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जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लगभग तय, दोनों सदन में विपक्ष एकजुट

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शेखर कुमार यादव के खिलाफ विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी में जुट गया है। जिस तरह से जस्टिस शेखर ने विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रम में विवादित बयान दिया था उसके खिलाफ विपक्ष एकजुट होता नजर आ रहा है और उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है।

निर्दलीय सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने राज्यसभा और लोकसभा दोनों में इसके लिए कार्रवाई शुरू कर दी है। वह दोनों ही सदन में नोटिस भेजा है। बता दें कि इस नोटिस के लिए राज्यसभा में 50 सांसद और लोकसभा में 100 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इसके बाद ही सदन में महाभियोग का प्रस्ताव रखा जा सकता है।

justice shekhar yadav

कपिल सिब्बल लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा में सभापति जगदीप धनखड़ को यह नोटिस भेजने के लिए सांसदों का समर्थन जुटा रहे है। रिपोर्ट की मानें तो कपिल सिब्बल पहले ही राज्यसभा में 40 सांसदों का हस्ताक्षर महाभियोग प्रस्ताव के लिए हासिल कर चुके हैं जबकि लोकसभा में उन्हें 100 से अधिक सांसदों का समर्थन मिल गया है, जिन्होंने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने की बात कही है।

गौर करने वाली बात है कि कैंपेन फॉर ज्यूडीशियल अकाउंटैबिलिटी एंड रिफॉर्म्स ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ शिकायत की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी जस्टिस शेखर के बयान का संज्ञान लेते हुए इसकी जानकारी मांगी है।

बता दें कि जस्टिस शेखर ने वीएचपी के कार्यक्रम में कहा था कि मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि यह देश देश में रहने वाले बहुसंख्यकों से चलेगा, यह कानून है। कानून निसंदेह बहुसंख्यकों के मुताबिक ही काम करता है।

इसे परिवार और समाज के संदर्भ में देखना चाहिए और स्वीकार करना चाहिए, यह बहुसंख्यकों के कल्याण और खुशी के ए फायदेमंद है। जस्टिस शेखर ने यह बयान समान नागरिक संहिता पर बोलत हुए दिया था। इस दौरान हाई कोर्ट एक और जज जस्टिस दिनेश पाठक भी उपस्थित थे।

हालांकि जस्टिस शेखर ने मुस्लिम समुदाय का नाम नहीं लिया। लेकिन उन्होंने कहा कि कई पत्नियां रखना, तीन तलाक और हलाला को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अगर आप यह कहते हैं कि पर्सनल लॉ इसकी अनुमति देता है तो इसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

महिलाओं का अपमान नहीं किया जा सकता है, हमारे शास्त्र और वेद में उन्हें देवी का दर्जा दिया गया है। आप इस तरह के अधिकारों का दावा नहीं कर सकते हैं। तीन तलाक देने और महिलाओं को भरण-पोषण नहीं देने का अधिकार है, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

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