सवालों में ही छिपा है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रासंगिकता का मर्म!

बेंगलुरू। 150 वर्ष बाद भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अगर भारतीय युवाओं की कौतुहल का विषय हैं, तो यही महात्मा गांधी की प्रासंगकिता का मर्म है, क्योंकि ऐसी जिज्ञासाएं ही सवालों को जन्म देती हैं और सवालों के मिले जवाबों से ही युवा मन गांधी को उनकी 300वीं जयंती तक दिलों में संजो कर रख पाएगी।

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पुत्र पिता से सवाल करता है और उसके पिता होने पर भी सवाल खड़े करता है, जिसके जवाब अश्वयंभावी हैं, लेकिन सवालों पर ही सवाल खड़े कर देना और कतराने लगने पर सवाल बड़े हो जाते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सवालों से परे कैसे हो सकते हैं, जिन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा हासिल है, जिनकी 132 करोड़ संतानें हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फॉदर ऑफ इंडिया करार दिया जाना उन लोगों को बुरा लगा जो खुद को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सगा और अन्यों को 30 जनवरी, वर्ष 1948 से सौतेला संतान मानकर बैठे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए फादर ऑफ इंडिया सुनना वरिष्ठ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा को इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने फादर ऑफ नेशन महात्मा गांधी के लिए इसे अपमान बता दिया।

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निः संदेह आज अगर गांधी जी जिंदा होते तो स्वघोषित सगी संतानों को देखकर भावुक हो जाते। गांधी सबके लिए सहज उपलब्ध थे। भारत जैसे एक विशाल देश में राष्ट्रपिता के रूप में उनकी स्वीकार्यता को बढ़ाने में मदद की थी। दिलचस्प बात यह है कि वर्तमान में अप्रसांगिक हो चुकी कांग्रेस को देश में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए गांधी जी और उनके नाम का सहारा लेना पड़ रहा है। 150वीं गांधी जयंती पर कांग्रेस पूरे देश में पैदल यात्रा यूं ही नहीं कर रही है।

फिल्मकार राजकुमार हिरानी की फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई में महात्मा गांधी और गांधीगिरी को बहुत सरल ढंग से फिल्माया गया है। फिल्म कहती है कि गांधी को पढ़कर गांधी को जाना सकता है। यानी गांधी को सवालों और जवाबों से परे रखकर समझना मुश्किल है। गांधीगिरी और गांधी के महात्मय को समझना तब तक मुश्किल है जब तक गांधी की प्रासंगिकता को सवालों और जवाबों की कसौटी पर नहीं कसा जाएगा।

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गांधीगिरी पर आधारित लगे रहो मुन्नाभाई महज तीन घंटे की फिल्म थी लोगों ने देखी और तीन घंटे बाद ही गांधीगिरी को भी भूल गए। ठीक ऐसा ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ पिछले 105 वर्षो में हुआ। वर्ष 1915 में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे। 15 अगस्त, वर्ष 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना औ 30 जनवरी, वर्ष 1948 को गांधी को शरीर त्यागना पड़ गया।

नाथूराम गोडसे नामक चरमपंथी के गोलियों के शिकार हुए महात्मा गांधी की मौत एक स्वाभाविक घटना थी, लेकिन कांग्रेस पार्टी द्वारा तब किया गया उनका बंटवारा पूरी तरह से अस्वाभाविक था। कांग्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन वाले इंडियन नेशनल कांग्रेस के महात्मा गांधी को सियासी खांचे वाले कांग्रेस में जड़कर खुद को उनका उत्तराधिकारी भी घोषित कर लिया।

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आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री चुने गए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बेटी प्रियदर्शनी इंदिरा के नाम के पीछे गांधी सरनेम जोड़ना भी सियासत था, जिससे रातों-रात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कांग्रेसी कुनबे के पितामह में बदल गए। इंदिरा गांधी से शुरू हुआ यह सिलसिला राहुल गांधी तक नहीं रूका है। गांधी सरनेम से कांग्रेस की सियासत की राह न केवल आसान हुई बल्कि कांग्रेस बेरोक-टोक 6-7 दशक तक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सत्ता पर काबिज रही।

कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की महानता को महानगरों के भवनों और चौराहों तक सीमित कर दिया। पूरे देश में महात्मा गांधी के शिलालेख और पुतले लगाए गए, लेकिन उनके दर्शन और आदर्शों को एक पेटी में बंद करके रखवा दिया। स्वच्छता और साफ-सफाई को एक आंदोलन का रूप देने वाले महात्मा गांधी के मिशन को एक अभियान की शक्ल देने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने जब स्वच्छ भारत अभियान की घोषणा की तब भी कांग्रेस पार्टी असहज थी, उसे लगा कि बीजेपी महात्मा गांधी को उनसे छीनने की कोशिश कर रही है।

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स्वच्छ भारत अभियान ने पूरे देश में सफाई के प्रति अलख जगाने में कामयाब हुई। कह सकते हैं कि वर्तमान में सही मायनों में राष्ट्रपिता गांधी के सपनों का भारत सजीवता की ओर उन्मुख है, लेकिन इसमें भी कांग्रेस राजनीतिक नुकसान तलाश रही है, जो पिछले 70 वर्षों में सरनेम छोड़कर गांधी के बताए किन्हीं एक पदचिन्हों को अंगीकार करने पहल किया हो।

राष्ट्रपिता गांधी पर आरोप लगता है कि वो प्रो मुस्लिम थे, जिसके चलते भारत- पाकिस्तान का विभाजन हुआ और विभाजन के दौरान खून की नदियां बहीं। कहा जाता है कि यही वह मुख्य वजह थी, जिसके चलते नाथूराम गोडसे नामक एक चरमपंथी ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी। गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को उसके किए की सजा मिली और उसे फांसी दी गई।

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कांग्रेस पार्टी ने नाथूराम गोडसे को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया और वोट बैंक की तरह मुस्लिम अल्पसंख्यकों का इस्तेमाल किया। मुस्लिम अल्पसंख्यक कांग्रेस के तब तक वोट बैंक बने रहे जब तक उन्हें पता नहीं चल सका कि उनका इस्तेमाल कांग्रेस महज सियासत के लिए कर रही है।

नाथूराम गोडसे महज एक चरमपंथी था, जो कभी भी हिंदू और सनातन धर्म का पर्याय नहीं हो सकता है। वसुधैव कुटुम्बकम् सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है, जो व्यक्ति, समुदाय और रंग में भेद नहीं सिखाता है। इसके मूल में है कि पूरी धरती ही परिवार है। यह अपना बन्धु है और यह अपना बन्धु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो सम्पूर्ण धरती ही परिवार है।

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कांग्रेस ने नाथूराम गोडसे के धर्म का टारगेट करके भारत की सनातन संस्कार के खिलाफ मुस्लिमों में इसलिए भरा ताकि खुद को मुस्लिमों का सबसे बड़ा हितैषी साबित कर सके और हुआ भी वही जो कांग्रेस ने चाहा। भारत की आजादी के 6-7 दशक बाद तक मुस्लिम अल्पसंख्यकों का वोट कांग्रेस को मिलता रहा। बदले में उन्हें क्या मिला यह मूल सवाल होना चाहिए, क्योंकि अगर कांग्रेस से मुस्लिम अल्पसंख्यकों को उनका हक मिला तो उन्हें सपा और बसपा समेत दूसरी बैसाखियों की जरूरत नहीं पड़ती।

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गांधी जयंती पर नाथूराम गोडसे के लिए गाए जा रहे प्रवचन भी सियासत का हिस्सा भर है। राष्ट्रवाद और कट्टर हिंदुत्व के नाम पर एक खास वर्ग द्वारा चलाए जा रहा यह मुहिम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के खिलाफ कम राजनीतिक सत्ता को बचाए रखने के लिए अधिक किया जा रहा है। नाथूराम गोडसे कभी भी हिंदुस्तान और हिन्दू विचारधारा के प्रतीक नहीं हो सकते हैं, क्योंकि हिंदू धर्म की विचारधारा कट्टरता से हमेशा परे रही है।

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वर्तमान में राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी सरकारें सत्ता में हैं, जिसके खिलाफ दुष्प्रचार के लिए नाथूराम गोडसे एक माध्यम से इतर कुछ नहीं हो सकते हैं। असहिष्णुता और मॉब लिंचिंग जैसे कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं, जो महज सियासत से प्रेरित मुहिम थे, यह आज किससे छुपा हुआ है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर सवाल करना और उनके औचित्व पर सवाल उठना गांधी की वजूद को और प्रगाढ़ बनाती है। शायद राष्ट्रपिता गांधी भी यही चाहते हैं। आज वो जिंदा होते तो बहुत खुश होते कि लोग उनके बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं वरना पिछले 71 वर्ष से गांधी को मूर्तियों और पुतलों में कैद कर सरकारी भवनों और नगर के चौराहों पर खड़ा कर दिया गया। गांधी जी चाहते थे कि लोग उनके विचारों से ओतप्रोत हों, उन्हें पढ़ें और जानें, लेकिन गांधी जी को महान बनाकर कांग्रेस ने पूजा करवानी शुरू कर दी, जिससे गांधी लोगों से दूर होते चले गए।

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जरूरत है राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को एक बार फिर प्रांसागिक बनाया जाए। फिलहाल नकारात्मक ही सही, लेकिन गांधी पर सवाल उठाने वाली चल रही मुहिम गांधी जी से लोगों को जोड़ने में फलदायी साबित हो रही है। इस मुहिम ने युवा मन में कौतुहल पैदा की है, जिससे लाइब्रेरी में रैक में कैद गांधी एक फिर लोगों के हाथों में पहुंच रहे हैं।

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