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नए लेबर कानून से क्या घट जाएगी आपकी टेक-होम सैलरी? आपके लिए क्या बदलेगा, कर्मचारियों के लिए काम की खबर

New labour laws: देश में लागू हुए नए लेबर कोड्स (लेबर लॉ) को लेकर कर्मचारियों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन बदलावों से उनकी टेक-होम सैलरी (इनहैंड सैलरी) पर क्या असर पड़ेगा। क्या महीने के आखिरी में मिलने वाली रकम कम हो जाएगी? या फिर यह बदलाव लंबे समय में आपके लिए फायदेमंद साबित होंगे?

सरकार ने पुराने श्रम कानूनों को समेटकर चार बड़े लेबर कोड्स के रूप में नया रोजगार ढांचा तैयार किया है। इनका सीधा असर आपकी सैलरी स्ट्रक्चर, काम के घंटे, सोशल सिक्योरिटी और नौकरी की सुरक्षा पर पड़ता है। यहां हम सरल भाषा में समझेंगे कि नए लेबर कानून आपके लिए क्या बदलने वाले हैं और क्यों आपकी जेब पर इनका टेक-होम सैलरी पर भी असर दिख सकता है।

New labour laws take home salary

🟡बेसिक सैलरी का नया फॉर्मूला: टेक-होम क्यों हो सकती है कम

नए लेबर कोड्स का सबसे बड़ा बदलाव 'वेज' यानी वेतन की परिभाषा में हुआ है। अब कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके कुल CTC का कम से कम 50% हिस्सा बेसिक सैलरी, डीए और रिटेनिंग अलाउंस मिलाकर बनाया जाए।

अब तक कई कंपनियां बेसिक सैलरी को जानबूझकर कम रखती थीं और अलग-अलग अलाउंस बढ़ाकर PF और ग्रेच्युटी की देनदारी घटाती थीं। नए नियम के बाद यह खेल खत्म होने जा रहा है। चूंकि PF और ग्रेच्युटी की गणना बेसिक सैलरी पर होती है, इसलिए जैसे ही बेसिक बढ़ेगा, आपके PF और ग्रेच्युटी के लिए काटी जाने वाली रकम भी बढ़ जाएगी।

इसका सीधा असर टेक-होम पर पड़ता है, क्योंकि PF में बढ़ी हुई रकम आपकी जेब से ही जाती है। यानी हाथ में आने वाली मासिक सैलरी कम हो सकती है लेकिन रिटायरमेंट फंड अधिक मजबूत बनेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक ज्यादातर कर्मचारियों को शुरुआत में टेक-होम घटने का असर महसूस होगा। लेकिन ये कर्मचारियों के हित में ही होगा।

🟡कर्मचारियों की सैलरी स्ट्रक्चर में क्या बदलाव आएंगे

नए नियमों के तहत कंपनियों को अपने कर्मचारियों का सैलरी ब्रेकअप फिर से तय करना होगा। अगर किसी कंपनी ने अब तक बेसिक पे कम रखकर भत्तों को ज्यादा रखा था, तो अब उसे सैलरी स्ट्रक्चर को रीबैलेंस करना होगा।

श्रम कानूनों के जानकार बताते हैं कि दो तरह की स्थिति बन सकती है:

  • 1. कंपनी वेतन बढ़ाए बिना PF और ग्रेच्युटी के लिए कटौती बढ़ा दे, जिससे टेक-होम कम हो जाएगा।
  • 2. कुछ कंपनियां कर्मचारियों का CTC थोड़ा बढ़ा सकती हैं, ताकि टेक-होम पर असर कम पड़े।

हालांकि यह पूरी तरह कंपनी की नीतियों पर निर्भर करेगा कि वह इन बदलावों को कैसे लागू करती है।

🟡PF और ग्रेच्युटी बढ़ने का मतलब क्या है

नई वेतन परिभाषा के बाद भविष्य निधि (PF) में आपकी और कंपनी दोनों की हिस्सेदारी बढ़ेगी। PF बेसिक सैलरी का 12% होता है और चूंकि अब बेसिक ही बढ़ेगा, इसलिए PF भी बढ़ेगा।

ग्रेच्युटी की गणना भी अंतिम बेसिक और सेवा अवधि पर होती है। नई वेतन परिभाषा के बाद कंपनियों को कर्मचारियों को ज्यादा ग्रेच्युटी देनी होगी। लंबे समय में यह कर्मचारियों के लिए एक बड़ा फायदा है, भले ही अभी टेक-होम पर असर पड़े।

🟡यूनिफाइड वेज डेफिनिशन: पूरे देश में एक जैसा नियम

नए लेबर कोड्स का मकसद वेतन से जुड़े नियमों में देशभर में एकरूपता लाना है। पहले अलग-अलग सेक्टर और राज्यों में वेतन की परिभाषा बदली-बदली होती थी। अब यूनिफाइड वेज डेफिनिशन लागू होने के बाद सब जगह एक ही नियम लागू होगा।

इससे यह लाभ मिलेगा कि PF, पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सोशल सिक्योरिटी लाभों की गणना एक तय पैटर्न पर होगी, जिससे कंपनियों और कर्मचारियों दोनों के लिए भ्रम कम होगा।

🟡ओवरटाइम, भुगतान और भत्तों में बड़े बदलाव

नए नियमों के अनुसार...
• सभी कर्मचारियों को समय पर वेतन भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा।
• वेतन भुगतान नियम अब 24,000 रुपये महीने तक कमाने वाले लगभग हर कर्मचारी पर लागू होंगे।
• ओवरटाइम की दर दोगुनी तय की गई है।
• बिना अनुमति कोई भी कटौती नहीं की जा सकेगी।

ओवरटाइम को लेकर नई व्यवस्था विशेषकर उन कर्मचारियों के लिए राहत है जिनसे कंपनियां पहले कम लागत पर ज्यादा घंटे काम कराती थीं।

🟡काम के घंटे वही रहेंगे, लेकिन वर्क फ्रॉम होम को मिली मान्यता

काम के घंटे पुराने नियमों की तरह 8 घंटे प्रतिदिन और 48 घंटे प्रति सप्ताह ही रहेंगे। हालांकि कंपनियों और कर्मचारियों के बीच सहमति से 'फ्लेक्सिबल वीक स्ट्रक्चर' लागू किया जा सकता है। सबसे अहम बदलाव यह है कि पहली बार लेबर कोड्स में वर्क-फ्रॉम-होम को औपचारिक मान्यता दी गई है। IT और सर्विस सेक्टर के लिए यह खास उपयोगी साबित होगा।

🟡महिलाओं के लिए बढ़ी कार्य स्वतंत्रता

नए लेबर कानूनों के तहत महिलाएं अब अपनी सहमति से किसी भी शिफ्ट में काम कर सकती हैं, चाहे वह रात का समय ही क्यों न हो। कंपनियों को उनकी सुरक्षा के लिए उचित प्रावधान करने होंगे।

🟡छंटनी और रिट्रेंचमेंट के नियम बदले

नए कोड्स में 100 की जगह अब 300 कर्मचारियों की सीमा तय की गई है। यानी 300 से कम कर्मचारियों वाली कंपनियों को छंटनी, रिट्रेंचमेंट या यूनिट बंद करने के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी नहीं होगी।

कुछ राज्यों को इस सीमा को और बढ़ाने का अधिकार भी दिया गया है। इससे कंपनियों को ज्यादा लचीलापन मिलेगा, हालांकि कर्मचारियों में नौकरी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

🟡संगठित और असंगठित दोनों सेक्टर को आएगा सीधा लाभ

पहली बार सोशल सिक्योरिटी के दायरे में गिग वर्कर्स, प्लैटफॉर्म वर्कर्स और ठेका कर्मचारियों को भी शामिल किया गया है।
• एग्रीगेटर्स को अपने कारोबार का 1-2% सोशल सिक्योरिटी फंड में देना होगा।
• फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को अब सिर्फ एक साल की सेवा पर भी ग्रेच्युटी मिलेगी।

यह बदलाव उन लाखों लोगों को राहत देंगे जो ऐप-आधारित गिग वर्क या शॉर्ट-टर्म जॉब्स में लगे हैं।

🟡डिजिटल रिकॉर्ड और आसान कंप्लायंस

नए कोड्स के तहत 'इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर' की नई व्यवस्था शुरू होगी। निरीक्षण अब रैंडमाइज़्ड और डिजिटल तरीकों से होगा। कंपनियों के लिए 'वन लाइसेंस, वन रजिस्ट्रेशन, वन रिटर्न' व्यवस्था लागू होगी, जिससे कागजी झंझट कम होगा।

🟡क्या सच में टेक-होम सैलरी घटेगी? समझिए

साफ है कि नए लेबर कानूनों का उद्देश्य कर्मचारियों की दीर्घकालिक सुरक्षा को मजबूत करना है।
• PF और ग्रेच्युटी बढ़ेंगे
• रिटायरमेंट फंड मजबूत होगा
• गिग वर्कर्स तक को सुरक्षा मिलेगी
• सैलरी स्ट्रक्चर पारदर्शी बनेगा

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का तात्कालिक असर यह होगा कि अधिकांश कर्मचारियों की महीने की टेक-होम सैलरी थोड़ी कम दिखाई दे सकती है। यह प्रभाव कंपनी की सैलरी स्ट्रक्चरिंग पॉलिसी पर भी निर्भर करेगा। कुछ कंपनियां CTC बढ़ाकर इस बदलाव को न्यूट्रल कर सकती हैं, जबकि कुछ यह बोझ कर्मचारियों पर डाल सकती हैं।

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