कौन थीं बुधनी मंझियाइन? जिन्हें बुलाया जाता था नेहरू की आदिवासी पत्नी, जीवन भर झेलती रहीं बहिष्कार का दंश
झारखंड के धनबाद जिले निवासी बुधनी मंझियाइन का 4 दिन पहले यानी 17 नवंबर को 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। मंझियाइन झारखंड की कोई साधारण महिला नहीं थी। 1959 में जब वह मात्र 16 साल की थीं, तब एक घटना ने उनका जीवन हमेशा के लिए बदल दिया और उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू की 'आदिवासी पत्नी' के नाम से जाना जाने लगा।
इस नाम की वजह से मंझियाइन को उसके समुदाय ने बहिष्कृत कर दिया। हालांकि, अब मंझियाइन के निधन के बाद अब स्थानीय लोगों ने उनके सम्मान में एक स्मारक और पेंशन की मांग की है। आखिर क्या है मंझियाइन और नेहरू का किस्सा?

फोटो क्रेडिट - नेहरूवादी फेसबुक पेज
बात है 6 दिसंबर 1959 की। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू झारखंड के धनबाद जिले में दामोदर वैली कॉरपोरेशन की ओर से निर्मित पंचेत डैम और हाईडल पावर प्लांट का उद्घाटन करने पहुंचने वाले थे। उस वक्त संथाल समुदाय के लोगों ने तय किया कि पंडित नेहरू जी का स्वागत 16 साल की आदिवासी लड़की बुधनी मंझियाइन करेंगी। तय कार्यक्रम के मुताबिक, नेहरू जी के आगमन पर बुधनी मंझियाइन ने फूलों की माला पहनाकर उनका स्वागत किया। वहीं, नेहरू जी ने भी सम्मान करते हुए अपने गले की माला उतारकर आदिवासी लड़की बुधनी मंझियाइन को वापस पहना दी। जिसके बाद बुधनी मंझियाइन की जिंदगी ने अलग ही मोड ले लिया।
क्यों बुलाते हैं मंझियाइन को पत्नी?
दरअसल, संथाल आदिवासी समाज में उस वक्त एक परंपरा थी कि कोई भी लड़की या लड़का किसी दूसरे को माला पहनाता है, तो उसे विवाह की संज्ञा दी जाती थी। यानी कि दोनों का विवाह माना जाता था। इसलिए मंझियाइन को नेहरू जी की पत्नी के नाम से जाना जाने लगा। इस नाम के आरोप में मंझियाइन को संथाल समाज से उनके ही समुदाय के लोगों ने बहिष्कृत कर दिया।












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