नेपाल में प्रचंड कैबिनेट के मुस्लिम मंत्री अब्दुल ख़ान ने भारत और पीएम मोदी के बारे में क्या कहा

अब्दुल ख़ान
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अब्दुल ख़ान

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल 'प्रचंड' की कैबिनेट में एक मुस्लिम मंत्री हैं, अब्दुल ख़ान. 37 साल के अब्दुल ख़ान मधेस इलाक़े में बर्दिया ज़िले के हैं. यह ज़िला भारत के उत्तर प्रदेश के बहराइच से लगा है.

अब्दुल ख़ान जनमत पार्टी से सांसद हैं. जनमत पार्टी चंद्रकांत राउत की पार्टी है. चंद्रकांत राउत ने इस बार सप्तरी-2 से जनता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री उपेंद्र यादव को बड़े अंतर से हराया था.

जनमत पार्टी के कुल छह सांसद हैं और उन्होंने प्रचंड को समर्थन दिया है.

अब्दुल ख़ान को प्रचंड कैबिनेट में खानेपानी मंत्री बनाया गया है. खानेपानी मंत्री यानी जल मंत्री. अब्दुल ख़ान और उनकी पार्टी के अध्यक्ष सीके राउत इस मंत्रालय से ख़ुश नहीं हैं.

सीके राउत और अब्दुल ख़ान दोनों ने बीबीसी हिंदी से कहा कि उन्होंने इस मंत्रालय को स्वीकार नहीं किया है.

हालाँकि, अब्दुल ख़ान नेपाल की राजधानी काठमांडू स्थित मंत्री के आवास में शिफ़्ट हो गए हैं.

आवास के बाहर लिखा भी है- खानेपानी मंत्री अब्दुल ख़ान.

अब्दुल ख़ान का कहना है कि प्रचंड ने उन्हें उद्योग और व्यापार मंत्रालय देने का वादा किया था, लेकिन मंत्रालय आबंटित करते समय कुछ और ही दे दिया.

चंद्रकांत राउत
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चंद्रकांत राउत

अब्दुल ख़ान की कहानी

अब्दुल ख़ान के मंत्री के पद तक पहुँचने की कहानी काफ़ी रोचक है. उनके पिता इमाम ख़ान बाँस की टोकरी बनाते थे.

अब्दुल ने अपनी पढ़ाई बर्दिया के ही सरकारी स्कूल से की है और ग्रैजुएशन काठमांडू से. अभी वे मास्टर की पढ़ाई कर रहे हैं.

ग्रैजुएशन की पढ़ाई के बाद ख़ान मधेसी आंदोलन से जुड़ गए. मधेसी आंदोलन के दौरान वे 2011 में जेल भी गए.

अब्दुल ख़ान बताते हैं कि आंदोलन के दौरान पुलिस ने काफ़ी प्रताड़ित किया था.

वे बताते हैं कि पुलिस ने उनके पिता के सीने पर बंदूक इस तरह सटाई थी कि उसका दाग़ लंबे समय तक रहा था.

अब्दुल कहते हैं, ''जब मैं मंत्री बनकर घर गया तो पिता गले लगाकर रो पड़े. मेरे परिवार का गुज़र-बसर अब भी खेती-किसानी से ही होता है. पिता बुज़ुर्ग हो गए हैं, इसलिए अब टोकरी वाला काम नहीं करते हैं. दो और भाई हैं और दोनों खेती करते हैं.

मैं सबसे छोटा हूँ. मेरी शादी 13 साल में हो गई थी. तब मैं आठवीं क्लास में ही पढ़ता था. अब जब मैं सांसद और मंत्री बन गया तो घर वालों को लगता है कि आंदोलन में शामिल होकर कोई ख़राब काम नहीं किया था. सीके राउत जी ने पार्टी में काम करने का मौक़ा दिया और मैंने भी ख़ूब मेहनत की थी.''

सीके राउत
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सीके राउत

चंद्रकांत राउत का आंदोलन

सीके राउत ने क्रैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की है और वहीं नौकरी करते थे. 2011 के बाद राउत नेपाल लौटे थे और अलग मधेस देश बनाने का आंदोलन शुरू किया था.

इसके लिए राउत कई साल तक अंडरग्राउंड भी रहे थे. मैंने सीके राउत से पूछा कि उन्होंने ख़ुद मंत्री बनने के बजाय अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति को मौक़ा क्यों दिया?

राउत ने कहा कि अब्दुल ख़ान ने पार्टी को बनाने में बहुत मेहनत की थी, इसीलिए उन्हें मौक़ा दिया गया.

अब्दुल ख़ान से उनके सरकारी आवास पर मिलने गया तो कुछ नेपाली पत्रकारों ने तंज़ करते हुए कहा, ''आपके भारत में लगभग 20 फ़ीसदी मुसलमान हैं, लेकिन एक भी मंत्री नहीं हैं. नेपाल में मुश्किल से चार-पाँच फ़ीसदी मुसलमान हैं और एक मुस्लिम मंत्री हैं. भारत को भले दुनिया का बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, लेकिन नेपाल नया लोकतंत्र होकर भी इस लिहाज़ से ज़्यादा समावेशी है.''

नेपाली पत्रकारों के इस तंज़ के बारे में अब्दुल ख़ान से पूछा तो उन्होंने कहा, ''मेरा मानना है कि नेपाल के लोग राजनीतिक रूप से ज़्यादा सजग हैं. यहाँ राजनीतिक चेतना ज़्यादा है. इतने मुस्लिम होने के बावजूद अगर भारत में कोई मंत्री नहीं बन पा रहा है, तो इसका मतलब यही है कि उनमें राजनीतिक चेतना का अभाव है.

या यह भी हो सकता है कि उनको वहाँ बनने नहीं दिया जा रहा है. नेपाल छोटा देश है, लेकिन कई तरह के आंदोलन जारी रहते हैं इसलिए लोग राजनीति को लेकर ज़्यादा सजग हैं.''

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सीके राउत के साथ अब्दुल ख़ान
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सीके राउत के साथ अब्दुल ख़ान

भारत में अल्पसंख्यकों से जुड़े विवाद का असर नेपाल के मुसलमानों पर

अब्दुल ख़ान कहते हैं कि भारत में अल्पसंख्यकों को लेकर कुछ विवाद होता है, तो नेपाल के मुसलमान सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं.

ख़ान कहते हैं, ''मधेस के मुसलमान सीधा प्रभावित होते हैं. राम मंदिर को लेकर भारत में कुछ होता है, तो नेपाल में तनाव बढ़ जाता है. राम मंदिर को लेकर यहाँ के लोग भी संगठित होने लगते हैं. यहाँ भी बहस चलने लगती है कि मुस्लिम बहुत हावी हो रहे हैं और राम मंदिर के लिए हिन्दुओं को एकजुट होना चाहिए.

राम मंदिर निर्माण के लिए नेपाल से ईंट और पत्थर जाने चाहिए. हमारी पार्टी को लेकर कहा जाता है कि इंडिया से संचालित है. ऐसे में जनमत पार्टी मज़बूत होगी, तो मुसलमानों के साथ जो भारत में हो रहा है, वही नेपाल में भी होगा. ऐसे में मुस्लिम जनमत पार्टी से जुड़ने पर परहेज़ करते हैं.''

अब्दुल ख़ान कहते हैं कि भारत में क्या हो रहा है, इससे उन्हें मतलब नहीं है, लेकिन सबको अपने-अपने धर्म को लेकर आज़ादी मिलनी चाहिए.

ख़ान कहते हैं, ''मैं यह नहीं कहूँगा कि नेपाल में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत अच्छा है. अगर ऐसा होता तो नेपाल की जो बड़ी पार्टियाँ हैं, ख़ासकर प्रचंड और ओली की पार्टी के साथ नेपाली कांग्रेस में भी मुसलमानों की मौजूदगी होती. लेकिन ऐसा नहीं है. नेपाल की संसद में कुल छह सांसद हैं और वे भी समानुपातिक प्रणाली से हैं.''

अब्दुल ख़ान
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अब्दुल ख़ान

अब्दुल ख़ान कहते हैं कि वे मधेस के जिस इलाक़े से हैं, वहाँ से उत्तर प्रदेश ज़्यादा पास है और काठमांडू ज़्यादा दूर.

अब्दुल ख़ान ने उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी के गढ़ गोरखपुर से जुड़ा एक अनुभव साझा करते हुए कहा, ''मधेसी आंदोलन के सिलसिले में ही मैं अपने एक दोस्त के साथ गोरखपुर गया था. हमने योजना बनाई कि गोरखपुर मंदिर की धर्मशाला में रह जाएँगे. तब बहुत पैसे भी नहीं होते थे. मेरे दोस्त ने जाकर वहाँ रहने के लिए पूछा तो उन्होंने आईकार्ड मांगा.

मेरे आईकार्ड पर अब्दुल ख़ान नाम लिखा देख मना कर दिया और कहा कि यहाँ से निकल जाओ. ज़ाहिर है मुसलमान होने के कारण ही नहीं रखा, लेकिन मुझे बुरा नहीं लगा. मैंने यही सोचा कि कई ऐसे इस्लामिक संगठन होंगे जहाँ, हिन्दू होने की वजह से उन्हें जगह नहीं मिलती होगी.''

नेपाल के मुसलमानों से बात कीजिए, तो वह कहते हैं कि यहाँ मुसलमान होना मुश्किल नहीं है बल्कि मधेसी होना मुश्किल है.

अब्दुल ख़ान भी इस बात को मानते हैं कि मधेसियों के साथ भेदभाव थम नहीं रहा है बल्कि उसे संविधान सम्मत बनाया जा रहा है.

वे कहते हैं कि मधेसियों की नागरिकता के मुद्दे पर भारत को भी आगे आना चाहिए.

मधेसी भाषा में ली शपथ

ख़ान ने सांसद बनने के बाद ख़ुद के साथ हुए एक वाक़ये को साझा करते हुए कहा, ''मैं अपने दोस्तों के साथ सुंधारा में एक जगह पर घूमने गया था. एक दोस्त ने गेट पर पूछा कि अंदर जा सकते हैं तो गार्ड ने कहा कि यहाँ भारतीय नहीं जा सकते हैं. उन्हें लग रहा था कि हम भारतीय हैं.

सांसद बनने के बाद भी नेपाल की रूलिंग क्लास के बीच हमारी स्वीकार्यता यही है. काठमांडू में हमें सब भारतीय कहते हैं. लेकिन उत्तर में नेपाल की सीमा जहाँ चीन से लगती है, वहाँ नेपाल के लोग जो चीनियों की तरह दिखते हैं, उन्हें हमने कभी चीनी नहीं कहा.''

सीके राउत ने सांसद चुने जाने के बाद शपथ मधेसी भाषा में ली थी. इसे लेकर काफ़ी विवाद हुआ था.

लोगों ने सवाल उठाया कि जो भाषा लिस्टेड नहीं है, उसमें शपथ नहीं ली जा सकती है.

सीके राउत से पूछा कि उन्होंने नेपाली में शपथ क्यों नहीं ली?

राउत ने कहा, ''हमारी मातृभाषा नेपाली नहीं है. नेपाली तो मजबूरी में सीखनी पड़ी. मेरी मातृभाषा मधेसी है, जिसमें अवधी, भोजपुरी, मैथिली और हिंदी है. हमें अपनी मातृभाषा में शपथ लेने से कोई नहीं रोक सकता है.''

इससे पहले 2008 में परमानंद झा ने उपराष्ट्रपति पद की शपथ हिंदी में ली थी, तो नेपाल में काफ़ी बवाल हुआ था. काठमांडू में हिंसक विरोध-प्रदर्शन हुए थे.

यहाँ तक कि परमानंद झा के घर में बम विस्फोट भी किया गया था. मामला सुप्रीम कोर्ट में गया था और परमानंद झा की हिंदी में शपथ को अमान्य क़रार दिया गया था.

अब्दुल ख़ान भारत और पीएम मोदी के बारे में क्या सोचते हैं?

भारत और पीएम मोदी के बारे में अब्दुल ख़ान क्या सोचते हैं.

इस सवाल पर ख़ान कहते हैं, ''भारत के बिना तो हमारे लिए ज़िंदा रहना ही मुश्किल है. नेपाल आत्मनिर्भर नहीं है. भारत के बिना हम नहीं रह सकते. भारत को भी चाहिए कि हमलोगों के प्रति संवेदनशील रहे. भारत के ख़िलाफ़ आंदोलन होता है, तो ठीक नहीं लगता है लेकिन इसका स्थायी समाधान होना चाहिए.

हम जिस कॉलेज में पढ़ते थे, वहाँ से नेपाली ट्रक में भरकर सीमा पर विरोध करने जाते थे कि भारत ने नेपाल की ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया है. भारत को इस विवाद को सुलझाना चाहिए. भारत को इस मुद्दे पर बातचीत करनी चाहिए. उसे राजहठ नहीं करना चाहिए.''

अब्दुल ख़ान आगे कहते हैं, ''भारत को यह भी सोचना चाहिए कि नेपाली जब भारत जाते हैं, तो करेंसी बदलने के लिए बहुत मुश्किलों का सामान करना पड़ता है. हम यहाँ भारतीय मुद्रा देते हैं तो लोग शक़ करने लगते हैं. एक तो हम भारतीयों की तरह दिखते हैं और ऊपर से भारतीय मुद्रा दो तो उनका शक और बढ़ जाता है. बॉर्डर पर दोनों तरफ़ से बदसलूकी की जाती है. हमें भारत का प्रशासन भिखारी कहता है. नेपाली सुरक्षा बल भी रिश्वत लेकर वहाँ से सामान लाने देते हैं, नहीं तो बदतमीजी करते हैं.''

नरेंद्र मोदी के बारे में अब्दुल ख़ान ने कहा, ''मेरी सोच है कि मोदी अच्छा काम कर रहे हैं. लोगों को मुफ़्त में अनाज मिल रहा है, आवास मिल रहा है. यह बहुत ही अच्छा है. भारत में बढ़िया सड़क बन रही है. लोगों के अकाउंट में सीधे पैसे आ जाते हैं. इससे भ्रष्टाचार भी कम हुआ है.''

नेपाल में कितने मुसलमान

नेपाल में 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी 11 लाख 62 हज़ार 370 है. यह संख्या नेपाल की कुल आबादी की चार से पाँच फ़ीसदी के बीच है.

अभी नेपाल की कुल आबादी दो करोड़ 86 लाख है. नेपाल के 97 फ़ीसदी मुसलमान तराई में रहते हैं और तीन फ़ीसदी काठमांडू के अलावा पश्चिमी पहाड़ी इलाक़ों में.

नेपाल में तराई की कुल आबादी का 10 फ़ीसदी हिस्सा मुसलमानों का है.

हालाँकि, कुछ मुस्लिम स्कॉलरों का मानना है कि नेपाल में मुसलमानों की असली आबादी 10 फ़ीसदी के आसपास है और तराई में इनकी तादाद 20 फ़ीसदी है.

नेपाल मानवाधिकार आयोग की अध्यक्षा रहीं मोहना अंसारी कहती हैं कि जनगणना में असली डेटा नहीं आ पाता.

वे कहती हैं, ''कई परिवार तो असली संख्या बताने से परहेज़ करते हैं. उन्हें लगता है कि कहीं सच्चाई जानने पर सरकार कुछ कार्रवाई तो नहीं करेगी. इसके अलावा, जनगणना में कई तरह की गड़बड़ियाँ भी होती हैं. मेरा मानना है कि नेपाल में मुसलमानों की असली आबादी 10 से 12 फ़ीसदी है.''

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