इससे पहले जेएनयू में कब-कब हुईं देश-विरोधी गतिविधियां

राजधानी दिल्ली में लाल दुर्ग के तौर पर विख्यात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की हालिया घटनाओं पर सियासी हंगामे ने देश का ध्यान पहली बार अपनी ओर आकर्षित किया है। संभवत: यह पहला मौका है, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जेएनयू में लगे देशविरोधी नारे विश्वविद्यालय की चारदीवारी के बाहर ठोस सबूतों के सामने आए हैं।

#JNU ROW: सोशल मीडिया पर जमकर बंट रहे हैं 'देशभक्ति के नुस्खे'

Many times JNU witnessed anti-national activities

हकीकत तो यही है कि विचारों के लोकतंत्र के नाम पर ऐसा काफी पहले से होता रहा है। चूंकि इस बार ठोस सबूतों के लिए कुछ लोगों ने तैयारी की और इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग की, इसलिए लाल दुर्ग की यह कड़वी हकीकत दुनिया के सामने आई है।

जेएनयू वीडियो पर सवाल

यह बात और है कि कभी इसी विश्वविद्यालय की चारदीवारी से राजनीति की दुनिया में कदम रखने वाले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मौजूदा महासचिव सीताराम येचुरी इस वीडियो पर ही सवाल उठा रहे हैं। सवाल तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव डी राजा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव प्रकाश करात भी उठा रहे हैं।

खबरों की दुनिया में एक कहावत कही जाती है कि तसवीरें कभी झूठ नहीं बोलतीं। इन तसवीरों को गलत बताने की चाहे जितनी भी कोशिश की जा रही हो, लेकिन येचुरी, करात और डी राजा के सामने यह कहावत ही संकट बन कर खड़ी हो गई हैं। उनकी अपीलों को विश्वविद्यालय की चारदीवारी के भीतर भले ही समर्थन मिल रहा हो, लेकिन जिस मुनिरका, बेरसराय और किशनगढ़ के पुश्तैनी गांवों पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय बना है, उनमें उनकी अपीलों और दलीलों का असर नहीं हो रहा है।

इन गांवों में विश्वविद्यालय में लगे देश विरोधी नारों को लेकर जिस तरह से उबाल उठा है, उससे भारतीय वामपंथी राजनीति की सीमाएं भी उजागर हुई हैं। इस गुस्से ने साफ किया है कि भारतीय वामपंथी राजनीति किस कदर स्थानीय सोच और संस्कृति से दूर रही है।

पहले भी हुए हैं राष्ट्र-विरोधी कार्य

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अतीत में कई ऐसे काम हुए हैं, जिन्हें इस विश्वविद्यालय की चारदीवारी के बाहर शायद ही मान्यता दी जाती।

जब जीन का हिमायती बना जेएनयू

2004 में चीन ने अपने नक्शे पर अरूणाचल प्रदेश को भारत से अलग चीन का हिस्सा बता दिया था। छात्रसंघ में चुने गए कुछ पार्षदों ने इसके खिलाफ संकल्प पेश किया था। इस संकल्प में चीन की साम्राज्यवादी नीति के खिलाफ भी प्रस्ताव रखा गया। देशहित का यह प्रस्ताव कहीं और रखा जाता तो उसका शायद ही कोई विरोध करता। लेकिन जेएनयू छात्रसंघ में इसका जोरदार विरोध हुआ और प्रस्ताव गिर गया। उल्टे ऑफ द रिकॉर्ड चीन के कदम को सही ठहराया गया।

कश्मीर में विदेशी दखल जेएनयू को मंजूर

इसी तरह कश्मीर में विदेशी दखल के खिलाफ भी संकल्प पेश किया गया तो उसका भी जोरदार विरोध किया गया। और उसे भी पारित नहीं होने दिया गया।

नक्सलियों की सफलता पर जश्न

2010 के जून में जब छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों को घात लगाकर नक्सलियों ने मार गिराया, तब भी इसी विश्वविद्यालय में इसे भारतीय साम्राज्यवाद के खिलाफ नक्सलवाद की जीत के तौर पर शौर्य दिवस के तौर पर मनाया गया। तब ऐसा करते वक्त इस विश्वविद्यालय में शौर्य दिवस मनाने वाले कार्यकर्ता भूल गए कि मारे गए ज्यादातर सिपाही उसी तबके से आते हैं, जो मजलूम हैं और जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए नौकरियां करने को मजबूर हैं।

नक्सलवाद का समर्थन करते जेएनयू के छात्र

दो वक्त की रोटी का उसका भी संघर्ष उतना ही कठिन है, जितना उन दलितों और आदिवासियों के लिए है, जिसके पक्ष में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के बौद्धिक कहे जाने वाले छात्र नक्सलवाद का समर्थन करते रहे हैं।

लेखक परिचय- उमेश चतुर्वेदी टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।

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