कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मराठी सम्मेलन पर लगाया बैन, INDIA bloc के लिए एक और चुनौती!

महाराष्ट्र में विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) के सहयोगी दलों में चुनावों में हार के बाद यूं ही खटपट चल रही है। अब कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिससे कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) के संबंधों में भी तल्खी बढ़ सकती है। दरअसल, कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने महाराष्ट्र एककीकरण समिति की ओर से बेलगावी में आयोजित होने वाले वार्षिक मराठी सम्मलेन पर इस साल पाबंदी लगा दी है।

सोमवार को आयोजित हो रहे इस सम्मेलन में कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने महाराष्ट्र से नेताओं के आने पर भी रोक लगा दी है। महाराष्ट्र एकीकरण समिति ने साल 2006 से इस सम्मेलन के आयोजन की शुरुआत की थी। तभी से कर्नाटक ने दोनों राज्यों के बीच सीमा विवाद के बीच बेलगावी में विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित करना भी शुरू किया था।

marathi meet ban

महाराष्ट्र के सभी दलों के नेताओं को निमंत्रण
हर साल की तरह इस साल भी समिति की ओर से महाराष्ट्र के बड़े नेताओं को इस मराठी सम्मलेन में भाग लेने का निमंत्रण भेजा गया है। यह निमंत्रण पत्र महाराष्ट्र में शिवसेना के चीफ और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, एनसीपी चीफ और डिप्टी सीएम अजित पवार, एनसीपी (एसपी) सुप्रीमो शरद पवार, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले को भी भेजा गया है।

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इंडिया ब्लॉक के सामने आई नई चुनौती!
पिछले साल महाराष्ट्र से आने वाले नेताओं को कोगनोली सीमा चौकी के पास रोकने की कोशिश की गई थी। महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) और एनसीपी (एसपी) कांग्रेस के साथ विपक्षी महा विकास अघाड़ी या इंडिया ब्लॉक में शामिल हैं। इन दलों के बीच पहले ही विधानसभा चुनावों में करारी हार की वजह से रिश्ते तल्ख बने हुए हैं।

बाहरी नेताओं को बेलगावी आने की इजाजत नहीं- कर्नाटक सरकार
कर्नाटक के अधिकारियों ने बताया है कि सम्मेलन की इजाजत नहीं दी गई है और किसी भी कानून और व्यवस्था की स्थिति को टालने के लिए निषेधाज्ञा लागू की गई है। टीओआई ने बेलगावी के जिलाधिकारी मोहम्मद रोशन के हवाले से बताया है, 'हमें पता चला है कि महाराष्ट्र एकीकरण समिति ने पड़ोसी राज्य से नेताओं को आमंत्रित किया है। हम बाहर से किसी भी नेता को बेलगावी ने की अनुमति नहीं देंगे।'

शिवसेना (यूबीटी) नेता ने बेलगावी जाने की बात कही
इस मामले शनिवार को महाराष्ट्र एकीकरण समिति के प्रमुख और पूर्व विधायक मनोहर किनेकर ने संगठन के पदाधिकारियों के साथ एक बैठक भी की थी। इसमें कहा गया,'कर्नाटक इस क्षेत्र के विवादित होने के बावजूद सत्र आयोजित कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई चल रही है। हमने महाराष्ट्र के नेताओं को आने के लिए लिखा है और हमारे मुद्दे को समर्थन देने के लिए कहा है।'

वहीं महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख संजय पवार ने कहा कि उनकी पार्टी के प्रतिनिधि 9 दिसंबर यानी सोमवार सुबह बेलगावी जाएंगे। उनके मुताबिक,'हमने मराठी भाषी लोगों का समर्थन करने वालों से तारारानी चौक पहुंचने का अनुरोध किया है,जहां से हम बेलगावी की यात्रा शुरू करेंगे।'

क्या हम भारत से बाहर के हैं?- शिवसेना सांसद
वहीं शिवसेना सांसद हातकणंगले धैर्यशील माने ने कहा, 'मैंने सुना है कि प्रशासन हमें बाहरी कह रहा है। क्या हम भारत से बाहर के हैं? हम सुप्रीम कोर्ट का ध्यान इस ओर खींचेंगे।

बेलगावी को लेकर क्या विवाद है?
कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच बेलगावी को लेकर 1956 से राज्यों के पुनर्गठन के समय से विवाद है। भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम के तहत,बेलगाम (तब यही नाम था) और इसके आसपास के मराठी भाषी क्षेत्रों को कर्नाटक (तब मैसूर) में शामिल कर दिया गया। इसलिए महाराष्ट्र का दावा है कि मराठी भाषी बहुल क्षेत्र होने की वजह से उसे महाराष्ट्र में शामिल किया जाना चाहिए।

1966 में महाजन आयोग का गठन इस विवाद को सुलझाने के लिए किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कुछ गांवों को महाराष्ट्र में शामिल करने की सिफारिश की,लेकिन बेलगाम को कर्नाटक में ही रहने दिया। कर्नाटक ने इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया,लेकिन महाराष्ट्र इसे मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। यह विवाद आज तक सुलझ नहीं पाया है और दोनों राज्य बेलगाम पर अपना दावा करते रहे हैं।

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बेलगाम राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है,जिसकी वजह से विवाद और गहराता गया। कर्नाटक ने इसे 'बेलगावी' नाम देकर इसे पूरी तरह से अपने में समाहित करने क कोशिश की। महाराष्ट्र ने 2004 में इस विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की,लेकिन अभी तक अंतिम फैसला नहीं आया है।

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