मातंगिनी हाजरा: ऐसी वीरांगना जिसने 73 साल की उम्र में 'आजादी का झंडा' लिए सीने पर खाई 3 गोलियां
मातंगिनी हाजरा: ऐसी वीरांगना जिसने 73 साल की उम्र में 'आजादी का झंडा' लिए सीने पर खाई 3 गोलियां
नई दिल्ली, 24 जुलाई: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं ने भी कंधे से कंधा मिलाकर देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी। भारतीय स्वतंत्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा (Mathangini Hazra) उन्ही महिलाओं में से एक हैं। मातंगिनी हाजरा देश के लिए 73 साल की उम्र में अपनी जान दे दी और शहीद हो गईं। 1869 में तामलुक के पास होगला नामक गांव में जन्मी मातंगिनी हाजरा अपने समय की एक असामान्य महिला थीं। उसके प्रारंभिक वर्षों के लिए सार्वजनिक रूप से अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार के अभिलेखागार में उपलब्ध शोध के मुताबिक वह एक गरीब किसान की बेटी थी। जिनके पिता उनकी औपचारिक शिक्षा का खर्च नहीं उठा पाए।

मातंगिनी हाजरा कैसे बनीं "गांधी बरी"
जानकारी के मुताबिक मातंगिनी हाजरा की 12 साल की उम्र में मेदिनीपुर के अलीनान गांव के एक 60 वर्षीय व्यक्ति त्रिलोचन हाजरा से शादी कर दी गई थी। 18 साल की उम्र में मातंगिनी हाजरा बिना किसी संतान के विधवा हो गईं। अपने पति के निधन के बाद मातंगिनी हाजरा खुद को सामाजिक कामों के लिए समर्पित करना शुरू कर दिया। 1900 के दशक की शुरुआत में राष्ट्रवादी आंदोलन ने जोर पकड़ना शुरू किया था। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जागरूकता बढ़ाने के लिए इस इलाके में बड़े पैमाने पर यात्रा की। इसी दौरान मातंगिनी हाजरा महात्मा गांधी के विश्वासों से इतनी प्रेरित हुईं कि वह नेता की एक समर्पित अनुयायी बन गईं, उन्होंने खुद को "गांधी बरी" नाम दिया।

हाथ में झंडा लिए मातंगिनी हाजरा....
'code name god' के किताब के मुताबि "गांधी के लिए मातंगिनी का प्यार इतना महान था कि वह गांव में गांधी बुरी, बूढ़ी गांधीवादी महिला के रूप में पहचाने जाने लगी थीं। 1933 में तमलुक जिले में एक स्वतंत्रता मार्च आयोजित किया गया था। इसका गंतव्य राज्यपाल का महल था, जो अपनी बालकनी में खड़े थे और मार्च को देख रहे थे जैसे कि कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो...। इस दौरान मातंगिनी ने स्वतंत्रता आंदोलन का झंडा ऊंचा रखते हुए परेड की अगुवाई की। जैसे ही मातंगिनी गवर्नर की बालकनी के सामने पहुंचीं, उन्होंने अचानक अपने बैनर को लहराते हुए संगीन घेरा तोड़ दिया, और चिल्लाया, "वापस जाओ, साहब"। इसके बाद ब्रिटिश पुलिस ने मातंगिनी हाजरा पर हमला किया, जिसके बाद वह घायल हो गईं।

6 महीने के लिए हुईं गिरफ्तार
किताब के मुताबिक परेड की अगुवाई वाली घटना के बाद ब्रिटिश-विरोधी काम करने की वजह से मातंगिनी हाजरा को फौरन गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके बाद उन्हें छह महीने की कड़ी मेहनत की सजा सुनाई गई। इस घटना ने एक महिला को शारीरिक रूप से बहुत अधिक प्रभावित किया। जेल से निकलने के बाद वह बहुत कमजोर और कुपोषित हो गई। अपनी शारीरिक स्थिति के बावजूद, मातंगिनी हाजरा गांधी की कट्टर अनुयायी बनी रहीं। जेल से निकलते ही वह फौरन सामाजिक कार्यों में वापस लग गईं।

सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी यात्रा के लिए भी हुईं गिरफ्तार
61 साल की उम्र में मातंगिनी हाजरा को 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन और गांधी के नेतृत्व में दांडी यात्रा में भाग लेने के लिए गिरफ्तार किया गया था। सविनय अवज्ञा आंदोलन में उनकी भागीदारी के कारण जेल में कई बार उन्हें जाना पड़ा, जिसके दौरान वह अन्य महिला क्रांतिकारियों से मिलीं, जिन्हें उनकी ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के लिए जेल भी भेजा गया था। इस वक्त तक मातंगिनी हाजरा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सक्रिय सदस्य बन गई थीं।

कई बार गईं जेल, कई बार हुआ हमला, लेकिन टूटी नहीं मातंगिनी हाजरा
मातंगिनी हाजरा पर कई बार ब्रिटिश अधिकारियों ने हमला किया, कई बार वो जेल गईं, इसके बावजूद वह ब्रिटिश शासन से लड़ने और देश की स्वतंत्रता के लिए पूरी तरह से समर्पित रहीं। अगस्त 1942 में गांधी द्वारा शुरू किए गए भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भागीदारी और भी तेज हो गई। मेदिनीपुर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थानीय शाखा के सदस्यों ने भारत छोड़ो आंदोलन के माध्यम से अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के मार्ग में पहले कदम के रूप में जिले में स्थानीय सरकारी कार्यालयों और पुलिस स्टेशनों पर नियंत्रण करने का प्रस्ताव रखा था। साल 1942 के सितंबर में 73 वर्षीय हाजरा ने लगभग 6,000 प्रदर्शनकारियों के एक बड़े जुलूस का नेतृत्व किया, जिनमें ज्यादातर महिलाएं थीं। जुलूस ब्रिटिश अधिकारियों से तामलुक पुलिस स्टेशन पर कब्जा करने के उद्देश्य से मार्च किया गया था।

73 साल की उम्र में ऐसे देश के लिए शहीद हो गईं मातंगिनी हाजरा
प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प में, हाजरा अपने हाथों में स्वतंत्रता आंदोलन का झंडा लेकर आगे बढ़ीं, ताकि पुलिस से जुलूस में गोली न चलाने की अपील की जा सके। लेकिन पुलिस ने उनकी बातें नहां सुनी और ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों ने उनपर तीन गोलियां चलाईं। घायल होने के बाद भी वह 'वंदे मातरम' का नारा लगाते रहीं और स्वतंत्रता ध्वज के साथ मार्च करना जारी रखा, जब तक कि वह गिरकर वीरगति को प्राप्त नहीं हो गईं।
मेदिनीपुर जिला सरकार के अभिलेखागार के अनुसार, हाजरा की हत्या ने उन्हें कई लोगों के लिए शहीद बना दिया, क्रांतिकारियों को मेदिनीपुर में अपनी स्थानीय सरकार स्थापित करने के लिए उकसाया, जब तक कि दो साल बाद 1944 में गांधी के अनुरोध पर इसे भंग नहीं कर दिया गया।
मातंगिनी हाजरा को ये देश कभी नहीं भूल पाएगा देश की आजादी के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। 1977 में कोलकाता मैदान में महिला क्रांतिकारी मातंगिनी हाजरा की मूर्ति भी बनाई गई है।












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