काशी की सियासत में मोदी की 'सुनामी', अबकी बार मोदी सरकार की गूंज

2014 के लोकसभा चुनाव से बनारस भी ‘सियासत के गढ़ों' की गिनती में खड़ा हो गया है। 62 साल से शांत पड़ी काशी अपनी ही चाल में चल रहा थी। मगर राजनीतिक दिग्गजों, फिल्मी अभिनेताओं, देश भर की मीडिया टीमों की मौजूदगी ने बनारस को इतिहास के पन्नों में एक अहम स्थान दिला दिया है।
देश-दुनिया में बनारस की चर्चा अभी तक संत समाज में ही होती थी। मगर आज राष्ट्रीय और अन्तर्रराष्ट्रीय स्तर के लोगों की नजर वाराणसी पर टिकी हुई है। कांग्रेस अपने गढ़ अमेठी में ही मूंह की खा रही है।
अब बनारस में भी उनको पीठ दिखानी पड़ेगी। अभी तक कांग्रेस के साथ खडे़ रहने वाले काशी के रसूखदार भी भाजपा का दामन थामते नजर आ रहे हैं। काशी के संतो के अनुसार जब धरती पर अत्याचार और आतंक बढ़ता है, भगवान खुद धरतीवासियों को बचाने के लिए अवतार लेते हैं।
ऐसे ही पिछले 60 साल से समस्त भारतवासी भी दुख-परेशानियों के बीच किसी सुख के पल का इंतजार कर रहे थे। अब वक्त आ गया है कि कांग्रेस के अत्याचार से देश को मुक्ति मिल जाएगी। भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को जिताकर जनता सुख चैन के दिन बिताएगी।












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