महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव में RSS कैसे चला रहा 'Silent campaign'? हरियाणा में पलट चुकी है बाजी

Maharashtra and Jharkhand elections 2024: लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के एक बयान के बाद आरएसएस और पार्टी में एक तरह की दूरियां दिखाई पड़ी थीं। शायद उसका खामियाजा भाजपा को लोकसभा चुनावों में भुगतना भी पड़ गया। क्योंकि संघ परिवार उतनी सक्रियता के साथ काम करते नजर नहीं आया, जो आमतौर पर वह करता है। लेकिन, जब हरियाणा और जम्मू कश्मीर में जम्मू डिविजन के चुनाव नतीजे सामने आए तो महसूस हुआ कि संघ परिवार ही एकबार फिर कांग्रेस के लिए 'साइलेंट किलर' साबित हुआ है।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मथुरा में आरएसएस की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक हुई है। इसके बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने इस बात पर जोर दिया कि भाजपा और उसके वैचारिक संगठन के बीच सबकुछ ठीक-ठाक है। संघ की ओर से यह भी साफ किया गया कि नड्डा के बयान की भावना से वह वाकिफ है और यह परिवार के भीतर कोई तनाव की वजह नहीं है।

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हरियाणा में संघ की मेहनत बीजेपी के लिए रंग लाई!
दरअसल, इस तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि लोकसभा चुनावों में जिस तरह से बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फिरा, उसने दोनों ही संगठनों की आंखें खोल दी हैं। हरियाणा में भाजपा की जो ऐतिहासिक जीत हुई है, उसमें संघ के स्वयंसेवकों की बहुत बड़ी भूमिका सामने आ रही है, जिन्होंने इतने चुपचाप तरीके से जमीन पर काम किया कि कांग्रेस के पांव से जमीन खिसकती रही और उसने भनक तक नहीं लग सकी।

लोकसभा चुनावों के बाद फिर मधुर हुए संबंध!
आरएसएस की हाल में झारखंड की रांची, केरल में पलक्कड और दिल्ली समेत महाराष्ट्र में भी कई अहम बैठकें हुई हैं, माना जा रहा है कि इसमें आपसी बातचीत से आपसी तालमेल को कायम रखने में आसानी हुई है। इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्र के हवाले से बताया है, 'दोनों संगठनों के बीच कभी भी कोई वैचारिक मतभेद नहीं था, सिर्फ कार्य संबंधी दिक्कतें थीं। उन्हें ठीक किया जा रहा है।'

कांग्रेस के दावों को बेदम करने में संघ ने निभाया बड़ा योगदान!
आरएसएस जमीनी स्तर पर छोटे-छोटे समूहों में पूरी नेटवर्किंग के साथ काम करने वाला संगठन है। समाज में उसकी गहरी पैठ रही है और जब भी वह अपने परंपरागत नेटवर्क को सक्रिय करता है तो परिणाम चौंकाने वाले आते हैं। यही वजह है कि हरियाणा चुनाव में भाजपा सरकार 'संविधान बदल देगी' वाले कांग्रेस के दावे की प्रभावी तौर पर हवा निकाल दी।

लोकसभा चुनावों से मिल गई सीख
हरियाणा में विपक्ष जीत को लेकर अति-आत्मविश्वास में सोया रहा और गैर-जाट ओबीसी और दलितों का बहुत बड़ा वोट बैंक बीजेपी की ओर खिसक गया, जो उन्हें मालूम भी नहीं पड़ा। लोकसभा चुनावों में यही बीजेपी के साथ हुआ था। उसके कार्यकर्ता '400 पार' वाले नारे से निश्चिंत हो गए थे।

इसकी वजह से पार्टी का अपना वोटर भी मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच पाया। लेकिन, इस बार के हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर एक नेता का कहना है, 'इसका समाधान यह था कि उन्हें (कार्यकर्ताओं को) प्रचार के लिए बाहर निकाला जाए, ताकि वोट पड़े। और आरएसएस के स्वयंसेवकों ने इसमें मदद की।'

महाराष्ट्र में फिर संघ आ सकता है बीजेपी के काम
महाराष्ट्र में भी बीजेपी इसी आस में है। विपक्षी महा विकास अघाड़ी के मराठा और मुसलमान वोट पर फोकस के बदले वह ओबीसी और दलित-आदिवासी समुदायों की गोलबंदी से उम्मीद लगा रही है। कांग्रेस अगर दलितों में महार समुदाय के भरोसे बैठी है तो आरएसएस ने महायुति के लिए मतंगों के बीच संपर्क अभियान बढ़ा दिया है।

कहा जा रहा है कि अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण के लिए एकनाथ शिंदे सरकार ने आरएसएस के इशारे पर ही समिति गठित की है। हरियाणा में बीजेपी को इसका फायदा मिल चुका है।

एक सूत्र ने कहा, 'अगर विपक्ष ने भाजपा नेता के बयान (400 सीटें मिलने पर संविधान बदला जा सकता है) को लोकसभा चुनावों में इस्तेमाल किया, तो हमने अमेरिका यात्रा के दौरान राहुल गांधी के आरक्षण खत्म (समाज में समानता प्राप्त कर लेने पर)करने वाली टिप्पणी का उपयोग किया। आरएसएस के पारंपरिक तरीके इसके लिए उपयोगी साबित हुए।'

लोकसभा चुनावों में बीजेपी को लगे झटके के बाद ही सक्रिय हो गया संघ!
सूत्रों का कहना है कि लोकसभा चुनावों के तीन महीने बाद अगस्त में ही आरएसएस ने चुपचाप 'संविधान बचाओ' अभियान शुरू कर दिया था। महाराष्ट्र में 'संविधान जागरण यात्रा' महाड के चावदार टाले से शुरू की गई और सितंबर के मध्य में दादर में खत्म हुई। चावदार टाले वही तालाब है, जहां से बाबासाहेब अंबेडकर ने मार्च 1927 में अछूत समुदायों के लिए उस तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अपना प्रसिद्ध महाड सत्याग्रह शुरू किया था।

झारखंड में भी बीजेपी की मदद के लिए जमीन पर उतरा संघ!
महाराष्ट्र के नागपुर में आरएसएस का मुख्यालय है तो झारखंड में इसका बहुत बड़ा जनाधार है। यह संगठन आदिवासियों के लिए हमेशा से काम करता रहा है। उसने अपने स्वयंसेवकों को आदिवासी-बहुल क्षेत्रों में छोटे-छोटे समूहों में सक्रिय कर दिया है। झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित पांचों लोकसभा सीटें बीजेपी हार (सिर्फ यही सीटें हारी थी) गई थी। विधानसभा चुनाव में संघ वहां भी बाजी पलटने की कोशिशों में जुटा हुआ है।

आरएसएस का खास फोकस संथाल परगना डिविजन है, जो कि सत्ताधारी जेएमएम का गढ़ है। बीजेपी यहां बांग्लादेश घुसपैठियों का मुद्दा उठा रही है और संघ के स्वयंसेवक इसे जन-जन तक पहुंचाने के अभियान में जुटे हुए हैं।

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