Part 1- मनोज वाजपेयी के फैमिली मैन-2 के पीछे की असली कहानी,क्या है श्रीलंका, लिट्टे, तमिल विवाद
नई दिल्ली। मनोज वाजपेयी की हालिया रिलीज वेब सीरीज फैमिली मैन-2 काफी चर्चा में है। सीरीज में भारत और श्रीलंका के बीच तमिल मुद्दे को दिखाया गया है और किस तरह से सामंथा सीरीज में एक लिट्टे की आतंकी की भूमिका में नजर आती हैं और अपनी एक्टिंग की वजह से वह काफी चर्चा में हैं। कई लोग ऐसे होंगे जिन्हें समझ नहीं आया होगा आखिर क्यों सामंथा जो सीरीज में राजी का रोल कर रही हैं वह हेलीकॉप्टर से सुसाइड अटैक करने जाती हैं और भारत के प्रधानमंत्री को मारना चाहती हैं। ऐसे में आइए डालते हैं एक नजर उस इतिहास पर जिसमे ना सिर्फ भारत के एक हजार से अधिक सैनिक शहीद हुए,बल्कि देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या भी हुई। इस पूरे घटनाक्रम को जानने के लिए आपको श्रीलंका के इतिहास को समझना जरूरी है और क्यों भारत के तमिल और श्रीलंका के तमिल लोगों के बीच एक जबरदस्त नाता है।

श्रीलंका में मुख्य रूप से दो धर्म के लोग
श्रीलंका में मुख्य रूप से दो धर्म के लोग रहते हैं। उत्तर और पूर्व के इलाके में तमिल बोलने वाले लोगों का राज्य हैं और ये हिंदू धर्म के हैं। जिसमे जाफना एक अहम हैं। वहीं दक्षिण श्रीलंका की बात करें तो यहां मुख्य रूप से सिंहला भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं और ये लोग बौद्ध धर्म के हैं। श्रीलंका की इस समय कुल आबादी 2.1 करोड़ है जिसमे तकरीबन 75 फीसदी लोग सिंहला भाषा बोलते हैं, 11.2 फीसदी लोग तमिल बोलने वाले हैं। वहीं तकरीबन 70 फीसदी लोग बौद्ध धर्म को मानने वाले, 12.6 फीसदी लोग हिंदू धर्म को मानने वाले और 9.7 फीसदी लोग इस्लाम धर्म को मानने वाले हैं।

भारत और श्रीलंका के तमिल लोगों का संबंध
सदियों से श्रीलंका में छोटे-छोटे किंगडम थे, लेकिन 16वीं शताब्दी के बाद यहां उपनिवेशवाद शुरू हुआ। जब सिलोन (श्रीलंका का पुराना नाम) ब्रिटिश राज आया तो उस समय 30 लाख बौद्ध धर्म के लोग थे और 3 लाख तमिल के लोग थे। लेकिन इस आबादी में बदलाव देखने को तब मिला जब अंग्रेज भारत से तकरीबन 10 लाख लोगों को मजदूर के तौर पर श्रीलंका लेकर आए। शुरुआत में ये लोग कॉफी प्लांट में काम करते थे। लेकिन एक बीमारी के बाद कॉफी की खेती बर्बाद हो गई जिसके बाद ये लोग चाय के बागान में काम करने लगे। चाय का व्यापार इतना बढ़ा और फायदे का बिजनेस बन गया कि अंग्रेजो ने तमिल लोगों को यहां हमेशा के लिए बसाना शुरू कर दिया। श्रीलंका में बहुत पहले से गुलामी चलती थी और लोग गुलाम के तौर पर तंबाकू की खेती में काम करते थे। लेकिन श्रीलंका पर दूसरे देशों का प्रभाव नहीं पड़े और अंग्रेजों का शासन बना रहे इसके लिए ब्रिटिश सरकार ने अपने हित के लिए यहां दासता को खत्म किया। जिसके चलते तंबाकू की खेती भी बंद हो गई। दासता खत्म होने के बाद तमिल लोगों ने पढ़ाई की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया। अंग्रेजो के काल में तमिल के लोग सबसे ज्यादा प्रशासनिक सेवा में थे, ये लोग उच्च पदों से लेकर छोटे पदों तक पर काबिज थे। इसकी बड़ी वजह यह है कि तमिल लोग अधिक पढ़े लिखे होते थे। उत्तरी श्रीलंका में जाफना सहित आस-पास के शहरों में शिक्षण संस्थान काफी थे, मिशनरी स्कूल और संस्था भी बहुत थे और तमिल लोगों ने पढ़ाई पर ध्यान दिया।

तमिल लोगों को दी गई वरीयता
दरअसल भारत में मद्रास अंग्रेजों का काफी पुराना उपनिवेश था और यहां रहने वाले तमिल लोगों से अंग्रेजों की अच्छे संबंध थे। जिसकी वजह से इन लोगों को अंग्रेजों ने प्रशासन में अहम पदों पर कामकाज संभालने का मौका दिया। श्रीलंका के जाफना में भी कई अमेरिकी मिशनरी थी जो तमिल लोगों का धर्म बदलना चाहते थे और उन्होंने यहां कई अच्छे शिक्षण संस्थान भी शुरू किए। यही वजह थी कि अंग्रेज यह मानते थे कि जाफना के लोग काफी पढ़े लिखे और एडवांस हैं। जिसके चलते तमिल लोगों को अंग्रेजों ने बढ़ाना शुरू कर दिया और ईसाई धर्म को बढ़ावा देने लगे। 1948 में जब श्रीलंका को आजादी मिली तो उसके बाद 1955 में श्रीलंका के प्रधानमंत्री ने ऐलान किया कि देश में सिंहला और तमिल बोलने वाले लोगों को बराबर का दर्जा दिया जाएगा। जिसके विरोध में सिंहला लोग प्रदर्शन करने लगे। इनका मानना था कि इतने साल तक हम दबे-कुचले थे और अब जब हमे सत्ता मिली है तो कम से कम सिंहला और बौद्ध धर्म के लोगों को बढ़ावा देना चाहिए।

ब्रिटिश सरकार की दोहरी रणनीति का दुष्प्रभाव
श्रीलंका में बहुसंख्यक आबादी सिंहला की है बावजूद इसके अहम पदों पर तमिल लोग थे। ब्रिटिश सरकार में नीति लाई गई कि कुछ सीटें सिंहला, तमिल, मुस्लिम धर्म के लोग होंगे। लेकिन 1948 में आजाद होने के बाद श्रीलंका में लोकतंत्र आया और लोकतंत्र में उसी की सरकार होती है जो बहुसंख्यक होता। यह नीति ब्रिटेन में तो अच्छी थी क्योंकि वहां अधिकतर आबादी ईसाई धर्म के लोगों की हैं और अंग्रेजी भाषा ही बोली जाती है। लेकिन भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान जैसे देशों में जहां एक ही धर्म के लोग या फिर एक भाषा बोलने वाले लोग बहुसंख्यक हैं वहां यह काफी मुश्किल हो जाता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि जहां बहुसंख्यक लोग होंगे वहां सरकार में उनकी भागीदारी सबसे ज्यादा होगी और वो अपनी सहूलियत के हिसाब से कानून बनाएंगे। जबकि इससे इतर अल्पसंख्यक जिनकी आबादी 15-20 फीसदी होती है उनके लिए अपनी सहूलियत के हिसाब से कानून बनाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।

तमिल लोगों के साथ भेदभाव
श्रीलंका आजाद होने के बाद सिंहला लोगों ने अपने समुदाय को आगे लाने के लिए नीतियां बनाई, जिससे कि सिंहला लोगों को नौकरी, शिक्षण संस्थानों और सरकार में अधिक जगह मिले। 1956 में सिंहला भाषा को आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया। जबकि इससे पहले अंग्रेजी भाषा आधिकारिक भाषा थी। ऐसे में जो तमिल बोलने वाले लोग थे उनकी मुश्किल बढ़ गई, वो अचानक से अंग्रेजी और तमिल से सिंहला नहीं सीख सके, उन्हें नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। वहीं स्कूल और कॉलेज में भी सिंहला बोलने वालों को वरीयता दी गई। कॉलेज में तमिल छात्र काफी ज्यादा नंबर लाते थे यही वजह है कि इस तरह की नीति बनाई गई कि सिंहला बोलने वालों को एडमिशन मिले, इसके लिए मेरिट को कम किया गया। इन नीतियों के चलते तमिल लोग अच्छी शिक्षा हासिल नहीं कर पाए, अच्छे और मेधावी छात्र को भेदभाव का शिकार होना पड़ा और इन लोगों ने राजनीतिक एक्टिविज्म, विद्रोह का रास्ता चुना और हिंसक गुट से जुड़ने लगे। यही नहीं तमिल मैग्जीन, न्यूज पेपर, फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। जिसके बाद तमिल और सिंहला के बीच विवाद होने लगा। पहले तमिल अपने अधिकार के लिए मुख्य रूप से अहिंसक लड़ाई लड़ते रहे। लेकिन 1970 के लोगों ने हथियार उठाना शुरू कर दिया। तकरीबन 15-20 संगठनों ने हिंसक गुट बनाया और हथियार उठाया। इसमे से एक सबसे बड़ा गुट एलटीटीई यानि लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम।
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