कृषि कानून से पहले एक और अध्यादेश को वापस ले चुकी है मोदी सरकार, किसानों ने ही किया था भारी विरोध
Modi government has withdrawn land acquisition bill in 2015 before the farm laws
नई दिल्ली, 20 नवंबर। कल से ही देश की सियासत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस फैसले की चर्चा हो रही है, जिसमें उन्होंने कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी। भले ही पीएम मोदी के इस फैसले के पीछे अलग-अलग कारण गिनाए जा रहे हों, लेकिन असल मायने में किसानों के विरोध के आगे सरकार को झुकना पड़ा है, ये कहना गलत नहीं होगा। किसानों का आंदोलन पिछले एक साल से चल रहा था। किसान इस बात पर अड़ गए थे कि जब तक कृषि कानून वापस नहीं लिए गए, तब तक वो धरनास्थल से नहीं जाएंगे। आपको बता दें कि ये कोई पहली बार नहीं है, जब मोदी सरकार को विरोध के आगे इस तरह अपना फैसला वापस लेना पड़ा हो।

किसानों के विरोध के चलते भूमि अधिग्रहण बिल लेना पड़ा था वापस
इससे पहले भी मोदी सरकार विरोध की वजह से एक बिल को वापिस ले चुकी है। ये बात मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की है, जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के कुछ समय बाद ही भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को वापस लेना पड़ा था। उस वक्त भी किसानों ने इस अध्यादेश का विरोध किया था। किसानों के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी इस अध्यादेश का जबरदस्त विरोध किया था। इसी का नतीजा था कि सरकार को अध्यादेश वापस लेना पड़ा था।

जानिए क्या था भूमि अधिग्रहण बिल
नरेंद्र मोदी ने 2014 में बतौर देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली थी। पद संभालने के 2-3 महीने के बाद ही उनकी सरकार संसद में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लेकर आई थी, जिसमें ये प्रावधान था कि भूमि अधिग्रहण को सरल बनाने के लिए किसानों की सहमति की जरूरत नहीं होगी। इससे पहले भूमि अधिग्रहण के लिए किसी भी गांव के करीब 80 फीसदी किसानों की सहमति होना जरूरी था। अध्यादेश में इसी प्रावधान का किसानों ने विरोध किया था।
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31 अगस्त 2015 को सरकार ने वापस लिया था अध्यादेश
हालांकि अध्यादेश में इसके अलावा किसानों के लिए कई बड़े ऐलान किए गए थे, जिसमें नई पुनर्वास पैकेज की घोषणा भी थी, लेकिन किसानों ने फिर भी इसका विरोध किया और सरकार को 31 अगस्त 2015 को वो अध्यादेश वापस लेना पड़ा।नए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में पुनर्वास पैकेज था। इसके अनुसार जिन किसानों की भूमि अधिग्रहित की जाती उन्हें भारी भरकम मुआवजा दिया जाना था। इसके अलावा जमीन अधिग्रहण के कारण जो भूमिहीन किसान बेरोजगार हो सकते थे, उन्हें सरकार ने हर महीने 3 हजार रुपए देने का वादा किया था।
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