Pahalgam Attack: 'मेरे पापा कलमा नहीं पढ़ पाए, तो आतंकियों ने गोली मार दी', पहलगाम में एक बर्बरता की कहानी
Pahalgam Attack Kalma Killing Update: 'मेरे पापा कलमा नहीं पढ़ पाए, इसलिए आतंकियों ने उन्हें गोली मार दी... मैं उनके पास ही खड़ी थी।'... यह अलफाज हैं 13 साल की लक्षिता के, जिसकी आंखों के सामने उसके पिता की हत्या हुई। कश्मीर के पहलगाम की हसीन वादियों में एक परिवार छुट्टियां मनाने आया था - लेकिन लौटकर उनके पास केवल एक ताबूत है और टूटे हुए सपने।
रायपुर के व्यवसायी दिनेश मीरानिया को आतंकवादियों ने उनकी 13 वर्षीय बेटी के सामने इसलिए गोली मार दी क्योंकि वह 'कलमा' नहीं पढ़ सके।

यात्रा जो कभी पूरी नहीं हुई
दिनेश मीरानिया पिछले 12 वर्षों से माता वैष्णो देवी के दर्शन करना चाहते थे। इस बार पूरा परिवार - पत्नी नेहा, बेटा शौर्य (18), और बेटी लक्षिता (13) - यात्रा पर निकला था। जम्मू में कथा सुनने के बाद वे पहलगाम पहुंचे, और फिर बैसरन के घास के मैदान में समय बिता रहे थे। तभी एक पल में, सब बदल गया।
आतंक की आंधी
बेटी लक्षिता के सामने एक हथियारबंद आतंकी ने मीरानिया से 'कलमा पढ़ने' (Kalma Killing)को कहा। दिनेश ऐसा नहीं कर पाए। आतंकियों ने मौके पर ही गोली मार दी। उनके पीछे खड़े एक अन्य व्यक्ति ने भी ऐसा ही प्रयास किया, लेकिन असफल रहा - और उसे भी मार दिया गया। केवल वह व्यक्ति बचा जिसे 'कलमा पढ़ना आता था' - वही शख्स लक्षिता को नीचे सुरक्षित स्थान तक ले गया।
बेटा शौर्य - 'पापा की मौत मेरे सामने नहीं हुई, लेकिन उनकी खून से सनी टोपी मेरे हाथ में थी'
शौर्य उस समय भोजन काउंटर पर था। गोली की आवाज सुनी, खून अपने चेहरे पर महसूस किया, और फिर जान बचाने के लिए टेबल के नीचे छुप गया। जब वह अपनी बहन और पिता की तलाश में निकला, तो कुछ ही घंटों बाद उसे सूचना मिली - उसके पिता अब जीवित नहीं थे।
मां नेहा - 'सरकार उन्हें शहीद का दर्जा दे'
नेहा मीरानिया की आंखों में आंसू और आवाज में हौसला था जब उन्होंने कहा कि उनके पति आम नागरिक नहीं, बल्कि एक आतंक पीड़ित 'शहीद' हैं। 'उन्होंने देश में धार्मिक कट्टरता और आतंक के खिलाफ एक कीमत चुकाई है।'
वह चाहती हैं कि सरकार, उनके पति को शहीद का दर्जा दे, परिवार को आर्थिक सहायता और सुरक्षा दे, और सबसे अहम - इस बर्बरता को अंजाम देने वाले आतंकियों को सज़ा दिलवाए।
यह एक धार्मिक हत्या थी - क्या हम अब भी चुप रहेंगे?
एक ऐसा अपराध जहाँ किसी को उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर मार दिया गया - यह केवल आतंक नहीं, धार्मिक सफाए की रणनीति है। इस घटना ने 1989 के कश्मीरी पंडित नरसंहार की याद ताज़ा कर दी, जब लाखों हिंदुओं को घाटी छोड़नी पड़ी थी।
यह सवाल अब हर भारतीय से पूछा जाना चाहिए - 'क्या पहलगाम में दिनेश मीरानिया की हत्या के बाद भी हम पाकिस्तान को आतंक का गढ़ मानने से हिचकिचाएंगे?'
दिनेश मीरानिया अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बेटी, बेटा और पत्नी की गवाही - भारत के संविधान, धर्मनिरपेक्षता और मानवता पर एक कड़ा सवाल है। क्या हम इस घटना को यूं ही भुला देंगे? या इस बार, हम ठान लेंगे कि भारत में अब किसी लक्षिता को अपने पिता को इस तरह खोना न पड़े।












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