Naxal Encounter: कैसे एक छोटे से किसान आंदोलन से निकला नक्सलवाद, जानिए लाल आतंक की पूरी कहानी

Naxal Encounter: भारत एक बार फिर नक्सलवाद की कमर तोड़ने की ऐतिहासिक मुहिम में जुटा है। छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में सुरक्षा बलों ने बड़े स्तर पर नक्सली गतिविधियों को कुचलने में उल्लेखनीय सफलताएं हासिल की हैं। बासरवाजु और हिडिंबा जैसे शीर्ष नक्सली कमांडर मारे जा चुके हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2026 तक देश को नक्सलवाद-मुक्त करने का संकल्प दोहराया है। यह रणनीतिक अभियान केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई नहीं है, यह उस विचारधारा के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई है जिसने भारत के कई हिस्सों में दशकों से खून बहाया है।

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लेकिन सवाल यही है आखिर यह "लाल आतंक" शुरू कहां से हुआ? वह कौन-सा बीज था जो बाद में हिंसक विद्रोह की एक विशाल वटवृक्ष बन गया?

नक्सलबाड़ी जहां से उठी पहली चिंगारी

साल 1967, पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले का एक छोटा-सा गांव नक्सलबाड़ी। यह गांव हमेशा के लिए भारतीय राजनीति के मानचित्र पर दर्ज हो गया, जब किसानों और मजदूरों के शोषण के खिलाफ एक स्थानीय विद्रोह ने देशभर में उबाल ला दिया। यह आंदोलन उस समय के सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ था, जिसने वर्षों से गरीबों, भूमिहीनों और आदिवासियों की अनदेखी की थी।

इस विद्रोह की पृष्ठभूमि दो वर्षों से तैयार की जा रही थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के कैडर धीरे-धीरे इस क्षेत्र में गरीब किसानों को संगठित कर रहे थे। उनका मानना था कि सच्चा समाजवादी परिवर्तन केवल तब संभव है जब मजदूर और किसान मिलकर शोषकों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करें। इस आंदोलन को आकार देने में चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

चारु मजूमदार ने उस समय कहा था कि "देश में एक आदर्श क्रांतिकारी स्थिति है, जिसमें सभी पारंपरिक लक्षण मौजूद हैं।" 25 मई 1967 को इन नेताओं ने औपचारिक रूप से किसान विद्रोह की शुरुआत की। हालांकि, राज्य सरकार की प्रतिक्रिया सख्त थी। आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने बर्बरता दिखाई। बावजूद इसके, नक्सलबाड़ी की यह चिंगारी जल्द ही पूरे देश में फैल गई।

आंदोलन का बदलता गया स्वरुप

नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश तक फैल गया। 2000 के बाद मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ और बिहार से झारखंड अलग राज्य बने, और नक्सली गतिविधियों का केंद्रबिंदु बना बस्तर विशेषकर अबूझमाड़ का घना जंगल, जो आज भी माओवादियों का सुरक्षित गढ़ बना हुआ है।

आंदोलन के कई गुटों ने भूमिगत लड़ाई को अपनी रणनीति बनाया। इनमें सबसे प्रमुख रहा कोंडापल्ली सीतारामैया का गुट। सीतारामैया ने राजनीति से नाता तोड़ने के बाद शिक्षण कार्य में कदम रखा, लेकिन 1974 में फिर से सीपीआई (एमएल) से जुड़ गए और आंध्र प्रदेश इकाई के सचिव बने।

22 अप्रैल 1980 को उन्होंने पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) की स्थापना की, जो भारत में सशस्त्र संघर्ष को संस्थागत रूप देने की दिशा में एक बड़ा कदम था। इस समूह ने चीन की विचारधारा से दूरी बनाई, लेकिन भूमिगत लड़ाई की नीति नहीं छोड़ी। परिणामस्वरूप, ये गुट अन्य वामपंथी संगठनों से अलग-थलग पड़ते गए।

नक्सलवाद का वर्तमान स्वरूप

2000 के दशक में माओवादियों ने किसानों के अधिकारों से हटकर सीधे राज्य सत्ता से सशस्त्र संघर्ष की राह पकड़ ली। अब वे ग्रामीण जनजीवन के बीच छिपकर, राज्य पुलिस और सुरक्षा बलों पर हमले करने लगे। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जैसे जिलों में इन्होंने मजबूत पकड़ बना ली। अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लिए अभियान चलाना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ।

2009 में केंद्र सरकार ने "ऑपरेशन ग्रीन हंट" नामक अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य माओवादियों की ताकत को खत्म करना था। लेकिन सफलता सीमित रही। माओवादी हिंसा की घटनाएं अब भी समय-समय पर सामने आती रहती हैं।

नक्सलबाड़ी का आंदोलन एक ऐतिहासिक मोड़ था जिसने भारत में किसान, मजदूर और छात्र आंदोलनों को एक नई दिशा दी। परंतु समय के साथ इसकी विचारधारा और रणनीति बदलती गई। किसानों के हक की लड़ाई एक खूनी सशस्त्र संघर्ष में तब्दील हो गई। नक्सलबाड़ी की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के सामाजिक संघर्ष, उसके असंतोष और उसकी चेतना की कहानी है जो आज भी प्रासंगिक है।

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