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कर्नाटक के नाटक और महाराष्ट्र के ड्रामे में ज्यादा अंतर नहीं, क्लाइमेक्स बाकी?

बंगलुरू। महाराष्ट्र में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना गठबंधन सरकार 28 नवंबर को शपथ लेने जा रही है, लेकिन यह बेमेल गठबंधन सरकार कब टूटकर चिंदी-चिंदी बिखर जाएगी, इसकी संभावना और आशंका उन्हें भी हैं, जो ऐसे दुष्चक्र में जानते-समझते हुए घुसे पड़े हैं। महाराष्ट्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने तो बेमेल दलों वाले गठबंधन सरकार के भविष्य पर पहले ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। उन्होंने कहा कि 'तीन तिगाड़ा, का बिगाड़ा' सरकार आखिर चलेगी कब तक?

Nirupam

संजय निरूपम कहते हैं कि बेमेल जोड़ी वाली सरकार शपथ तो ले लेगी, चलेगी कैसी? बेमेल गठबंधन वाली सरकार का भविष्य पढ़ते हुए निरूपम ने कहा कि हर हाल में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार का गिरना तय है। बीजेपी किसी के साथ मिलकर कर्नाटक की तरह महाराष्ट्र में एक बार फिर सरकार बना लेगी या और अगर फिर विधानसभा चुनाव हुए तो बीजेपी को ही फायदा होगा और तब सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस का होगा, जो परस्पर विरोधी विचारों वाले दल के साथ सिर्फ बीजेपी को दूर के लिए गठबंधन सरकार में शामिल हो रही है।

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संजय निरूपम ने कांग्रेस को याद दिलाते हुए कहा कि वर्षों पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में बसपा के साथ गठबंधन करके बड़ी गलती की थी और अब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस उठ नहीं पाई है और एक बार कांग्रेस उत्तर प्रदेश वाली गलती महाराष्ट्र में दोहरा रही है। निरूपम के मुताबिक उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार में तीसरे नंबर की पार्टी बनना कांग्रेस को दफन करने जैसा होगा।

हालांकि कमोबेश यही हालत शिवसेना का भी होना तय है, जो अपनी पहचान को मिटाकर कांग्रेस के साथ गठबंधन में बंध रही है। सत्ता के लिए शिवसेना की ओर से चला गया यह दांव शिवसेना के लिए आत्मघाती हो सकता है और उसका कोर एजेंडा प्रभावित होते ही शिवसेना में दो फाड़ हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

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शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन पर हमला करते हुए पूर्व महाराष्ट्र सीएम देवेंद्र फडणवीस ने बेमल गठबंधन वाली सरकार का भविष्य तय करते हुए कह चुके हैं कि तीन पहियों वाली सरकार ज्यादा दिन नहीं टिकेगी, क्योंकि सभी पहियों की दिशाएं अलग-अलग होंगी, उनकी विचारधाराएं अलग-अलग हैं। वहीं, बीजेपी एक नेता ने कहा कि कांग्रेस ने इसी तरह बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कर्नाटक में एक प्रयोग किया था।

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सभी जानते हैं कि कर्नाटक-जेडीएस गठबंधन सरकार का हश्र क्या हुआ है। महाराष्ट्र में भी अगर कर्नाटक एपीसोड हुआ तो यह तय है कि शिवसेना और कांग्रेस दोनों दलों को आगामी चुनावों में बुरा अंजाम भुगतना पड़ सकता है, क्योंकि कर्नाटक की तरह महाराष्ट्र में भी बेमेल गठबंधन बना है, जिसकी उम्र लंबी होती नहीं दिख रही है।

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गौरतलब है महाराष्ट्र में मुस्लिम मतदाता शिवसेना को ज्यादा वोट नहीं करते। अगर महाराष्ट्र सरकार गिरती है तो कांग्रेस को मुस्लिमों को मिल रहा सपोर्ट आगे नहीं मिलेगा, इसमें दो राय नहीं है। यूपी और बिहार इसके जिंदा उदाहरण हैं, जहां मुस्लिम वोट सपा, बसपा, जनता दल यू औ राजद को जाता है और कांग्रेस को मुस्लिम समुदाय कई दशकों से ठेंगा दिखाता आ रहा है।

चूंकि मुस्लिम समुदाय भी बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए उन्हीं दल को वोट करती है, जो बीजेपी को हरा सकें, लेकिन यूपी और बिहार में कांग्रेस महाराष्ट्र जैसी गलती करके जनाधार खो चुकी थी। महाराष्ट्र में शिवेसना के साथ गठबंधन करके एक बार फिर कांग्रेस ने गलती की है, जिससे मुस्लिम वर्ग अगले चुनावों में बीजेपी को हराने के लिए कोई नया दल ढूंढ लेंगी।

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कांग्रेस अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को केरल से सबक लेना चाहिए था, जहां लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस कुल 15 सीटें मुस्लिम वोटों के आधार पर जीत दर्ज करने में कामयाब हुई थी। यही कारण था कि कांग्रेस पार्टी के कई बड़े नेता, जिनमें वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व रक्षा मंत्री ए के एंटनी शामिल हैं। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन नहीं करने की सलाह दी थी, लेकिन बीजेपी को सत्ता से दूर रखने और सत्ता के लालच में कांग्रेस संयमित नहीं रख सकी।

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ऐसा ही कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजों के दौरान भी हुआ था जब कांग्रेस ने बहुमत से दूर रही नंबर वन पार्टी बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए एचडी कुमारास्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव देकर बेमेल गठबंधन कर लिया था और बाद में हाथ से कर्नाटक भी निकल गया। भी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना के बीच गठबंधन से खिलाफ हैं, ए के एंटनी केरल के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं।

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उल्लेखनीय है शिवसेना अपने कट्टरपंथी उद्देश्यों और कट्टरपंथी हिंदुत्व विचारधारा की हमेशा से पैरोकार रही है। शिवसेना के अतीत के इस पहलू से कांग्रेस के नेतृत्व को महाराष्ट्र सरकार में एक साथ सरकार चलान में भारी असुविधा होनी तय हैं, क्योंकि खुद को सेक्युलरिज्म की लंबरदार मानने वाली कांग्रेस तब क्या करेगी जब शिव सैनिक हिंदुत्व की राजनीति करेंगे। एक बीजेपी होती तो कांग्रेस का सफर सुहाना होने के चांसेज थे, लेकिन कट्टर हिंदुत्व का झंडा लेकर चलने वाली शिवसेना के साथ कांग्रेस कैसे तारतम्य बैठाएगी यह कहना मुश्किल है।

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डर है कि अगर कांग्रेस और शिवसेना एकदूसरे के साथ तारतम्यता बैठाते हुए सरकार चलाने की कोशिश करते हैं, तो परस्पर विरोधी एजेंडे वाली शिवसेना और कांग्रेस को उनके कोर वोटर के छिटकने को डर बना रहेगा और दोनों पार्टियां ऐसा करके गठबंधन सरकार चलाने के लिए विवश होंगी।

एक तरफ जहां राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस का अल्‍पसंख्‍यक वोट बैंक उससे छिटकेगाा। वहीं, शिवसेना से उसका हिंदू बहुसंख्यक वोटर भी छिटक सकता है। हालांकि कांग्रेस की तुलना में शिवसेना को हिंदु बहुसंख्यक वोटरों की चिंता कम है, क्योंकि महाराष्ट्र में बीजेपी ने उसके अधिकांश मुद्दों पर पहले ही डकैती डाल दी है।

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शिवसेना को महाराष्ट्र में बीजेपी के बढ़ते जनाधार को भान है, जिसकी पुष्टि वर्ष 1995 से 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम बतलाते हैं। महाराष्ट्र में बीजेपी ने सीटों पर जीत के औसत, मत फीसद और सीटों की संख्या में तेजी से शिवसेना को पछाड़ती आई है।

क्योंकि बीजेपी ने शिवसेना के कोर एजेंडे में शामिल सभी मुद्दों को हथिया लिया है और उनमें से अधिकांश मुद्दों को पूरा भी कर दिया, जिसका पूरा श्रेय बीजेपी को मिलेगा। इसलिए शिवसेना बीजेपी को छोड़कर आगे बढ़ गई, लेकिन कांग्रेस सत्ता के लालच में एक बार महाराष्ट्र में बेमेल गठबंधन करके फंस गई है।

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इन्हीं वजहों का उल्लेख करते हुए कांग्रेस के आला नेताओं ने कांग्रेस अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को शिवसेना को समर्थन नहीं देने के लिए आगाह किया था, लेकिन फटेहाल कांग्रेस की स्थिति को देखते हुए अंततः सोनिया गांधी ने शिवसेना के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल होने का फैसला कर लिया।

कांग्रेस के फैसले से जहां सेक्युलरिज्म के कैंप की अगुआ रही कांग्रेस की छवि को धक्का पहुंचेगा, जिससे उसके केंद्र की राजनीति पर भी बड़ा असर पड़ना तय है, क्योंकि शिवसेना से गठबंधन सरकार में शामिल होते ही कांग्रेस पर मुस्लिम अल्पसंख्यक वोटरों का डेंट लगना तय है।

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इसका बड़ा नुकसान कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में देखने को मिलेगा जब ऑल इंडिया लेबल पर मुस्लिम वर्ग कांग्रेस का बहिष्कार करते हुए किसी और दल को अपना मसीहा चुनने को मजूबर होगी। इसका आंशिक असर शिवसेना की राजनीति पर पड़ेगा जब शिवसेना पर कांग्रेस से हाथ मिलाने का आरोप लगेगा।

मौजूदा गठबंधन से एक तरह जहां कांग्रेस का केंद्र में सेक्युलर गठजोड़ का सपना अधूरा रह जाएगा, दूसरी तरह महाराष्ट्र की जनता में शिवसेना के हिंदुत्व की राजनीति की पोल खुल जाएगी। इसका सीधा फायदा केंद्र और महाराष्ट्र में बीजेपी को मिलेगा।

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यही वजह थी कि जब महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व में बन रही गठबंधन सरकार में कांग्रेस और एनसीपी के शामिल होने की भनक दिल्ली के तिहार जेल में बंद पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम को लगी तो ट्वीट करके उन्होंने कांग्रेस को आगाह किया कि कृपया पार्टी के निजी हितों को दूर रखकर किसान कल्याण, निवेश, रोजगार, सामाजिक न्याय और महिला एंव बाल कल्याण के सामान्य हितों को लागू करने के लिए मिलकर काम करें।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी.चिदम्बरम भी अच्छी तरह से जानते हैं कि परस्पर विरोधी विचारों वाली पार्टियों के बीच उभरा गठबंधन में निजी हितों के टकराव अश्वयंभावी है, जिससे अलग रहकर राजनीति कर पाना कांग्रेस और शिवसेना दोनों दलों के लिए मुश्किल काम होगा।

यह भी पढ़ें- शपथ ग्रहण से पहले शिवसेना ने कहा-आज देश में नया सूर्योदय, शरद पवार हमारे मार्गदर्शक, भ्रम में ना रहें फडणवीस

'महाराष्ट्र में मतलबी सरकार बन रही है'

'महाराष्ट्र में मतलबी सरकार बन रही है'

बीजेपी नेता व पूर्व मंत्री राम शिंदे ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि यह मतलबी सरकार बन रही है, ऐसी सरकारों की लंबी उम्र नहीं होती। हमें विश्वास है कि बीजेपी जल्द वापसी करेगी। वहीं, विनोद तावडे ने कहा कि शिवसेना ने हमारे साथ विश्वासघात किया है। वह ऐसे लोगों के साथ मिल कर सरकार बनाने जा रही है, जिनके साथ उसका कोई वैचारिक मिलाप नहीं है। राज्य की जनता ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को जनमत दिया था, उसका अपमान करते हुए शिवसेना सरकार गठन करने जा रही है।

कर्नाटक में भी फेल हुआ कांग्रेस-जेडीएस का बेमेल गठबंधन

कर्नाटक में भी फेल हुआ कांग्रेस-जेडीएस का बेमेल गठबंधन

कर्नाटक विधानसभा चुनाव का परिणाम मई 2018 में आया था। यहां बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी। बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस ने जेडीएस के कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री पद का ऑफर देकर गठबंधन किया, लेकिन 14 महीने के अंतराल में बेमेल गठबंधन वाली सरकार गिर गई और वीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व में एक बार बीजेपी ने कर्नाटक में अपनी सरकार बनाई।

शिवसेना के कोर एजेंडे पर बीजेपी ने जमाया कब्जा

शिवसेना के कोर एजेंडे पर बीजेपी ने जमाया कब्जा

वर्ष 1995 से 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम बतलाते हैं कि महाराष्ट्र में बीजेपी ने सीटों पर जीत के औसत, मत फीसद और सीटों की संख्या में तेजी से आगे बढ़ी है शिवसेना लगातार पिछड़ती नजर आई है। चूंकि बीजेपी ने शिवसेना के कोर एजेंडे में शामिल सभी मुद्दों को हथिया लिया है और उनमें से अधिकांश मुद्दों को पूरा भी कर दिया है, जिसका पूरा श्रेय बीजेपी को मिलेगा। इसलिए शिवसेना बीजेपी को छोड़कर आगे बढ़ गई, लेकिन कांग्रेस सत्ता के लालच में एक बार महाराष्ट्र में बेमेल गठबंधन करके फंस गई है

बसपा के साथ बेमेल गठबंधन करके यूपी में खत्म हो गई है कांग्रेस

बसपा के साथ बेमेल गठबंधन करके यूपी में खत्म हो गई है कांग्रेस

संजय निरूपम ने कांग्रेस को याद दिलाते हुए कहा कि वर्षों पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में बसपा के साथ गठबंधन करके बड़ी गलती की थी और अब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस उठ नहीं पाई है और एक बार कांग्रेस उत्तर प्रदेश वाली गलती महाराष्ट्र में दोहरा रही है। निरूपम के मुताबिक उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार में तीसरे नंबर की पार्टी बनना कांग्रेस को दफन करने जैसा होगा। हालांकि कमोबेश यही हालत शिवसेना का भी होना तय है, जो अपनी पहचान को मिटाकर कांग्रेस के साथ गठबंधन में बंध रही है। सत्ता के लिए शिवसेना की ओर से चला गया यह दांव शिवसेना के लिए आत्मघाती हो सकता है और उसका कोर एजेंडा प्रभावित होते ही शिवसेना में दो फाड़ हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।

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