Operation Blue Star: जरनैल सिंह भिंडरावाला, जिसके लिए इंदिरा गांधी को टैंक भेजने पड़े थे
नई दिल्ली। ऑपरेशन ब्लू स्टार, 6 जून 2018 को इसकी 34वीं बरसी है। यही वो दिन है जब स्वर्ण मंदिर/गोल्डन टेंपल में ऑपरेशन चलाया गया था, जिसे ब्लू स्टार का नाम दिया गया था। तब सरकार की कमान थी इंदिरा गांधी के हाथों में और सामने जो शख्स चुनौती पेश कर रहा था उसका नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाला। हजारों सिख के लिए संत था भिंडरावाला, लेकिन उसे आतंकवादी भी कहा गया। भिंडरावाला का मकसद था पंजाब को अलग राष्ट्र बनाना, जिसे वह खालिस्तान नाम देना चाहता था। भिंडरावाला की कहानी का पहला बडा पड़ाव आता है, 1978 में। बैसाखी का दिन था और तारीख थी 13 अप्रैल। भिंडरावाला के समर्थक और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। भिंडरावाला के 13 समर्थक मारे गए।

इस घटना के बाद भिंडरावाला सुर्खियों में आ गया था। सिखों के पांच अकाल तख्तों में एक दमदमी टकसाल के इस 31 वर्षीय अध्यक्ष का इरादा था अलग खालिस्तान और विचार था कट्टरवादी। प्रभाव ऐसा कि मात्र कहने भर से लोग शराब और सिगरेट छोड़ दिया करते थे। वह संत था, बात में प्रभाव था, लेकिन खालिस्तान बनाने की जिद ने भिंडरावाला के मन से अंजाम का खौफ निकला दिया था। 1947 में जन्मा भिंडरावाला हमेशा पारंपरिक सिख पोशाक ही पहना करता था।
आजादी के बाद जब भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश का गठन हुआ तो अकाली दल ने पंजाबी भाषी इलाके को पंजाब सूबा घोषित करवाने की मांग कर दी। इसी बीच हिंदी और गुरमुखी को लेकर सिख और हिंदुओं के बीच पहला टकराव देखने को मिला। इसी समय शिरोमणि अकाली दल का उदय हुआ और कांग्रेस का दबदबा कम होने लगाा।
अकालियों का प्रभाव बढ़ता देख इंदिरा गांधी ने सरदार ज्ञानी जैल सिंह को जिम्मेदारी सौंपी। अकालियों का प्रभाव कम करने के लिए जैल सिंह ने सिख गुरुओं के जन्म और शहीदी दिवसों पर कार्यक्रमों का आयोजन कराना शुरू किया। इसी दौरान उदय हुआ जरनैल सिंह भिंडरावाला का। भिंडरावाला को जैल सिंह और कांग्रेस का भरपूर समर्थन मिला। एक दौर ऐसा भी आया जब संजय गांधी ने भिंडरावाला को खुली छूट दे दी।
कांग्रेस का हाथ पाकर मजबूत हुए भिंडरावाला के इरादे लगातार कट्टरवाद की तरफ बढ़ते और एक दिन ऐसा भी भी पंजाब केसरी अखबार निकालने वाले हिंद समाचार समूह के मुखिया लाला जगत नारायण सिंह की हत्या हो गई। हत्या का आरोप भिंडरावाला पर लगा। वो साल था 1981, जब भिंडरावाला के खिलाफ बाकायदा केस दर्ज हुआ, लेकिन उसे पकड़ने की हिम्मत पंजाब के किसी पुलिसवाले में नहीं थी। उस वक्त केंद्र सरकार में ज्ञानी जैल सिंह गृह मंत्री थे, वही शख्स जिसने सबसे पहले भिंडरावाला के सिर पर हाथ रखा था। बहरहाल, वह गिरफ्तार हुआ, लेकिन सबूत नहीं मिले और जमानत दे दी गई। 1981 के बाद आतंकी घटनाओं का सिलसिला शुरू हो चुका था। कभी बस का अपहरण कर हिंदुओं को गोली मारी गई तो कभी रेल पटरियां उखाड़ी गईं। 1983 आते-आते भिंडरावाला की सुरक्षा इतनी कड़ी हो गई थी, पुलिस के हाथों से वह बहुत दूर चला गया था। उसके अपने गार्ड सुरक्षा में तैनात रहते थे। यहां तक कि स्वर्ण मंदिर में हथियार और गोला-बारूद जमा किया जाने लगा था।
मौका पाकर आकलियों ने भिंडरावाला से संधि कर ली थी। अब इंदिरा गांधी सरकार के लिए मुश्किल बढ़ती जा रही थी। अकालियों के साथ आने के बाद इंदिरा सरकार के साथ मोल-भाव खुलकर होने लगा। कभी पंजाब को ज्यादा अधिकार तो कभी अन्य मांगे, लेकिन मकसद कुछ और ही था। 1984 में एक के बाद एक कई मीटिंगें हुईं, पर कोई हल निकला। इस बीच भिंडरावाला की आर्मी स्वर्ण मंदिर को बख्तरबंद किला बना चुकी थी। इंदिरा गांधी ने सेना और सरकार के अफसरों से हालात पर लंबी चर्चा की और जब कोई हल नहीं निकला तो 2 जून 1984 को इंदिरा गांधी ने आल इंडिया रेडियो से देश को संबोधित किया और आतंकवादियों से हथियार छोड़ देने की अपील की। इंदिरा के ऐलान के बाद 3 जून को सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू कर दिया। कुछ समय इंतजार करने के बाद सेना ने 5 जून की रात को निर्णायक कार्रवाई की, जिसमें जरनैल सिंह भिंडरावाला मारा गया। ऑपरेशन ब्लू स्टार में लगभग 200 आतंकी मारे गए थे, जबकि सेना के 79 जवानों की भी जान चली गई थी।












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