महाराष्‍ट्र विधान सभा चुनाव 2019: शिवसेना को क्या नयी पहचान दिला पाएंगे आदित्‍य ठाकरे ?

बेंगलुरु। महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव 2019 शिवसेना पार्टी के लिए बहुत ही अहम हैं क्योंकि शिवसेना के इतिहास में ऐसा पहली बार है जब ठाकरे परिवार का कोई सदस्य चुनाव मैदान में उतरा है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के पुत्र व बाल ठाकरे के पौत्र आदित्य ठाकरे शिवसेना से वर्ली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में अपनी किस्‍मत अजमाने के लिए उतरे हैं।रोचक बात ये है कि दिवंगत बाल ठाकरे द्वारा 1966 में शिवसेना की स्थापना किए जाने के बाद से ठाकरे परिवार से किसी भी सदस्य ने कोई चुनाव नहीं लड़ा है या वे किसी भी संवैधानिक पद पर नहीं रहे हैं। आदित्‍य ठाकरे को मैदान में उतारना अपने आप में इतिहास हैं।अब यह सवाल उठता हैं कि राज्‍य में लगभग तय मानी जाने वाली अगली भाजपा-शिवसेना सरकार में आदित्‍य सहायक ड्राइवर (उपमुख्‍यमंत्री) बन पाएंगे? इसके साथ ही शिवसेना जो एक तरह से अस्तित्‍व के संकट से भी गुजर रही है उसको क्या नयी पहचान दिला पाएंगे?

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आदित्‍य के लिए वर्ली सीट का चुनाव केकवॉक के समान!

मुंबई की वर्ली कोलीवाला विधानसभा क्षेत्र की सीट शिवसेना की सबसे सुरक्षित विधानसभा सीटों में से एक समझा जाता है, इसलिए आदित्य की उम्मीदवारी को अंतिम रूप दिया गया है। माना जा रहा है कि उद्धव ठाकरे ने इस बार बेटे की सीट के चुनाव में भी राजनीतिक सूझबूझ दिखाई है। वर्ली सीट पर आदित्‍य का मुकाबला एनसीपी के सुरेश माने से है, जिन्‍हें तुलनात्‍मक रूप से हल्‍का उम्‍मीदवार माना जा रहा है। वैसे भी एनसीपी के लिए यहां अधिक है भी नहीं। 1990 से 2004 तक शिवसेना ने यहां से लगातार पांच जीत दर्ज की है।

हालांकि 2009 में एनसीपी के सचिन अहिर ने शिवसेना को हरा दिया था, लेकिन 2014 में सेना ने फिर यहां से जीत दर्ज की। खास बात यह है कि 2009 में एनसीपी की जीत में पार्टी नहीं, बल्कि अहिर का बड़ा रोल था और अहिर चंद दिनों पहले ही शिवसेना के हो चुके हैं। ऐसे में आदित्‍य के लिए यह चुनाव एक तरह से केकवॉक भी साबित हो सकता है। गौरतलब यह हैं कि मुंबई की वर्ली कोलीवाला विधानसभा क्षेत्र मछुआरों (कोली) का यह क्षेत्र परंपरागत रूप से शिवसेना का गढ़ रहा है और ये मराठी मछुआरे ही मूल रूप से मुंबई के रहे हैं।

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भाजपा और शिवसेना का गठबंधन

बता दें बीजेपी और शिवसेना पिछले 30 साल के एक-दूसरे की सहयोगी है। लेकिन कुछ वर्षों से गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। गठबंधन टूटने तक की नौबत आ गई थी। लेकिन सभी गिले-शिकवे भुलाकर दोनों पार्टियों ने 2019 लोकसभा चुनाव साथ लड़ा। इस बार भी विधानसभा चुनाव में सीटों के लिए टक्कर दिखाई दी, लेकिन बाद में दोनों पार्टियों में फिर सब ठीक हुआ। 2014 के चुनाव में बड़े भाई की अपनी हैसियत बनाए रखने के लिए शिवसेना ने अलग चुनाव लड़ा और 288 सीटों वाले विधानसभा में उसे महज 63 सीटों से संतोष करना पड़ा था। जबकि भाजपा को 122 सीटें मिली थीं। इसीलिए 2014 के चुनाव से पहले सीना चौड़ा करने वाली शिवसेना को चुनाव नतीजे के बाद भाजपा के साथ बगैर खास मान-मनौव्‍वल के सरकार में आना पड़ा और उपमुख्‍यमंत्री की दावेदारी भी उसे छोड़नी पड़ी।

भरसक भाजपा को सरकार बनाने में समर्थन देने के कई महीने बाद सेना को सरकार में जगह मिल पाई थी। इससे नाराज शिवसेना राज्‍य और केंद्र दोनों जगहों पर भाजपा सरकारों को लगातार घेरती रही। हालांकि भाजपा ने सधी हुई रणनीति के तहत शिवसेना को गठबंधन में बनाए रखा। भाजपा जानती है कि महाराष्‍ट्र में जब तक उसे बहुमत लायक आधार नहीं मिल जाता है, तब तक शिवसेना से अधिक विश्‍वसनीय पार्टनर उसे नहीं मिल सकता। इस बार चुनाव पूर्व गठबंधन के तहत भाजपा जहां 150 सीटों पर लड़ रही है, वहीं सेना को 124 सीटें ही मिली हैं। गौरतलब है कि कांग्रेस को 2014 के चुनाव में 42 और एनसीपी को 41 सीटें मिली थीं।

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आदित्य के कंधे पर शिवसेना को संकट से उबारने की जिम्मेदारी

साफ तौर पर इस बार की संभावित फडनवीस सरकार पहले के मुकाबले अधिक मजबूत होगी। बीते पांच साल में फडनवीस एक कुशल प्रशासक के रूप में उभरे हैं। जबकि पिछली बार वे प्रशासनिक मामलों में अनुभवहीन थे। इस बार बिखरे विपक्ष के कारण उन्‍हें और मजबूती मिली है और वे मास लीडर के रूप में भी उभरे हैं। राज्‍य अब उनमें भविष्‍य का नेतृत्‍व भी देख रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि फडनवीस के उभार ने आदित्‍य ठाकरे को भी चुनावी राजनीति में आने के लिए एक तरह से बाध्‍य कर दिया।

शिवसेना को इस बात का अब पूरा अंदेशा है कि अगर वक्‍त रहते ठाकरे परिवार का कोई सदस्‍य सामने नहीं आता है तो उसकी जमीन और सिमट जाएगी। पिछले एक दशक में कोंकण, विदर्भ और मराठवाड़ा में सेना के आधार में बड़ी कमी आई है। यहां तक कि पुणे और नासिक जैसे मजबूत गढ़ भी टूटते हुए दिखे। नासिक वेस्‍ट सीट से भाजपा उम्‍मीदवार उतारने के कारण नासिक सिटी यूनिट के अधिकांश लोगों ने पार्टी छोड़ दी। मुंबई में भी सेना इस बार महज 19 सीटों पर लड़ रही है, जबकि यहां 36 सीटें हैं। साफ तौर पर शिवसेना एक तरह से अस्तित्‍व के संकट से भी गुजर रही है। उसके अधिकांश वरिष्‍ठ नेता 65 साल से अधिक के हो चुके हैं। ऐसे में आदित्‍य को आगे कर सेना अपने अपने अस्तित्‍व बचाने के साथ ही युवाओं को आकर्षित करने में भी सफल हो सकती है।

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उपमुख्‍यमंत्री बनने के आसार

गौर करने वाली बात यह हैं कि इस बार भी शिवसेना की ओर से आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बताया जा रहा था, हालांकि गठबंधन की ओर से देवेंद्र फडणवीस ही वह चेहरा हैं। बता दें , देवेंद्र फडणवीस की ओर से शिवसेना के लिए डिप्टी सीएम के पद का ऑफर दिया गया था। ऐसे में उम्‍मीद की जा रही है कि चुनाव बाद बनने वाली भाजपा- शिवसेना सरकार में फिलहाल आदित्‍य ड्राइवर तो नहीं, लेकिन ड्राइवर के सहायक यानी उपमुख्‍यमंत्री जरूर बन सकते हैं। यह आदित्‍य के लिए लाभकारी होगा, क्‍योंकि ऐसा करके वे चुनावी राजनीति ही नहीं, बल्कि सत्‍ता की राजनीति के भी गुर सीख लेंगे। इससे बाद राजनीतिक मोलभाव और तोड़जोड़ उनके लिए आसान हो जाएगी, जो आज की राजनीति के लिए जरूरी है। कोई शक नहीं कि आदित्‍य की तुलना में फडनवीस काफी आगे निकल चुके हैं। नितिन गडकरी जैसे नेता भी अब खुद को फडनवीस के आसपास नहीं देख पा रहे हैं, जो कभी उनके गुरु रहे थे। लेकिन राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है। फडनवीस युवा हैं और उनकी उम्र अभी 50 के लगभग है, लेकिन आदित्‍य की उम्र उनकी तुलना में लगभग 20 साल कम है। ऐसे में वक्‍त कब पलटी मारेगा, कहना मुश्किल है।

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शिवसेना को आदित्‍य ठाकरे को चुनाव मैदान में क्‍यों उतारना पड़ा?

बालासाहेब ठाकरे बड़ी शख्सियत के स्‍वामी थे। यही कारण था कि कई दशकों तक पर्दे के पीछे रहकर भी वे शिवसेना की राजनीति के केंद्र में बने रहे और रिमोट कंट्रोल से राज्‍य में अपनी पार्टी की सरकार चलाई। अपने करिश्‍माई व्‍यक्तित्‍व के कारण बालासाहेब को इस बात का शायद ही कभी डर रहा कि उनकी पार्टी का कोई नेता मुख्‍यमंत्री या केंद्रीय मंत्री बनने के बाद उनके आदेश के खिलाफ जाने की हिम्‍मत करेगा। हालांकि, ऐसा कई बार हुआ, लेकिन जब भतीजे राज ठाकरे ने बगावत की थी तो वे लगभग टूट गए थे। इस सबके बावजूद बालासाहेब ठाकरे, खुद नेतृत्‍व नहीं संभालने की प्रतिबद्धता से कभी टस से मस नहीं हुए। हालांकि नारायण राणे, संजय निरुपम जैसे लोगों के विद्रोह से यह साफ हो गया था कि बाहरी नेतृत्‍व पर एक सीमा के बाद निर्भर नहीं रहा जा सकता है। बालासाहेब के विपरीत लो प्रोफाइल रहने वाले उद्धव पर भी चुनाव लड़ने का लगातार दबाव रहा, लेकिन वे इससे बचते रहे। हालांकि, उन्‍हें इस बात का अहसास हो चुका था कि वे अगर खुद या बेटे को सत्‍ता की राजनीति में नहीं उतारेंगे तो पार्टी पर कमजोर होते कंट्रोल के साथ ही उनका जनाधार भी लगातार सिकुड़ता जाएगा।

कोई शक नहीं कि आदित्‍य में बाला साहेब या फिर फडनवीस या राज ठाकरे वाली मुखरता नहीं है, लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि वे अपने पिता से अधिक सतर्क, सधे और लगातार तैयारी करते हुए दिखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में वे पार्टी की छात्र इकाई के प्रमुख भी रहे हैं और हाल के महीनों में राज्‍य में पांच हजार किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर उन्‍होंने लोगों के साथ सीधा कनेक्‍ट भी बनाया है। इससे न सिर्फ आदित्‍य की राजनीतिक समझ में इजाफा हुआ है, बल्कि विभिन्‍न कारणों से वे चर्चा में भी हैं, जो राजनीति के लिहाज से जरूरी है। इसी का असर है कि वर्तमान चुनाव के लिए भाजपा के साथ सीट बंटवारे से पहले उद्धव ने एक पब्लिक रैली में यहां तक कह दिया था कि इस बार मुख्‍यमंत्री शिवसेना का होगा। हालांकि वर्तमान हकीकत को समझते हुए बाद में उन्‍होंने अपना बयान बदल लिया था।

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