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नज़रिया- 'तीन तलाक़ पर बीजेपी सरकार ने सिर्फ मौलानाओं की सुनी'

मुस्लिम महिला
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तीन तलाक़ पर होने वाली टीवी की सभी पुरानी बहसें निकाल कर देखिए. मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ुरानी, 'तलाक़-उल बिद्दत' और गुनाह बता कर "प्रतिबंधित" या बैन करने की मांग करती रही हैं.

उन्हीं बहसों में मौलाना तीन तलाक को बिद्दत बता कर उस को गुनाह, ग़लत, क़ुरान-बाहर का तो बताते रहे लेकिन ये भी कहते रहे कि 'अगर किसी ने एक बैठक में तीन तलाक़ दिया है तो वो तलाक़ हो गया, उस में पुनर्विचार की गुंजाइश नहीं, ऐसे पति को क़ानून सख्त से सख्त सज़ाएं दे'.

उनका ये भी कहना था की 'ख़लीफ़ाओं के दौर में उन्हें 50 कोड़े मारने तक की सज़ा थी'. यानी मौलानाओं का तर्क था कि वो इस अपराध को होने देंगे और जब हो जाए तो अपराधी को कड़ी से कड़ी सज़ा देंगे. भाजपा सरकार ने गुरुवार को पास किए बिल में कट्टरपंथी मौलानाओं की बात हूबहू मान ली है.

महिलाओं का तर्क था कि क़ुरआन-सम्मत तलाक यानी 'तलाक ए अहसन' और 'तलाक ए हसन' की प्रक्रिया वाली तलाक़ में पुनर्विचार की सम्भावना रहती है और अगर तलाक़ को टाला ना भी जा सके तो कम से कम उसमें बाक़ी मामले- जैसे बच्चों की कस्टडी, आर्थिक ज़िम्मेदारियाँ, भत्ता आदि तय करने की गुंजाइश रहती है.

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'आर्थिक अभाव बना सकता है अपराधी'

मुस्लिम महिलाओं की ये मांग कभी नहीं थी कि बदले की भावना से राज्य एक बाहुबली की तरह तलाक़ देनेवाले पति पर टूट पड़े. जिसमें बच्चे, और परिवार के दूसरे आश्रित भी गेहूं में घुन की तरह पिस जाएं?

पति का कारोबार, नौकरी, रोज़गार हमेशा के लिए ख़त्म हो जाए, वो एक सज़ायाफ़्ता अपराधी के तौर पर जाना जाए और उसका सामाजिक तिरस्कार हो जाए. इसमें याद रखना होगा कि बच्चों का भविष्य भी साथ ही साथ तबाह हो जाएगा और वे भी जेल काट रहे अपराधी पिता की बदनामी से खुद को बचा नहीं पाएंगे.

आर्थिक अभाव उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, बचपन से दूर ले जाकर शायद बाक़ायदा अपराधी बना दे. इस प्रक्रिया में पत्नी भी मुक़दमे के फैसले का इंतज़ार करने को बाध्य रहेगी और इस बीच उसकी दूसरी शादी की सम्भावना ख़त्म हो जाएगी.

यानी दोनों की ज़िंदगी, बच्चों, आश्रित बुज़ुर्गों और आश्रित बहन आदि का भविष्य सबसे खिलवाड़ का एक सूत्रीय उद्देश्य लेकर आया है 2017 का ये बिल.

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अशिक्षित परिवारों में ज़्यादा तीन तलाक़

ऐसे में इस तथ्य को भी याद रखा जाए की एक बैठक की तीन तलाक़ अक्सर आर्थिक तौर से पिछड़े, अशिक्षित परिवारों में ही ज़्यादा होती रही हैं. जहाँ पत्नी पक्ष की आर्थिक स्थिति पति पक्ष के मुक़ाबले कमज़ोर होती है. आर्थिक विषमताओं से जूझ रहे परिवारों के लिए ये घटना कभी न पूरा होने वाला घाटा लेकर आएगी.

ज़ाहिर है ऐसी मुक़दमेबाज़ी की हालत में तलाक़ पर पुनर्विचार की कोई सम्भावना नहीं बचेगी, जबकि 'तलाक ए अहसन' और 'तलाक ए हसन' की ख़ासियत ही यही है कि परिवार के जुड़े रहने के पूरे मौके रहते हैं इस प्रक्रिया के दौरान.

इस 'बेहूदे' क़ानून को लाने में मौलानाओं का बड़ा सक्रिय रोल रहा है. दशकों से तीन तलाक़ की मार झेल रही महिलाओं के पक्ष में कभी किसी ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड या मुशावरत या तंज़ीम ने राहत का कोई इंतज़ाम नहीं किया.

ऐसा लगता था कि तलाक़ देनेवाले पति से ज़्यादा बड़े दुश्मन तो ये मुल्ला हैं.

ये दुश्मन हैं इन लाचार महिलाओं के जो अपने स्तर पर भी इन्हें सज़ा देने पर उतारू हैं. मौलानाओं ने कभी कोई तहरीक नहीं चलाई तीन तलाक़ ख़त्म करने की, सुन्नी मुस्लिम समुदाय में कभी कोई बड़ा संदेश नहीं दिया कि ये क़ुरआन सम्मत नहीं है इसलिए इसको अमल में लाना गुनाह है.

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मौलानाओं के एफिडेविट में क्या?

ऐसी तलाक़शुदा महिलाओं के पुनर्वास पर इनके वक़्फ़ के अकूत ख़ज़ाने हमेशा बंद रहे.

ऐसे पति को जवाबदेही के लिए इन्होंने कभी नहीं घेरा. मौलानाओं ने या तो चुप्पी अपनाई या टीवी पर बहस में कुतर्क दिए, या सुप्रीम कोर्ट में स्त्रीद्वेषी और बेहूदा एफिडेविट देकर अपनी संकीर्ण सोच का मुज़ाहिरा किया.

इन मौलानाओं ने एफिडेविट में लिखा कि सभी महिलाऐं 'नाक़िसुल अक़्ल' होती हैं यानी मानसिक तौर पर 'नीच' होती है, लिहाज़ा इनकी अक़्ल पर भरोसा नहीं किया जा सकता, सिर्फ मर्द तय करेगा की क्या करना है. ऐसे घटिया सोच वाले जब समाज के सर्वेसर्वा होंगे, भविष्य पर नियंत्रण करने वाले होंगे, तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि कुछ भी अच्छा होगा?

आज स्थिति ये है कि इस क़ानून के लोक सभा में पास हो जाने पर इसकी आलोचना का भी चेहरा नहीं है, इन बोर्ड और मुशावरत वालों के पास.

अजीब विडम्बना है कि महिलाओं को तथाकथित राहत देनेवाले इस बिल का विरोध भी हम महिलाओं को ही करना पड़ेगा. मौलाना अब किस मुंह से इस क़ानून के अतिवाद पर विरोध करेंगे? यही मौलाना ही तो हर टीवी पर तीन तलाक़ देने वाले पति के लिए 'कड़ी से कड़ी' सज़ा की मांग करते दिखते थे.

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फ़र्ज़ी मुक़दमों के नाम पर मुस्लिमों से भेदभाव

लव जिहाद के नाम पर, गौकुशी के नाम पर, फ़र्ज़ी मुक़दमों के नाम पर मुसलमान मर्दों को बेमौत मारने वाली भाजपा सरकार ने वही किया, जिसकी उस से उम्मीद थी.

ये ऐसा निराला बिल होगा जो ये भी कहता है कि इस क़ानून के लागू होने से तीन तलाक़ 'प्रतिबंधित' हो जाता है, यदि कोई पति तीन तलाक़ देता है तो ये तलाक़ माना ही नहीं जाएगा और महिला अपने पत्नी होने के अधिकार और सम्मान के साथ रहेगी लेकिन ये भी कि तीन तलाक़ देने वाला पति जेल भी जाएगा और हर्जाना भी देगा.

यानी 'अपऱाध तो नहीं होगा लेकिन सज़ा ठीक से होगी.

कुल मिला कर मौलानाओं के कुतर्कों और सुन्नी महिलाओं की मांगों के घालमेल से तैयार ये 'दा मुस्लिम वीमेन प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स ऑन मैरिज बिल 2017' अगर क़ानून बन गया तो इसका खामियाज़ा पूरा मुस्लिम समाज भुगतेगा.

जो मसला सुन्नी बोर्ड द्वारा और मौलानाओं के सिर्फ एक बयान से हल हो सकता था कि "तीन तलाक़ गैर क़ुरानी है इसलिए सिर्फ तलाक-ए-अहसन और तलाक़-ए-हसन ही मान्य होंगी ", को अब पूरा समाज पता नहीं कब तक भुगतेगा.

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