गए, एलटीटीई के वरिष्ठ कमांडर करुणा ने एलटीटीई को छोड़ श्रीलंका सरकार के साथ हाथ मिला लिया। 2004 में सुनामी आने के बाद एलटीटीई ने आरोप लगाया कि सरकार बाहर से आ रही मदद हमे नहीं दे रही है। जिसके बाद एक बार फिर से ईलम युद्ध छिड़ गया। 2005 में श्रीलंका के विदेश मंत्री की हत्या कर दी गई जोकि तमिल थे। लेकिन मई 2009 में श्रीलंका की सेना ने एलटीटीई को हरा दिया और प्रभाकर को मार गिराया। जिसके बाद सिविल वॉर खत्म हो गया।

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