पद्मश्री हरेकाला हजाब्बा जिन्होंने कैसे फल बेच शिक्षा की अलख जगाई

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सोमवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में अलग-अलग क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम के लिए लोगों को पद्म सम्मानों से नवाज़ा.

2020 के लिए 119 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. इनमें से 7 लोगों को पद्मविभूषण, 10 को पद्मभूषण और 102 को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया. पद्म पुरस्कार देने का यह समारोह इस बार दो दिनों तक चलना है. मंगलवार को साल 2021 के लिए 141 लोगों को पद्म पुरस्कार दिए जाने हैं.

Padmashree Harekala Hajabba, who built the school by selling fruits

पद्म पुरस्कारों की घोषणा हर साल गणतंत्र दिवस के मौके पर 25 जनवरी को की जाती है. और इसे अप्रैल में दिए जाते हैं पर कोरोना महामारी के कारण 2020 और 2021 के पुरस्कार तय समय पर नहीं दिए जा सके थे. इसलिए 2020 और 2021 दोनों साल के पद्म विजेताओं का एक साथ सम्मान किया जा रहा है.

सोमवार को साल 2020 के लिए जिन लोगों को पद्म सम्मान दिए गए, उनमें से कइयों की पृष्ठभूमि बेहद मामूली हैं. लेकिन इनके हौसले और इनका काम इन्हें असाधारण लोगों की पांत में खड़ा कर देता है. ऐसे ही लोगों में से एक हैं कर्नाटक के हरेकाला हजाब्बा.

निरक्षर होकर भी शिक्षा का महत्व समझने वाले हरेकाला हजाब्बा ने अपनी जमा पूंजी से बेंगलुरू के पास अपने गांव में साल 2000 में एक स्कूल खोला था. पद्मश्री मिलने के बाद सोमवार को सोशल मीडिया पर कई लोग इनके बारे में चर्चा करते देखे गए. लोग इनकी बड़ी सोच, कड़ी मेहनत और इनके संघर्षों की दास्तान की ख़ूब तारीफ़ कर रहे थे.

https://twitter.com/Abhinav_Pan/status/1457650769579155461?s=20

पेशे से फल विक्रेता हरेकाला हजाब्बा के बारे में अब से क़रीब 9 साल पहले, बीबीसी ने 'फल बेचकर जगा रहे शिक्षा का अलख' शीर्षक से एक एक रिपोर्ट की थी. 14 नवंबर, 2012 को बीबीसी की वेबसाइट 'बीबीसीडॉटकॉम'पर प्रकाशित वो ख़बर आज हम आपसे साझा कर रहे हैं-

फल बेचकर जगा रहे शिक्षा का अलख

दक्षिण भारत के एक गरीब निरक्षर फल बेचने वाले हरेकाला हजाब्बा ने सीमित संसाधनों के साथ जो कर दिखाया है वो राज्य सरकारें और कई संगठन अक्सर मिलकर भी नहीं कर पाते.

हरेकाला हजाब्बा ने फल की अपनी छोटी-सी दुकान से हुई आमदनी से अपने गांव के बच्चों के लिए प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल बनवाया है.

बंगलौर से 350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित न्यूपाड़पू गांव में सड़कें बदहाल हैं और जगह-जगह पर कीचड़ हैं, लेकिन स्कूल जाने को तैयार 130 बच्चों की फौज के लिए ये मुश्किलें कोई मायने नहीं रखतीं.

साल 2000 तक इस गांव में एक भी स्कूल नहीं था, लेकिन 150 रुपए प्रतिदिन कमाने वाले हरेकाला हजाब्बा ने अपनी जमा पूंजी से गांव में पहला स्कूल बनवाया. इसे अब दक्षिण कन्नड़ ज़िला पंचायत हाई स्कूल के नाम से जाना जाता है.

स्कूल खोलने की प्रेरणा

स्कूल खोलने की प्रेरणा उन्हें आख़िर कहां से मिली, इस बारे में पचपन (अब 64) वर्षीय हजाब्बा ने बताया, "एक बार एक विदेशी ने मुझसे एक फल का नाम अंग्रेज़ी में पूछा तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं निरक्षर हूं. मुझे नहीं पता था कि इसका क्या मतलब है."

वो कहते हैं, ''तब मुझे ये ख्याल आया कि गांव में एक प्राइमरी स्कूल होना चाहिए, ताकि हमारे गांव के बच्चों को कभी उस स्थिति से गुज़रना न पड़े, जिससे मैं गुज़रा हूं.''

स्थानीय लोग हरेकाला हजाब्बा की इस कोशिश के लिए उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते, लेकिन हजाब्बा के लिए प्रशंसा से ज़्यादा ज़रूरी है वो मिशन जो उन्होंने शुरु किया है.

साल 2000 में जब उन्होंने इस स्कूल की शुरुआत की, तब उन्हें किसी से कोई सहयोग नहीं मिला. इसके बावजूद उन्होंने एक स्थानीय मस्जिद से सटे मदरसे में ये स्कूल खोला और 28 बच्चों के साथ पढ़ाई-लिखाई का काम शुरू करवाया.

सरकार की भूमिका

सबसे पहले एक स्थानीय मस्जिद से सटे मदरसे में स्कूल खोला. समय के साथ स्कूल की इमारत बनकर तैयार हुई.

जैसे-जैसे स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ी, उन्हें बड़ी जगह की ज़रूरत महसूस हुई. तब उन्होंने कर्ज़े के लिए अर्जी दी और अपनी जमा-पूंजी से स्कूल की एक इमारत बनाने की शुरुआत कर दी.

हजाब्बा की इस लगन को देखकर कई लोग आगे आए और उनकी मदद में जुट गए. लेकिन हजाब्बा के लिए काम अभी खत्म नहीं हुआ है.

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश की 25 फीसदी आबादी निरक्षर है और कई बच्चे सिर्फ इसलिए स्कूल नहीं जा पाते, क्योंकि उनके गांव में स्कूल मौजूद नहीं.

एक स्थानीय अख़बार ने जब हजाब्बा की कोशिशों के बारे में लिखा, तब सरकार ने उनकी मदद के लिए एक लाख रुपए दिए.

हजाब्बा कहते हैं, ''मुझे सरकार की ओर से एक पुरस्कार दिया गया, जिसमें मुझे एक लाख रुपए की राशि दी गई. इसके बाद लोगों ने भी मेरी मदद के लिए पैसे भेजने शुरू किए.''

तब से अब तक हजाब्बा को कई तरह की मदद और पुरस्कार मिल चुके हैं और आम लोग उन्हें समाज का नायक मानते हैं.

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