Maharashtra: शरद पवार आगे क्या करेंगे? एनसीपी पर चुनाव आयोग के फैसले के बाद पैदा हुईं 5 नई चुनौतियां
मराठा नेता शरद पवार अपने 6 दशकों के लंबे राजनीतिक सफर में अपने ही घर में सबसे मुश्किल परिस्थितियों में फंसे हैं। भारतीय राजनीति के इस धुरंधर को 84 साल की अवस्था में अपने उसी भतीजे ने सियासी मात दी है, जो उन्हीं का नाम लेकर सत्ता शिखर के करीब तक पहुंचे हैं।
1999 में शरद पवार ने जिस राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की स्थापना की थी, उस नाम और उसके चुनाव निशान 'घड़ी' पर भतीजे अजित पवार का कानूनी कब्जा हो चुका है। ऐसे में उम्र के इस पड़ाव पर बुजुर्ग पवार को राजनीतिक तौर पर आगे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता।

नाम और चुनाव निशान
पूर्ववर्ती एनसीपी के शरद पवार गुट को सबसे पहले अपना नया नाम और चुनाव निशान तय करने की जिम्मेदारी मिली। हमने पहले ही बताया था कि वह किसी तरह से अपनी नई राजनीतिक पार्टी में 'राष्ट्रवादी' और 'कांग्रेस' जैसे शब्दों को जरूर कायम रखने की कोशिश करेंगे।
वही हुआ चुनाव आयोग ने शरद पवार गुट के जिस नए नाम पर मुहर लगाई है वह है- 'राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरदचंद्र पवार'।
बुजुर्ग पवार के लिए बीते 25 वर्षों में 'घड़ी' उनकी राजनीतिक पहचान बन चुकी थी। संभावना है कि पवार के बैकग्राउंड को देखते हुए 'ट्रैक्टर', 'पहिया' या 'उगता हुआ सूरज' उनके चुनाव निशान का विकल्प हो सकता है।
विधानसभा अध्यक्ष का फैसला क्या होगा?
एनसीपी के नाम और पार्टी के चुनाव चिन्ह की लड़ाई शरद पवार चुनाव आयोग में हार चुके हैं। उनकी अगली चुनौती ये होगी कि एनसीपी के दोनों गुटों के विधायकों की अयोग्यता पर महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर का क्या फैसला आता है।
स्पीकर ने अजित पवार और शरद पवार दोनों गुटों की ओर से सुनवाई का काम 31 जनवरी, 2024 को ही पूरा कर लिया है और फैसला सुरक्षित है। 15 फरवरी तक वह भी इसपर फैसला सुनाने वाले हैं।
वैसे शरद पवार गुट को चुनाव आयोग के आदेश के बाद उसको लेकर भी ज्यादा उम्मीद नहीं है। क्योंकि, उनकी बेटी और पार्टी की लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने चुनाव आयोग के फैसले पर प्रतिक्रिया में कहा है, 'यह अदृश्य शक्ति की जीत है। जिस व्यक्ति ने पार्टी स्थापित की उसकी हार हुई है। लेकिन, मुझे हैरानी नहीं है।'
'हमें उसी तरह का आदेश मिला है, जैसा शिवसेना के खिलाफ आया था। ठाकरे परिवार के खिलाफ भी इसी तरह की साजिश रची गई...यह महाराष्ट्र के खिलाफ साजिश है।'
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
शरद पवार कैंप की ओर से साफ है कि वह अब इस लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे। सुप्रिया सुले ने चुनाव आयोग के फैसले के तुरंत बाद कहा, 'मैं समझती हूं कि जो शिवसेना के साथ हुआ, आज हमारे साथ भी वही हो रहा है। इसलिए यह कोई नया आदेश नहीं है। सिर्फ नाम बदला है, कंटेंट वही है। हम लड़ेंगे। हम निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।'
लेकिन, बुजुर्ग पवार की दिक्कत ये है कि सुप्रीम कोर्ट का संघर्ष लंबा होगा और लोकसभा चुनाव इसका इंतजार नहीं करेगा। सर्वोच्च अदालत से उन्हें चुनाव से पहले कोई बड़ी राहत मिलेगी, इसकी संभावना भी नहीं दिख रही है। दिग्गज नेता के 6 दशकों के अनुभव के लिए यह परीक्षा की घड़ी है।
गठबंधन में अहमियत बनाए रखने की चुनौती
शरद पवार महाराष्ट्र में प्रदेश के विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी (एमवीए) और लोकसभा चुनावों के लिए बने इंडिया ब्लॉक दोनों के प्रमुख नेता हैं। लेकिन, आज तथ्य यह है कि न तो उनकी पार्टी का नाम उनके साथ है और न ही चुनाव निशान।
यही स्थिति शिवसेना (यूबीटी) उद्धव ठाकरे के साथ भी है। लेकिन, दोनों में एक मूलभूत अंतर है। ठाकरे को परिवार के बाहर के शिवसैनिक से चुनौती मिली है।
लेकिन, शरद पवार अपने ही भतीजे से मात खा गए हैं। इसकी वजह से गठबंधन में उन्हें भले ही उनके अनुभव को सम्मान मिलता रहे, लेकिन सीटों के लिए उनके बार्गेनिंग पावर पर जरूर असर पड़ेगा।
बेटी को उत्तराधिकारी के तौर पर स्थापित करना
अजित पवार ने अपने चाचा के साथ लंबे समय तक महाराष्ट्र की राजनीति की है। वह उद्धव ठाकरे की तरह सीधे अपने पिता के नाम पर संगठन पर 'थोपे' नहीं गए हैं।
पवार की पार्टी में अजित पवार का वही रोल रहा है, जो कभी शिवसेना में बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे का हुआ करता था। यानी दोनों ने चाचा से ही राजनीति सीखी है तो उसे खुद से अनुभव भी किया है। अलबत्ता इस संघर्ष में अजित पवार अब कहीं ज्यादा मजबूत साबित हुए हैं।
यही नहीं अजित पवार की एनसीपी के साथ प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल जैसे पार्टी के दिग्गज नेता भी जुड़े हुए हैं। दूसरी तरफ अजित ने प्रदेश की राजनीति में आज अपनी एक अलग पहचान बना ली है।
ऐसे में शरद पवार के लिए भतीजे के मुकाबले में अब बेटी को असली उत्तराधिकारी के तौर पर पेश करना बहुत बड़ी चुनौती होगी।












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