क्यों नीतीश कुमार 2024 के चंद्रबाबू नायडू बन सकते हैं?

2019 में विपक्षी एकता के अग्रदूत चंद्रबाबू नायडू अब बीजेपी के साथ आने को उतावले हैं। जबकि, बिहार के सीएम नीतीश कुमार 2024 के लिए उनकी भूमिका निभाने में जुटे हुए हैं। खेला दिलचस्प हो चुका है।

Nitish Kumar is being compared to Chandrababu Naidu, TDP leader, the ambassador of opposition unity in 2019, is now ready for alliance with BJP

टीडीपी नेता और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए हैं। हाल ही में एक टीवी डिबेट में जब भाजपा के साथ गठबंधन की संभावना पर उनसे सवाल किया गया तो वे बोले, 'यह समय की बात है।'

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चंद्रबाबू नायडू फिर से पलट गए!
नायडू यहां तक बोल गए कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का पूर्ण समर्थन करते हैं और देश के विकास के लिए काम करने के लिए तैयार हैं। अब वह कहने लगे हैं, राजनीति और विकास दो भिन्न चीजें हैं। चंद्रबाबू नायडू की यह बातें 2019 में लोकसभा चुनावों से पहले उनकी कोशिशों के ठीक उलट हैं।

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चंद्रबाबू भी पीएम मोदी को हराने के मिशन पर निकले थे
तब चंद्रबाबू ने उसी तरह से बीजेपी और नरेंद्र मोदी को हराने का बीड़ा उठाया था, जैसा कि पिछले साल भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उठाए हुए हैं। उन्हें चंद्रबाबू नायडू के अंजाम की याद खुद उनके पूर्व सहयोगी और चुनाव रणीतिकार प्रशांत किशोर ने दिलाई है।

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नायडू दे रहे थे 1996 वाला फॉर्मूला
पिछले लोकसभा चुनाव में चंद्रबाबू नायडू भाजपा और पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष को उसी तरह से एकजुट करने में लगे थे, जैसा अभी नीतीश कर रहे हैं। तब नायडू यहां तक दावा कर रहे थे कि क्षेत्रीय दलों के साथ आने से चुनाव के बाद उसी तरह से तीसरे मोर्चे की सरकार बन सकती है, जैसा कि 1996 में बनी थी।

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नीतीश भी कह रहे हैं कि वह खुद के लिए यह कोशिश नहीं कर रहे
वह भी तब कांग्रेस के लिए 'ऐंकर पार्टी' की भूमिका देख रहे थे, जैसा कि अभी कुछ विपक्षी दल उसके लिए रोल सेट करने के अलग-अलग फॉर्मूले दे रहे हैं। नीतीश कह रहे हैं कि वह खुद पीएम बनने के लिए यह सब नहीं कर रहे हैं। नायडू का भी कहना था कि जिस दल के पास संख्या बल होगी, उसी के आधार पर प्रधानमंत्री तय होगा।

चंद्रबाबू भी नीतीश की तरह विपक्षी एकता में जान फूंकने के लिए तब निकले थे, जब कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों की चुनाव पूर्व 'महागठबंधन' की कोशिशें नाकाम हो गई थीं। तब एक इंटरव्यू में नायडू ने कहा था, '2019 में 1996 के रिपीट होने की पूर्ण संभावना है और इसे खारिज नहीं किया जा सकता।' 1996 में जेडीएस सुप्रीमो एचडी देवगौड़ा कुछ क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर भाजपा को रोकने की कोशिश में कांग्रेस और लेफ्ट के सहयोग से प्रधानमंत्री बन गए थे।

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नायडू ने भाजपा के लिए अधिकतम 200 सीटों की भविष्यवाणी की थी
तब नीतीश की तरह नायडू ताल ठोककर कह रहे थे कि मोदी सरकार के खिलाफ इतनी 'नकारात्मकता' बढ़ती जा रही है कि बीजेपी का 200 का आंकड़ा पार करना भी मुश्किल है। लेकिन, नतीजे उनके आकलन से ठीक उलट आए। भाजपा 303 सीट लेकर पहले से भी ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। एनडीए का आंकड़ा तो और ज्यादा रहा।

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    तब नीतीश से ज्यादा बड़े नेता थे नायडू
    लेकिन, चुनाव हुए तो आधं प्रदेश में ही चंद्रबाबू के पैर के नीचे से उनकी सियासी जमीन खिसक गई। लोकसभा की 25 में से सिर्फ 3 सीटों पर ही टीडीपी सिमट गई और 175 सदस्यीय विधानसभा में उसके सिर्फ 23 विधायक ही जीत सके। संख्या बल के हिसाब से तब वे आज के जेडीयू सुप्रीमो नीतीश कुमार की तुलना में कहीं बड़े नेता हुआ करते थे।

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    बिहार में नीतीश का सियासी कद लगातार घटा है
    नीतीश कुमार पीएम मोदी और उनकी बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने के प्रयास में निकले हैं। लेकिन, पहले उनकी ही सियासी जमीन को टटोल लेना आवश्यक है। 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी सहयोगी बीजेपी का स्ट्राइक रेट बिहार में उनसे बेहतर रहा था। 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के विधायकों की संख्या के सामने उनकी पार्टी बौनी बनकर रह गई थी।

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    पहले बीजेपी के फिर लालू के आशीर्वाद से मिली कुर्सी
    नीतीश भाजपा के आशीर्वाद से सीएम जरूर बने रह गए, लेकिन उनमें कभी भी पहले वाले राजनेता का दम नजर नहीं आया। भाजपा छोड़कर लालू यादव की राजद की लालटेन पकड़ी तो वह बौने वाली स्थिति और भी बौनी हो गई। क्योंकि, बिहार विधानसभा में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी है और जेडीयू उसके करीब आधे के बराबर है।

    इसी वजह से प्रशांत किशार ने उनपर तंज के रूप में कहा है कि 'अपना तो ठिकाना है नहीं'....पीके की यह बात उसी राजनीतिक यथार्थ से जुड़ी हुई है। बिहार के मुख्यमंत्री उस कांग्रेस की पैरवी कर रहे हैं, जिसकी कम से कम दो बड़े राज्यों (यूपी-बिहार) में अब कोई सियासी जमीन बची ही नहीं है। बंगाल में भी वह हाशिए पर रहकर भी इसलिए दिख रही है, क्योंकि उसे वहां लेफ्ट का साथ मिला है।

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    एक सीट-एक उम्मीदवार फॉर्मूला कहां चलेगा?
    नीतीश के नाम पर उनकी पार्टी जेडीयू विपक्ष के लिए एक सीट-एक उम्मीदवार का फॉर्मूला दे रही है। पहले बिहार में महागठबंधन के लिए सवाल होगा कि वह कांग्रेस को वहां कितनी सीटें चुनाव लड़ने के लिए देगा? इसी तरह यूपी में कांग्रेस के लिए अमेठी और रायबरेली के अलावा क्या वह किसी और सीट की वकालत कर पाएंगे? क्या बसपा-सपा को वह फिर से साथ ला सकते हैं?

    बंगाल में क्या नीतीश ममता दीदी को कांग्रेस और लेफ्ट के लिए सीट छोड़ने के लिए राजी कर पाएंगे? बाकी हिंदी भाषी क्षेत्रों में विपक्ष में कांग्रेस किसके लिए सीट छोड़ेगी? दिल्ली में आम आदमी पार्टी क्या कांग्रेस को एक भी सीट चुनाव लड़ने के लिए देगी? पंजाब में क्या इसबार आम आदमी पार्टी और कांग्रेस साथ आ सकते हैं?

    इसी तरह महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारतीय राज्यों में नीतीश कुमार की कौन सुनेगा? जबकि वह अपने ही राज्य में कभी बीजेपी और कभी राजद की ऊंगली पकड़ कर खड़े हो पा रहे हैं। ऐसे में नीतीश के आत्मबल को चंद्रबाबू का ताजा बयान और भी कमजोर कर सकता है।

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