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नीतीश कुमार का राजनीतिक 'हिंदुत्व' और इसके चुनावी मायने?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर से एनडीए में वापसी की अटकलों को खारिज कर दिया है। लेकिन, वह सियासी हलकों में इस कदर अप्रत्याशित बन चुके हैं कि उनके कुछ कदम उनके विरोधियों के साथ-साथ सहयोगियों को भी चौंका देते हैं।

हम कुछ उदाहरण देकर समझने की कोशिश करते हैं कि बिहार के सीएम किस तरह से राजनीति की धारा बदलने के बाद भी, पुरानी विचारधारा वाले अपने रिश्ते को कभी भी तोड़ते नहीं हैं। यह उनकी खासियत भी है, लेकिन इसकी वजह से उनको लेकर लोगों की दुविधा भी बढ़ जाती है।

nitish kumar hindutva

सीतामढ़ी में पुनौरा धाम का विकास
अयोध्या में बीजेपी के मूल एजेंडे के आधार पर भगवान राम का भव्य मंदिर का निर्माण लगभग पूरा होने को है। अगले साल के लोकसभा चुनावों में भाजपा इस मुद्दे को न उछाले इसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं है। ऐसे में नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार के सीतामढ़ी में स्थित पुनौरा धाम के विकास के लिए इसी महीने 72 करोड़ रुपए की मंजूरी देकर राजनीतिक तौर पर सबको चौंकाया है। अयोध्या भगवान राम की जन्म स्थली है तो पुनौरा धाम माता सीता का जन्म स्थान है।

मलमास मेला के लिए सक्रियता
नीतीश कुमार ने इंडिया ब्लॉक बनाने की अगुवाई की है। इसकी दूसरी बैठक 17-18 जुलाई को बैंगलरू में हुई थी। दूसरे दिन की बैठक के बाद नीतीश कुमार अचानक वहां से निकल गए। उस समय उनको लेकर जो अटकलें लग सकती थीं, वह सब लगाई गईं। अगले दिन वह बिहार के राजगीर पहुंचे हुए थे। उन्होंने यहां ब्रह्म कुंड मंदिर में मलमास मेले का औपचारिक उद्घाटन किया और बोला कि मेरा ध्यान तो यहीं मलमास मेले पर ही लगा हुआ था। गौरतलब है कि राजगीर का मलमास मेला देश भर में प्रसिद्ध है और राजगीर मुख्यमंत्री के गृह जिले में ही स्थित है।

गयाजी डैम
बिहार के गया का विष्णुपद मंदिर विश्व भर के हिंदुओं के लिए प्रसिद्ध है। खासकर पितृपक्ष मेले के दौरान यहां देश-विदेश के हिंदू अपने पुर्वजों के पिंड दान के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि वनवास खत्म होने के बाद भगवान राम ने भी स्वयं यहां फल्गू नदी के किनारे पिता राजा दशरथ का पिंड दान किया था। नीतीश सरकार ने यहां पर तीर्थयात्रियों की सुविधा को देखते हुए करीब 324 करोड़ रुपए की लागत से देश का सबसे विशाल रबर डैम बनाया है। इसके उद्घाटन के लिए पिछले साल खुद सीएम यहां पहुंचे थे और विधिवत पूजा में भी शामिल हुए थे।

पंडित दीन दयाल उपाध्याय को श्रद्धांजलि
नीतीश कुमार इस समय राजनीति की जिस धारा के नाविक बनने की कोशिशों में जुटे हुए हैं, उसमें भारतीय जन संघ के संस्थापक पंडित दीन दयाल उपाध्याय की विचाराधारा तनिक भी फिट नहीं बैठती है। पंडित उपाध्याय की विचारधारा आरएसएस और हिंदुत्व के विचारों से प्रभावित है, जिसे कोसते रहना विपक्षी गठबंधन इंडिया की विचारधारा का आधार है। फिर भी उनकी 107वीं जयंती पर नीतीश ने उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं छोड़ा।

'सदैव अटल' पहुंचकर श्रद्धांजलि
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि को बीजेपी ने इस बार एक तरह से एनडीए के शक्ति प्रदर्शन कार्यक्रम बनाने की कोशिश की थी। सत्ताधारी दल के तमाम सहयोगी और समान विचारधारा वाले नेताओं का वहां जमावड़ा लगा था। 16 अगस्त को बिहार के सीएम नीतीश कुमार भी उस दिन दिल्ली में ही थे और उन्होंने भी सदैव अटल पर जाकर पूर्व पीएम को श्रद्धांजलि दी। जबकि, वह इंडिया ब्लॉक की आगे की रणनीतियों के लिए ही दिल्ली आए हुए थे।

नीतीश के 'हिंदुत्व' के चुनावी मायने?
नीतीश कुमार की हिंदुत्व और हिंदुत्व के ब्रांड एंबेसडरों के प्रति यह श्रद्धा थोड़ी अलग है। इसमें बीजेपी के कट्टर हिंदुत्व और उसकी विरोधी पार्टियों के 'विशेष' सेक्युलरिज्म के विचारों से काफी अंतर है। अब यह नीतीश ही जान सकते हैं कि आखिर वह बीच-बीच में हिंदुत्व के विचार के बेहद करीब जाकर बीजेपी के वोट बैंक को साधने की कोशिश करते हैं या फिर विपक्षी दलों या इंडिया ब्लॉक के नेताओं को कोई राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं।

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