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निजता के अधिकार फैसले की इस छोटी सी बात का बड़ा फायदा उठाएगी मोदी सरकार

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कई बातें ऐसी भी हैं जो सरकार के लिए इस मामले में 'पिछले दरवाजे' का काम कर सकती हैं।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए 'राइट टू प्राइवेसी' यानी निजता को मौलिक आधार माना है। इस फैसले को केंद्र सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आधार कोर्ड को लेकर कोई फैसला नहीं दिया है, लेकिन फिर भी इस फैसले के बाद काफी कुछ बदल जाएगा। इस फैसले के बाद सरकार आधार या पैन की जानकारी को सार्वजनिक नहीं कर सकती। इसके अलावा बिना किसी ठोस वजह के किसी भी व्यक्ति से उसकी निजी जानकारी नहीं पूछी जा सकती। इन सबके बीच इस फैसले में कई बातें ऐसी भी हैं जो सरकार के लिए इस मामले में 'पिछले दरवाजे' का काम कर सकती हैं।

संपूर्ण अधिकार नहीं है निजता का अधिकार

संपूर्ण अधिकार नहीं है निजता का अधिकार

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 'राइट टू प्राइवेसी' को फिलहाल आधार कार्ड के केस से अलग रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकार होने के बावजूद निजता का अधिकार एक संपूर्ण अधिकार नहीं है, यानी सरकार विशेष मामलों में इस पर कुछ तर्कसंगत प्रतिबंध लगा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह बिल्कुल स्पष्ट किया है कि सरकार समाज कल्याण या कुछ विशेष योजनाओं में व्यक्ति की निजी जानकारी का इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि निजी सूचना का सरकार लीक नहीं कर सकती।

सरकार के लिए क्या हैं मायने

सरकार के लिए क्या हैं मायने

इस मामले में याचिकाकर्ता का कहना था कि जब एक नागरिक सरकार को अपनी बायोमीट्रिक व व्यक्तिगत जानकारी देता है और एक व्यवसायिक संस्थान इसका इस्तेमाल करता है तो यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है। गौरतलब है कि इस मामले में फैसला सुनाते हुए 9 जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से निजता को मौलिक अधिकारों की श्रेणी में माना है। अदालत के इस फैसले के बाद आधार, पैन, क्रेडिट कार्ड सार्वजनिक नहीं हो सकता। इस फैसले के बाद अब किसी के आधार की जानकारी लीक नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि निजता की सीमा तय करना संभव हैं।

इन 9 जजों ने सर्वसम्मति से सुनाया फैसला

इन 9 जजों ने सर्वसम्मति से सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट की जिस संवैधानिक पीठ ने आज फैसला सुनाया उसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जगदीश सिंह खेहर के साथ जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस एस ए बोबड़े, जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस रोहिंगटन फली नरीमन, जस्टिस अभय मनोहर सप्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

क्या है राइट टू प्राइवेसी

क्या है राइट टू प्राइवेसी

हमारे संविधान में सीधे तौर पर निजता के अधिकार का जिक्र नहीं है। हालांकि व्यवहारिकता में इसे अनुच्छेद 21, सम्मान से जीवन के अधिकार का हिस्सा माना जाता है। जिसका मतलब हुआ कि अगर कानूनी बाध्यता ना हो और कानूनी रास्ता ना अख्तियार किया जाए तो सरकार किसी की निजता का हनन नहीं कर सकती।

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