ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के बाहर पार्टी को बढ़ाने में क्या केजरीवाल जैसी गलती कर रही हैं?

टीएमसी पश्चिम बंगाल के बाहर विस्तार में क्या 'आप' जैसी गलती कर रही है?

नई दिल्ली, 24 नवंबर: तृणमूल कांग्रेस का इस साल बड़े अंतर से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जीतना इस साल की बड़ी राजनीतिक घटनाओं में एक रहा है। मई में चुनाव के नतीजे आने के बाद टीएमसी और ममता नर्जी के लिए काफी कुछ बदला है। ममता बनर्जी को इसके बाद कई राजनीतिक विश्लेषकों ने नरेंद्र मोदी को टक्कर देने वाली विपक्षी नेता के तौर पर देखा। वहीं टीएमसी ने भी खुद को बंगाल के बाहर स्थापित करने का काम शुरू कर दिया। टीएमसी ने तेजी से कई राज्यों में अपने विस्तार की कोशिश की है। जिसका नतीजा हम देख रहे हैं कि एक के बाद कई नेता टीएमसी में जा रहे हैं। कोई भी पार्टी खुद को राज्य से निकालकर देशभर में फैलाना तो चाहेगी ही लेकिन कुछ बातों को देखें को लगता है कि टीमएसी से चूक हो रही है। ये कुछ ऐसा ही है, जैसा आम आदमी पार्टी से हुआ था।

टीएमसी क्यों आप की तरह लग रही है

टीएमसी क्यों आप की तरह लग रही है

टीएमसी में बीते कुछ महीनों में पश्चिम बंगाल के तो बीजेपी के कई बड़े नेता आए। जिसमें बहुत अजीब भी नहीं था लेकिन गोवा, त्रिपुरा, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों से से भी कई बड़े चेहरे या तो टीएमसी में आ चुके हैं या आने की चर्चा जोरो पर हैं। इसमें काफी कुछ ऐसा ही है, जैसा आम आदमी पार्टी के दिल्ली के अपने शुरू के दो इलेक्शन जीतने के बाद देखा गया था। तब आम आदमी पार्टी ने तेजी से देश में खुद को भाजपा का एक विकल्प के तौर पर पेश किया था और कई राज्यों में चुनाव लड़ा था। अब टीएमसी भी उसी राह पर दिख रही है।

ये कदम नुकसान क्यों दे सकता है?

ये कदम नुकसान क्यों दे सकता है?

हमने देखा था कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में जीत के बाद इलेक्शन तो लड़ी लेकिन उसे कोई खास सफलता पंजाब को छोड़कर और कहीं और नहीं मिली। कई राजनीतिक विश्वलेषकों का का मानना है कि आम आदमी पार्टी के लिए उस वक्त जो माहौल बना था, उसमें वो सिर्फ एक या दो राज्य पर ध्यान लगाते तो बेहतर रिजल्ट हो सकते थे। आज टीएमसी और ममता बनर्जी के लिए भी कहा जा सकता है कि अगर वो सिर्फ त्रिपुरा या गोवा पर अपना ध्यान लगाकर रखें तो शायद वहां एक ताकत बन सकें। अगर वो एक साथ उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा की ओर देखेंगी तो शायद कहीं भी प्रभाव छोड़ने में कामयाब ना हों।

अपने नेताओं को लेकर भी मुश्किल

अपने नेताओं को लेकर भी मुश्किल

ममता बनर्जी जिस तरह से पार्टी को बढ़ाने की कोशिश में हैं। उसमें देखा जा रहा है कि दूसरे राज्यों के बड़े नेताओं को शामिल करने के बाद पार्टी में पद दिए जा रहे हैं तो राज्यसभा भी भेजा जा रहा है। ऐसे में एक बड़ी परेशानी पार्टी के सामने ये भी होती है कि इससे पार्टी के पुराने नेता कई बार इससे असहज हो जाते हैं। पार्टी के पुराने नेता जो चुनाव हार गए हैं। ऐसे नेताओं को पार्टी से उम्मीद रहती है कि उनको संगठन में बड़ा पद मिलेगा या राज्यसभा भेज दिए जाएंगे। ऐसे में जब दूसरे दलों से आए नेता पार्टी में अहमियत पाते हैं तो अपनी पार्टी के भीतर भी एक असंतोष पैदा होने का खतरा बनता है।

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