कृषि कानूनों की वापसी, फिर भी भाजपा के लिए 'अब सब ठीक' कहना जल्दबाजी क्यों?
कृषि कानूनों की वापसी, फिर भी भाजपा के लिए 'अब सब ठीक' कहना जल्दबाजी क्यों?
नई दिल्ली, 19 नवंबर: केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार जून 2020 में तीन नए कृषि कानून लेकर थी। जिनमें जमाखोरी से पाबंदी हटाने और निजी क्षेत्र को खेती में लाने समेत कई प्रवाधान किए गए थे। इन कानूनों के खिलाफ ऐसा जबरदस्त आंदोलन हुआ जो ना भारत बल्कि विश्व में अपनी तरह का अकेला आंदोलन है। इस सबके बाद करीब डेढ़ साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की मांगों के आगे झुकते हुए तीन कानूनों की वापसी का ऐलान कर दिया है। भाजपा, सत्ता के समर्थक लोग और मीडिया इसको पीएम का शानदार फैसला बताते हुए अब किसान और सरकार के बीच की खाई पटने और सब ठीक हो जाने की बात रहे हैं। यकीनन ये बड़ा फैसला है लेकिन क्या वाकई अब सब ठीक हो गया है? क्या पंजाब, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों के चुनावों में अब इसका खराब असर भाजपा पर नहीं होगा?

सरकार के पास अभी भी कई जवाब नहीं
इन कानूनों के आने के बाद कश्मीर से केरल तक किसानों ने प्रदर्शन किए। दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर तो ऐतिहासिक धरना चल ही रहा है। इस सबसे भाजपा नेताओं को काफी परेशानी की सामना अपने क्षेत्र में करना पड़ रहा था। खासतौर से हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश में किसान और भाजपा नेताओं में कई बार टकराव की स्थिति बनी। अब पीएम मोदी ने माफी मांग ली है लेकिन क्या उनकी माफी के बाद बीजेपी के रिश्ते किसानों से एकदम सामान्य हो जाएंगे? इस सवाल का जवाब नहीं है। इसकी वजह ये है कृषि कानूनों को जिस तरह से अध्यादेश के जरिए लाया गया, उसके बाद संसद में एक तरह से जबरदस्ती करते हुए इनको पास किया गया, वो सब किसानों ने देखा है। जिस तरह से कुछ निजी कंपनियां इस तरह का निवेश कर रही थीं, जो इन कानूनों से जुड़ा लगता है। वो भी किसानों ने देखा है। ऐसे में जब भाजपा नेता किसान के बीच जाएंगे तो हो सकता है उनका विरोध ना हो लेकिन कुछ सवालों के जवाब तो अभी भी उनसे किसान मांगेगे ही।

बयान नहीं भूले किसान, ना लखीमपुर अभी पुरानी बात
इन कानूनों के आने के बाद जो भाषा कई बीजेपी नेताओं ने बोली, वो सीधे तौर पर किसानों का मजाक बनाने वाली रही। कई बहुत सीनियर नेता और मंत्री तक ने कभी किसान को किसी दल के एजेंट तो कभी उनकी धार्मिक पहचान को लेकर भद्दी टिप्पणियां कीं। यूपी के लखीमपुर खीरी में तो हाल ही में भाजपा नेता और केंद्र में मंत्री के परिवार के लोगों ने जिस तरह से कथित तौर पर किसानों पर जीप चढ़ाई और गोलियां चलाई, वो किसान क्या भूल गए हैं। ऐसे में शायद बीजेपी नेता और किसानों के बीच पुराना विश्वास आने में अभी समय तो लगेगा।

आंदोलन ने एक चेतना लाने का किया काम
कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में एक और चीज देखने को मिली, किसानों के एक बड़े वर्ग ने चीजों को अच्छे से समझा है। दरअसल सरकार समर्थित मीडिया और लोगों ने लगातार किसानों के बीच जाकर 'कानून क्या हैं और इनमें गलत क्या है' जैसे सवाल किए। इस सबने किसानों को कृषि को लेकर ज्यादा जानकारी जुटाने को प्रेरित किया। आंदोलनों में बैठे लोगों ने एमएसपी हो या कृषि में सरकारों का किया काम हो, इसको काफी समझा है। ऐसे में अगर कल कोई सिर्फ खुद का लाया कानून वापस लेकर वोट मांगने किसान के बीच जाएगा तो जाहिर है कि उसको कई मुश्किल सवालों का सामना किसान से करना पड़ेगा।

चुनाव में भाजपा होगा फायदा, इस पर सवाल
उत्तर प्रदेश और पंजाब में जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने हैं। अब सवाल ये है कि क्या भाजपा को इस फैसले से फायदा होगा। साफ है कि फायदा तो नहीं होगा लेकिन शायद नुकसान कम होगा। डेढ़ साल से आंदोलन कर रहे किसान अब भाजपा के वोटर हो जाएंगे ये मुश्किल लगता है, इतना जरूर है कि भाजपा अब पंजाब में कम से कम इलेक्शन लड़ सकेगी।












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