Nirbhya case: जानिए कितनी कानूनी अड़चनों के बाद सजा-ए-मौत पर लगी आखिरी मुहर

नई दिल्ली- दिल्ली के निर्भया कांड के चारों दोषियों को फांसी की सजा का रास्ता साफ हो गया है। चौथे दोषी पवन गुप्ता की दया याचिका भी राष्ट्रपति के पास से खारिज हो गई है। मतलब ये बात लगभग तय हो चुकी है कि उनके पास अब इस केस से संबंधित सारे कानूनी विकल्प खत्म हो चुके हैं। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 20 मार्च को फांसी देने के लिए नया डेथ वारंट जारी किया है। हालांकि, अलग-अलग फांसी देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने एक याचिका डाली है, जिसपर सुनवाई के लिए 23 मार्च की तारीख तय की गई है। ऐसे में आशंका बढ़ गई है कि कहीं 20 की तारीख भी तो नहीं टल जाएगी। क्योंकि, निर्भया के माता-पिता ओर पूरे देश के लोगों को इंसाफ का ये दिन देखने के लिए सात साल से भी ज्यादा का इंतजार करना पड़ा है। आइए देखते हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई,2017 को इन चारों की फांसी की सजा के खिलाफ दी गई अपील खारिज कर दी थी, तब उसके बाद से बीते वर्षों में इन चारों और इनके वकीलों ने किस तरह से कानूनी हथकंडों का इस्तेमाल किया और कैसे-तारीख पर तारीख लेते चले गए।

तीन-तीन बार लग चुकी है डेथ वारंट पर रोक

तीन-तीन बार लग चुकी है डेथ वारंट पर रोक

दिल्ली के निर्भया गैंगरेप और हत्या का केस शायद भारतीय कानून का पहला ऐसा मामला होगा, जिसमें तीन-तीन बार डेथ वारंट की तामील रोकनी पड़ी होगी। लेकिन, निर्भया के चारों गुनहगार की जिंदगी की उलटी गिनती अब शुरू हो चुकी है। ठीक 15 दिनों बाद तारीख 20 मार्च, 2020 को उनके जीवन की आखिरी तारीख तय की गई है। उस दिन तड़के साढ़े 5 बजे तिहाड़ के जेल नंबर 3 की फांसी कोठी में उन चारों को फांसी के फंदे पर लटकाने का आदेश जारी कर दिया गया है। हालांकि इस बीच, सुप्रीम कोर्ट से सुनवाई की एक तारीख आने के बाद यह सस्पेंस बन गया है कि कहीं ये तारीख भी तो नहीं टल जाएगी। दरअसल, दोषियों को अलग-अलग फांसी दिए जाने को लेकर केंद्र सरकार की एक याचिका पर शीर्ष अदालत में 23 मार्च को सुनवाई होनी है। इससे पहले निर्भया के गुनहगार कानूनी पेंचीदगियों का फायदा उठाकर तीन-तीन बार फांसी पर लटकने से बच चुके हैं। पहली बार इसी साल दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 22 जनवरी की सुबह 7 बजे का वक्त फांसी के लिए मुकर्रर किया था। लेकिन, चार में से एक दोषी मुकेश सिंह ने इसी साल 14 जनवरी को राष्ट्रपति के पास दया याचिका डाल दी, जो 17 जनवरी को ही खारिज कर दी गई। लेकिन, दया याचिका खारीज होने और फांसी में 14 दिन के अनिवार्य अंतर रखने की वजह से पहली बार डेथ वारंट की तामील रोकनी पड़ी। अभी तक नियम यह भी है कि जब एक ही गुनाह के एक साथ कई दोषी हों तो सबको सजा भी साथ ही मिलेगी। बस मुकेश के साथ बाकी भी बच गए।

Recommended Video

    Nirbhaya Case के गुनहगारों को Death Warrant जारी, 20 March को दी जाएगी फांसी | वनइंडिया हिंदी
    दूसरी बार क्यों टली फांसी ?

    दूसरी बार क्यों टली फांसी ?

    दूसरी बार दिल्ली की अदालत ने पिछले एक फरवरी को सुबह 6 बजे फांसी देने का वक्त मुकर्रर किया था, लेकिन दोषियों की कानूनी पैंतरेबाजी के चलते फांसी की सजा आखिरी समय में फिर से अनिश्चितकाल के लिए टालनी पड़ गई। तब एक दोषी अक्षय ठाकुर ने सजा की तय तारीख से 3 तीन दिन पहले यानि 28 जनवरी को क्यूरेटिव पिटीशन डाल दी थी। जब सुप्रीम कोर्ट ने यह याचिका 30 जनवरी को खारिज कर दी तो वह 31 जनवरी को दया याचिका लेकर राष्ट्रपति के पास पहुंच गया। आखिरकार 5 फरवरी को राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका भी खारिज कर दी। अकेले अक्षय ही नहीं, कानूनी खामियों का फायदा विनय शर्मा के वकील ने भी उठाया। उसकी क्यूरेटिव पिटीशन 14 जनवरी को ही खारिज कर दिया गया था, लेकिन उसने भी फांसी की तय तारीख से दो दिन पहले यानि 29 फरवरी को दया याचिका लगाई, जिसे फांसी के लिए पहले तय की तारीख 1 फरवरी को ही खारिज किया गया।

    तीसरी बार इसलिए रोकनी पड़ी फांसी

    तीसरी बार इसलिए रोकनी पड़ी फांसी

    मुकेश सिंह, अक्षय ठाकुर और विनय शर्मा के फांसी से बचने के सारे वैद्यानिक रास्ते बंद हो चुके थे। लेकिन, वे लोग फिर भी निश्चिंत थे क्योंकि पवन गुप्ता के रूप में उनके एक साथी गुनहगार पवन गुप्ता के पास कानूनी तिकड़म अभी बचे ही हुए थे। उसे पता था कि वह अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करने में जितनी देरी लगाएगा, फांसी की सजा उतनी ही टलती जाएगी। उसे यह भी पता था कि जब भी फांसी लगेगी तो सबको एक साथ ही लटकाया जाएगा। पवन गुप्ता के पास दो-दो कानूनी विकल्प बचे हुए थे। पहला सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन और राष्ट्रपति के पास दया याचिका। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने तीसरी बार फांसी की तारीख 3 मार्च को तय की थी। लेकिन, पवन गुप्ता और उसके वकील शांत बैठे रहे। जब तामील की तारीख नजदीक आ गई तो उसने 28 फरवरी को क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च को उसे खारिज कर दिया, लेकिन उसके बाद वह फौरन राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगा दी। लिहाजा तीसरी बार 3 मार्च को मुकर्रर फांसी भी रद्द करनी पड़ गई।

    तारीख पर तारीख टालने का खेल देखिए

    तारीख पर तारीख टालने का खेल देखिए

    बता दें कि कानून में मौजूद खामियों से खिलवाड़ का ये खेल पिछले तीन साल से भी ज्यादा वक्त से चल रहा था। निर्भया के चारों गुनहगारों मुकेश सिंह, अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा और पवन गुप्ता की ओर से फांसी की सजा के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट से 5 मई, 2017 को ही खारिज हो गई थी। इसके बाद से ही चारों दोषियों के वकीलों ने सजा से बचने के लिए तारीख पर तारीख लेने का खेल शुरू कर दिया। सुप्रीम कोर्ट से अपील खारिज होने के बाद फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दायर करने में चारों दोषियों ने कुछ महीनों से लेकर सालों गुजार दिए। क्योंकि, उनके वकीलों को पता था कि सजा तो एक साथ ही मिलनी है। मसलन, मुकेश सिंह को रिव्यू पिटीशन डालने में 186 दिन, अक्षय ठाकुर के 950 दिन, विनय शर्मा को 225 दिन और पवन गुप्ता को भी इतना ही वक्त लग गया। इनमें से मुकेश सिंह, विनय शर्मा और पवन गुप्ता तीनों की याचिका 9 जुलाई, 2018 को ही खारिज हो गई। सिर्फ अक्षय टाकुर का रिव्यू पिटीशन 18 दिसंबर, 2019 को रद्द हुआ, जिसने पिछले साल 10 दिसंबर को सबके बाद दायर ही किया था।

    क्यूरेटिव पिटीशन का विकल्प लिए बैठे रहे दोषी

    क्यूरेटिव पिटीशन का विकल्प लिए बैठे रहे दोषी

    खेल देखिए कि रिव्यू पिटीशन खारिज होने के बावजूद क्यूरेटिव पिटीशन दर्ज करने में भी महीनों से लेकर सालों लगा दिए गए। मसलन, अक्षय ने इसे 550 दिन बाद, विनय ने 549 दिन बाद और पवन गुप्ता ने सबसे बाद 598 दिनों बाद दायर की। अक्षय टाकुर को भी क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करने में 42 दिन लग गए। मामला यहीं तक नहीं रुका। अक्षय और विनय शर्मा की ओर से दया याचिका खारिज होने के खिलाफ भी याचिका डालकर फांसी में अड़ेंगा लगाने की कोशिश की गई। मानसिक बीमारी और वारदात के वक्त पवन के जुवेनाइल होने जैसे हथकंडे तो अलग थे। लेकिन, धीरे-धीरे कानून के तहत ही उन सबकी फांसी का रास्ता लगभग साफ हो चुका है।

    सात साल से ज्यादा वक्त से इंसाफ का इंतजार

    सात साल से ज्यादा वक्त से इंसाफ का इंतजार

    निर्भया के साथ गैंगरेप और हत्या के सात साल और ढाई महीने गुजर चुके हैं। 16 दिसंबर, 2012 की रात 23 साल की पैरामेडिकल की स्टूडेंट निर्भया (काल्पनिक नाम) के साथ 6 लोगों ने चलती बस में बर्बरता को अंजाम दिया और उसके शरीर के साथ हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं। दरिदों ने वारदात के बाद पीड़िता को उसके पुरुष मित्र के साथ चलती बस से नीचे फेंक दिया। बाद में पीड़िता ने सिंगापुर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। इस केस के 6 में से एक आरोपी ने ट्रायल के दौरान ही तिहाड़ जेल में खुदकुशी कर ली। जबकि, छठा आरोपी (जो कि सबसे खतरनाक बताया गया ) नाबालिग होने की वजह से बाल सुधार गृह में मामूली वक्त गुजार कर बरी हो गया और फिलहाल दक्षिण भारत के किसी इलाके में गोपनीय तरीके से नई जिंदगी (उसके बारे में किसी के पास कोई जानकारी नहीं है) जी रहा है। हालांकि अभी भी यह असमंजस बरकरार है कि 20 तारीख को फांसी होगी या कोई नई तारीख आएगी

    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+