बहुत कुछ कहता है नीतीश कुमार का इस्तीफा
हालांकि नैतिकतावश तो जे़डीयू अध्यक्ष शरद यादव को भी पद छोड़ना चाहिए क्योंकि वो खुद लोकसभा चुनाव हारे हैं ऐसे में उनकी भी जिम्मेदारी बनती हैं लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
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वहीं दूसरी ओर खबर यह भी है कि जेडीयू के अंदर नीतीश को लेकर भी बवाल मचा है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि नीतीश कुमार का व्यक्तित्व कुछ और ही कहता है वो एक संघर्षशाली इंसान कहलाते हैं जिन्होंने बिहार का दामन उस वक्त थामा था जब बिहार बुरी तरह से गर्त में था। आज बिहार विकास के पथ पर अग्रसर है।
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार का इस्तीफा बहुत कुछ कहता है। डेढ़ साल के बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। नीतीश यह जान चुके हैं कि सवर्ण वोट उनसे तेजी से खिसके हैं, ऐसे में वह नई रणनीति के तहत काम कर रहे हैं।
वो कहते हैं कि बिहार में अब गैर भाजपावाद की जमीन तैयार होगी, जिसमें धर्मनिरपेक्ष पसंद और सामाजिक न्याय में विश्वास करने वाले दल शामिल होंगे। हो सकता है कि शाम चार बजे की बैठक में नीतीश कुमार को ही वापस विधायक दल का नेता चुन लिया जाये।
नीतीश के इस्तीफे से पार्टी के अंदर उनकी कितनी शक्ति है इसका आंकलन भी हो जायेगा जिसके आधार पर ही वो आने वाले विधानसभा चुनाव में अपनी औऱ अपनी पार्टी की रणनीति तय करेंगे।
अगर लालू प्रसाद यादव का साथ जेडीयू को मिलता है तो इसके लिए नीतीश कुमार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जायेगा जिसकी वजह से जिन वोटरों ने नीतीश के नाम पर जेडीयू को वोट दिया था उनकी नाराजगी नीतीश और पार्टी से नहीं होगी और वो वोट कहीं नहीं जायेगा। इसलिए राजनैतिक समीक्षक कहते हैं कि नीतीश का इस्तीफा गुस्सा या निराशा के चलते नहीं आया है बल्कि इसके पीछे सोची-समझी एक राजनैतिक रणनीति है जिसका मकसद बिहार में बीजेपी की सरकार को बनने नहीं देना है।













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