'जदयू-बीजेपी साथ हैं'! नीतीश कुमार की कमजोरी और अमित शाह की तैयारी

नई दिल्‍ली। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने रविवार को दिल्‍ली में हुई पार्टी की अहम बैठक के दौरान स्‍पष्‍ट तौर पर कह दिया कि जेडीयू और बीजेपी का गठबंधन बना रहेगा। इसमें शक नहीं कि नीतीश कुमार का यह बयान बीजेपी के लिए राहत की बात है, लेकिन मुश्किलें अब भी कम नहीं हुई हैं। 12 जुलाई को बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह के साथ होने वाली मुलाकात से पहले नीतीश कुमार के जल्‍ख तेवरों ने बता दिया है कि गठबंधन में आईं गांठें इतनी आसानी से खुलने वाली नहीं हैं। नीतीश कुमार ने साफ शब्‍दों में कह दिया है, 'जो हमें इग्‍नोर करेगा, वो खुद राजनीति में नजरअंदाज कर दिया जाएगा।' कहने की जरूरत नहीं कि इशारा किसकी ओर है। नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार को विशेष राज्‍य का दर्जा उनकी पार्टी का अहम मुद्दा है।

नीतीश कुमार के सीट शेयरिंग फार्मूले पर बीजेपी चुप

नीतीश कुमार के सीट शेयरिंग फार्मूले पर बीजेपी चुप

नीतीश कुमार ने दिल्‍ली में हुई बैठक के दौरान पार्टी सदस्‍यों के सामने एक फार्मूला दिया, जिसमें बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 17 पर जेडीयू, 17 पर बीजेपी और 6 सीटें एनडीए के अन्‍य दो सहयोगियों को देने की बात है। नीतीश कुमार के इस फार्मूले पर बीजेपी के किसी नेता का अब तक कोई बयान नहीं आया है। सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी तो जदयू को 15 सीटें भी देने को तैयार नहीं है। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्‍या नीतीश कुमार और अमित शाह के बीच सीटों को लेकर सहमति बन सकेगी?

नीतीश कुमार को ज्‍यादा सीटें क्‍यों नहीं देना चाहती है बीजेपी

नीतीश कुमार को ज्‍यादा सीटें क्‍यों नहीं देना चाहती है बीजेपी

कई मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से खबरें आ रही हैं कि बीजेपी नीतीश कुमार को 8 से 9 लोकसभा सीटें देने के हक में है। 2014 लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी एनडीए से अलग लड़ी थी और सिर्फ दो लोकसभा सीटें ही जीत सकी थी, जबकि बीजेपी अकेले 22 लोकसभा सीटें जीती थीं, जबकि लोजपा 6 और रालोसपा 3 सीटों पर जीती थी। ऐसे में बीजेपी का शीर्ष नेतृत्‍व नीतीश कुमार को 17 सीटें तो किसी हाल में देने नहीं जा रहा है।

तो क्‍या बीजेपी उठाएगी नीतीश कुमार की मजबूरी का फायदा

तो क्‍या बीजेपी उठाएगी नीतीश कुमार की मजबूरी का फायदा

2014 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी का साथ छोड़ने वाले नीतीश कुमार ने कुछ महीने पहले ही महागठबंधन तोड़कर एनडीए में घरवापसी की है। महागठबंधन की सरकार गिरने के बाद से लालू यादव के दोनों बेटे तेज प्रताप और तेजस्‍वी चाचा नीतीश के लिए नो एंट्री की बात कह रहे हैं। हां, कांग्रेस जरूर नीतीश कुमार को साथ लेना चाहती है, लेकिन उससे जदयू को क्‍या फायदा होगा? कुल मिलाकर नीतीश कुमार के लिए भी राह उतनी नहीं आसान नहीं बची है। ऐसे में यह मुमकिन है कि थोड़ी ना-नुकुर के बाद नीतीश कुमार बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह का सीट शेयरिंग का प्रस्‍ताव कर लेंगे।

नीतीश कुमार के पास अब कोई भी विकल्‍प विन-विन सिचुएशन वाला नहीं है

नीतीश कुमार के पास अब कोई भी विकल्‍प विन-विन सिचुएशन वाला नहीं है

बिहार की सत्‍ता पर लंबे समय से काबिज नीतीश कुमार अब सत्‍ता विरोधी लहर के दायरे में आ गए हैं। बिहार की सत्‍ता से उनकी पकड़ ढीली पड़ रही है। जनता में आक्रोश पिछले कुछ समय में बढ़ा है। अब 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर उनके विकल्‍पों की बात करें तो प्रमुख तौर पर तीन ही परिस्थितियां बनती हैं। एक- नीतीश कुमार एनडीए के साथ लड़ें, जो सीटें उनके हिस्‍से आएं उन्‍हें ग्रहण करें और चुनाव में उतरें। यहां दो नुकसान हैं, बड़े भाई का दर्जा नहीं मिलेगा। बीजेपी नीतीश को बिहार में एनडीए चेहरा बनाने की बात कह भी देगी, तो भी लोकसभा में नरेंद्र मोदी के सामने नीतीश कुमार चर्चा नहीं हो सकेगी। इससे उनकी बिहार में नंबर वन नेता की छवि को नुकसान होगा। दूसरा विकल्‍प यह है कि वह महागठबंधन में वापसी करें, लेकिन आरजेडी मानेगी नहीं और अगर फौरी तौर पर मान भी गई तो वही सवाल कि आखिर साथ कितने दिन चलेगा? भ्रष्‍टाचार और अपराध जैसे सवाल दोबारा नीतीश के सामने आ खड़े होंगे। तीसरा विकल्‍प अकेले चुनाव मैदान में उतरने का है, लेकिन अब जदयू के पास इतना सामर्थ्‍य नहीं बचा है, क्‍योंकि सत्‍ता विरोधी लहर बिहार कुछ तेज हुई है। ऐसे में नीतीश कुमार को इनमें से ही एक विकल्‍प चुनना है, देखना रोचक होगा कि वह क्‍या फैसला लेते हैं।

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