New Criminal laws bill: अंग्रेजों के कानून बदलकर मोदी सरकार ने दिए 3 बड़े सियासी संदेश
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने शुक्रवार को अंग्रेजों के जमाने के तीनों आपराधिक कानूनों की जगह जो नए भारतीय कानून बनाने के लिए तीन विधेयक पेश किए हैं, उसका दूरगामी सियासी संदेश जा सकता है। तीनों विधेयक लोकसभा में पेश करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की एक लाइन गौर करने वाली है- 'सजा नहीं, न्याय देना लक्ष्य होगा'।
मोदी सरकार ने आईपीसी की जगह भारतीय न्याय संहिता, सीआरपीसी के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और इंडियन एविडेंस ऐक्ट के स्थान पर भारतीय साक्ष्य विधेयक पेश किए हैं, जिसपर अब संसद की स्थायी समिति में मंथन होना है।

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तीन बड़े सियासी संदेश
अगर मोटे तौर पर तीनों नए विधेयकों पर गौर करें तो संकेत साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने आईपीसी, सीआरपीसी और इंडियन एविडेंस ऐक्ट की जगह जो तीनों नए विधेयक सामने रखे हैं, उसके माध्यम से वह महिला सुरक्षा, नफरत-विरोधी और सशक्त कानून और व्यवस्था के लिए एक निर्भीक, बड़ा और सख्त संदेश देना चाहती है।
महिला सुरक्षा के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण
नए विधेयक में पहचान छिपाकर किसी महिला से शादी करना या उसके साथ विवाह, प्रमोशन या रोजगार का वादा करके शारीरिक संबंध बनाना पहली बार अपराध माना आएगा। खासकर शहरी इलाकों में इस तरह के मामले बहुत ही तेजी से बढ़े हैं। अब इसके दोषियों को 10 साल तक की सजा मिलेगी और जुर्माना भी वसूला जा सकेगा।
इसी तरह गैंगरेप के प्रत्येक दोषियों के लिए अब 20 साल की जेल या उम्र कैद की सजा का प्रावधान होगा। यह जघन्य अपराध अगर 18 साल से कम की लड़की के साथ होता है तो अब मृत्युदंड का प्रावधान रखा गया है। वहीं 12 साल से कम उम्र की बच्ची से रेप के दोषी को कम से कम 20 साल की सजा होगी, जिसे उम्र कैद या मृत्युदंड तक बढ़ाए जाने का प्रावधान होगा।
यही नहीं, नए विधेयक में यह भी प्रावधान है कि रेप के बाद यदि महिला की मौत हो जाती है या वह निष्क्रिय अवस्था में चली जाती है तो दोषी को कम से कम 20 साल की सजा होगी, जिसे कि उम्र कैद या मृत्यु दंड तक में बदला जा सकता है।
नफरत के खिलाफ दृष्टिकोण
हाल के वर्षों में मॉब लिंचिंग की कई घटनाएं सामने आई हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इसको लेकर बहुत ही गंभीर है। इनमें से कई मामलों में आरोपी कथित गोरक्षक रहे हैं, जिसकी वजह से बीजेपी और उसकी सरकार पर विपक्ष हमलावर रहा है। लेकिन, नए विधेयक में मॉब लिंचिंग के खिलाफ कानून लाकर मोदी सरकार ने समाज के उस तबके को मरहम लगाने की कोशिश की है, जो पीड़ित हो रहे हैं।
नए प्रावधान के तहत मॉब लिंचिंग की घटनाओं में अब कम से कम सात साल की सजा होगी और अपराध की गंभीरता के हिसाब से दोषियों को उम्र कैद या मृत्युदंड की भी सजा मिलेगी। मॉब लिंचिंग के दायरे में वह मामले आएंगे, जो अपराध कुल वंश, जाति या समुदाय के खिलाफ किया जाएगा।
कानून और व्यवस्था मजबूत बनाने वाला दृष्टिकोण
नए विधेयक में उन अपराधों को भी शामिल किया गया है, जिसके लिए खास प्रावधान नहीं होने की वजह से अपराधी बड़े आसानी से अपधार करके बच निकलते थे। इसके तहत अब स्नैचिंग, हिट एंड रन के मामलों को तो शामिल किया ही गया है, संगठित अपराध का दायरा भी बढ़ाया गया है।
जैसे स्ननैचिंग की घटनाएं पिछले कुछ दशकों में बेतहाशा बढ़ी हैं। कानून का पालन करने वाली एजेंसियों ऐसे अपराधियों को सख्त सजा दिलवाने में नाकाम रहने के लिए कड़े कानूनी प्रवधानों की कमी का रोना रोते थे। लेकिन, अब सख्त सजा की व्यवस्था की गई है। इसी तरह से हिट एंड रन के मामले में पीड़ित की मौत होने पर अब 10 साल की सजा के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
इसी तरह से संगठित अपराध की परिभाषा का विस्तार किया गया है, जिससे ऐसे हर तरह के गैंग इसके दायरे में आ सकेंगे, जो अभी तक कानून की कमी का फायदा उठाकर बहुत कम सजा के बाद मुक्त हो जाते थे।
इन सबके अलावा नए कानूनों में एफआईआर की प्रक्रिया भी आसान की गई है और ट्रायल से लेकर फैसले तक को समय-सीमा में बांधा गया है, जिससे आम लोगों में भी न्याय मिलने का भरोसा जग सकता है। लोकसभा चुनाव से पहले यह तमाम ऐसे मसले हैं, जो जाति-धर्म से ऊपर उठकर एक आम भारतीय को प्रभावित कर सकते हैं और लगता है कि मोदी सरकार ने इसके माध्यम से एक मास्टरस्ट्रोक चलने की कोशिश की है।












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