Exclusive: पढि़ए भाजपा के पहले मुस्लिम सांसद मुख्तार अब्बास नकवी का सफरनामा

इलाहाबाद । मुख्तार अब्बास नकवी, यह नाम आज हिंदुस्तान में किसी पहचान का मोहताज नहीं। लेकिन एक आम नाम को खास बनाने का सफर जिस गुमनामी के अंधेरे से रोशन हुआ है वह इतिहास में कभी-कभी ही दर्ज होता है। हिंदुओ की पार्टी कही जाने वाली भाजपा के पहले मुस्लिम सांसद बनने वाले नकवी वर्षों से मुस्लिम चेहरे का स्तंभ हैं और आज केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बनकर बीजेपी की प्रथम पंक्ति में सबसे कद्दावर सख्शियत बन चुके हैं। आज oneindia आप के लिये एक एक्सक्लूसिव स्टोरी लेकर आया है। जिसमें आप मुस्कुराती सख्शियत, वजनदार आवाज, नपे तुले शब्द और विरोधियों पर सटीक टिप्पणी से अपनी खुद की राजनैतिक स्टाइल बनाने वाले नकवी का पूरा सफरनामा पढ सकेंगे।
यह स्टोरी मुख्तार अब्बास नकवी के इलाहाबाद स्थित पैतृक गांव व उनके परिजनों की स्मृति पर तैयार की गई है। जिसमें उनके भाई हैदर अब्बास ने हमारे लिये अहम जानकारियां उपलब्ध करायी।

रत्नों के व्यापारी के घर आया अनमोल रत्न

रत्नों के व्यापारी के घर आया अनमोल रत्न

इलाहाबाद के हंडिया तहसील में प्रतापपुर ब्लाक पड़ता है। यही का एक छोटा सा गांव है भदारी। इस गांव में अख्तारुल हसन एक पारखी रत्न व्यापारी थे। वह यूपी के बरेली में रत्नों का व्यापार करते थे। यह वही बरेली है जिसे हिंदी फिल्म के सदाबहार गीत " झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में" ने ख्याति दे दी थी। रत्नों के व्यापारी के घर 15 अक्‍टूबर 1957 को मुख्तार के रूप में एक अनमोल रत्न ने जन्म लिया। आज मुख्तार अब्बास नकवी के पिता तो दुनिया में नहीं है। लेकिन उनके इस पैतृक गांव में परिजन यादे संजोये हुये हैं। नकवी हर मोहर्रम के त्योहार से लेकर किसी फंक्शन पर घर आना नहीं भूलते हैं। भाई हैदर बताते हैं कि वही आज भी जब घर आते हैं तो राजनैतिक सितारा बनकर नहीं। बल्कि मुख्तार के रूप में सबका दुलारा ही बनकर आते हैं और वैसे ही जमीन पर बैठकर साथ खाना और हंसना होता है। जैसे बचपन से होता आया है।

ऐसे सीखी राजनीति

ऐसे सीखी राजनीति

स्कूल लाइफ खत्म होने के बाद जैसे ही मुख्तार ने कालेज की राह पकड़ी। उनका मन राजनीति में लग गया। पहले वह घर से रोज कालेज आया जाया करते थे। फिर वह शहर में ही रहकर पढाई करने लगे। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढाई के दौरान पहली बार जब वह समाजवादी नेता राजनारायण से मिले तो मानो वशीभूत हो गये।

उन्हे उनका रंग ढंग अंदाज भा गया। नकवी भी अब वह सत्ता के विपरीत दिशा में बहना चाह रहे थे। क्योंकि उसमे उन्हे मजा आ रहा था। नकवी कयी लोक आंदोलनों में हिस्‍सा लेने लगे। जिससे उनकी नजदीकी राजनारायण से बहुत अधिक बढ़ गई। जब जनता पार्टी के बैनर तले राजनारायण ने प्रधानमंत्री रही इंदिरा गांधी को पहले रायबरेली चुनाव और फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में भी हराकर इतिहास रच दिया।तब तो वह नकवी समेत पूरे जनता दल के हीरो बन चुके थे। नयी उम्र के नकवी में जोश की कमी तो थी । इसलिये वह आंदोलन में बढ चढकर हिस्सा लेते। आपात काल में नकवी को भी जेल जाना पड़ा। परन्तु तब तक नकवी को राजनीति की हर सीख मिल चुकी थी और वह निरंतर अपना कद बढा रहे थे। जनता पार्टी में सदस्यता के बाद से उनकी जिम्मेदारी बढी और 1978-79 में युवा जनता (जनता पार्टी की युवा इकाई) के उपाध्‍यक्ष बना दिये गये।
इश्क में हार गये दिल, पर फैली अफवाह

इश्क में हार गये दिल, पर फैली अफवाह

कॉलेज में डैसिंग नेता कहे जाने वाले मुख्तार अब्बास के जीवन में एक बड़ा दिलचस्प वाक्या भी हुआ। जो उनकी जिंदगी का बेशकीमती पल था। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढाई के दौरान ही वह कालेज की छात्रा सीमा से इश्क कर बैठे। इश्क में दिलचस्पी तो नकवी हार गये। लेकिन आगे का रास्ता बहुत कठिन था। क्योंकि दोनों अलग समुदाय के थे। जमकर हंगामा हुआ । परिजन शादी के पूरी तरह खिलाफ थे। अफवाह फैली की सीमा एक कद्दावर हिंदू नेता की बेटी है। हालांकि यह सच था कि सीमा हिंदू थी। लेकिन सीमा को जिनकी बेटी कहा जा रहा था। दरअसल उन्होंने कभी शादी ही नहीं की थी। 3 जून 1983 को नकवी ने कोर्ट मैरेज कर ली और फिर मुस्लिम रीति रिवाज से निकाह व हिंदू रिवाज से शादी कर ली। आज इनका हंसता खेलता परिवार है। इनसे एक बेटा अरशद है।

भाजपा ने बदल दी तस्वीर

भाजपा ने बदल दी तस्वीर

नकवी ने मास कम्‍युनिकेशन से स्‍नातकोत्‍तर के साथ डिप्‍लोमा पूरा किया और पूरी तरह से राजनीति में उतर आये। जनता पार्टी से जुड़े होने के साथ ही राजनारायण से नजदीकी ने नकवी के लिये चुनावी रास्ते खोल दिये। जनता पार्टी ने सबसे पहले उन्हे चुनाव के लिये टिकट दिया।

नकवी ने यूपी विधान सभा चुनाव में उतरे। इलाहाबाद पश्चिम सीट से पहला ही चुनाव नकवी हार गये। 1989 में नकवी को टिकट नहीं दिया गया तो वह अयोध्या विधान सभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़े और फिर हार गये। फिर यूपी की मऊ विधान सभा सीट पर किस्मत अजमाने पहुंचे।यहां लगातार तीन विधान सभा चुनाव में उन्हे हार का सामना करना पड़ा। लेकिन फिर नकवी की किस्मत के बंद ताले जनता दल से भाजपा के बनने के बाद खुले। भाजपा में आते ही नकवी को 1992 से 1997 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष बनाया गया। लेकिन नकवी को फिर से चुनाव लड़ने का मौका मिला।पर इस बार चुनाव विधान सभा के बजाय लोकसभा का था। नकवी भाजपा के टिकट पर 1998 में रामपुर से लोकसभा का चुनाव लड़े । 1998-99 में पहली बार नकवी बारहवीं लोकसभा के सदस्‍य के रूप में निर्वाचित हुए। यह पहला मौका था। जब भाजपा से कोई मुस्लिम चेहरा सांसद बना था। सांसदी जीतकर नकवी सीधे अटल बिहारी बाजपेई सरकार में सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री बन गये। इसके बाद नकवी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और नित नई उंचाईयां छूते गये।
बढता गया कद

बढता गया कद

सन 2000 में नकवी को बड़ा पद मिला और भारतीय जनता पार्टी का राष्‍ट्रीय सचिव बनाया गया। फिर तो भाजपा के मुख्य धरे की नकवी जान बन गये। अपने खास अंदाज से वह भाजपा के मुस्लिम चेहरों के नायाब स्तंभ बन गये। 2002 में राज्‍यसभा के सदस्‍य निर्वाचित हुए और 2003 में उन्‍हें राष्‍ट्रीय हज कमेटी का सदस्‍य बना दिया गया। जनवरी 2006 में नकवी को भाजपा का राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष बनाया गया है और यह पद आज भी बरकरार है। 2010 के राज्‍यसभा चुनावों में भी नकवी ने जीत दर्ज की और मई 2011 के बाद वह नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सदस्‍य भी है। मौजूदा मोदी सरकार में एक दिन पहले तक नकवी अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री थे। अब जब 2019 लोकसभा चुनाव में लगभग 20 महीने बाकी हैं। तब मोदी कैबिनेट में फेरबदल होने लगा। जिसमे मुख्तार अब्बास नकवी को भी प्रमोशन दिया गया और उन्हे कैबिनेट मंत्री बना दिया गया है।

एक रूप यह भी

एक रूप यह भी

कैबिनेट मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी सिर्फ राजनेता नहीं है। बल्कि अपनी शिक्षा दीक्षा व राजनीति की बारीक समझ के चलते किताबे भी लिखते हैं। यानी वह एक लेखक भी हैं। उनकी अब तक तीन किताबे प्रकाशित हो चुकी हैं. जिनमे स्‍याह, 1991, दंगा 1998 और वैशाली 2007 शामिल है।

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