सजा के 72 घंटे बजरंगबली की शरण में बिताने के पीछे योगी की रणनीति?
नई दिल्ली। सन् 2014 के लोक सभा चुनाव में भड़काऊ भाषण देकर आचार संहिता का उल्लंघन करने के कारण चुनाव प्रचार करने से रोके गये भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने माफी का हलफनामा देकर सजा माफ करा ली थी लेकिन 2019 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का ऐसा कोई इरादा नहीं है. वे तीन दिन तक प्रचार से दूर रहकर वास्तव में 'बजरंगबली की शरण' में हैं. 'बजरंगबली' के नाम पर मिली सजा बजरंगबली के दर्शन-भजन में ही काटने का उनका कार्यक्रम बहुप्रचारित है. उल्लेखनीय है कि योगी को उनकी टिप्पणी 'उनको अली प्यारे हैं तो हमको बजरंगबली' के कारण तीन दिन तक चुनाव प्रचार से दूर रहने की सजा चुनाव आयोग ने दी है.

सजा के पहले दिन, मंगलवार को वे लखनऊ के हनुमान सेतु मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ करने बैठे. मंदिर में हनुमान भक्तों के बीच उन्होंने कुछ समय गुजारा लेकिन किसी से बात नहीं की. बुधवार को वे अयोध्या में हैं, जहाँ रामलला के दर्शन करने के बाद उनका प्रसिद्ध हनुमान गढ़ी मंदिर में बजरंगबली से आशीर्वाद लेने का कार्यक्रम प्रचारित है. उसके बाद वे देवीपाटन मंदिर में पूजा-पाठ करेंगे. सजा के अंतिम दिन, गुरुवार को वे वाराणसी के प्रख्यात संकटमोचन मंदिर में बजरंगबली की आराधना करेंगे.
मंगलवार को लखनऊ के हनुमान सेतु मंदिर में किया हनुमान चालीसा का पाठ
‘टाइम्स ऑफ इण्डिया' में बुधवार को प्रकाशित एक समाचार में एक भाजपा नेता का यह बयान भी प्रकाशित हुआ है कि "चूंकि योगी जी को बजरंगबली का नाम लेने पर चुनाव प्रचार से रोक दिया गया है इसलिए उन्होंने बजरंगबली के मंदिरों में दर्शन करने की ठानी है ताकि उनके समर्थकों तक यह संदेश पहुँचे. उन्हें चुनाव प्रचार करने से रोका गया है. हनुमान मंदिरों में जाने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता."
योगी भाजपा के स्टार प्रचारक हैं. मोदी और अमित शाह के बराबर ही वे दूसरे राज्यों में भाजपा का प्रचार कर रहे हैं. स्वाभाविक है कि भाजपा को तीन दिन उनकी कमी खल रही होगी. मंगलवार को नगीना और फतेहपुर सीकरी में उनकी चुनावी रैलियाँ स्थगित करनी पड़ीं. लखनऊ में राजनाथ सिंह के नामांकन जुलूस में भी योगी शामिल नहीं हो सके. बुधवार को उन्हें दक्षिण भारत का चुनावी दौरा करना था.
इसलिए भाजपा नेताओं ने दिल्ली में चुनाव आयोग से मिलकर योगी की सजा पर पुनर्विचार करने की अपील की है. तर्क यही दिया गया है कि योगी ने अपने भाषण में अपनी आस्था का जिक्र किया था. उनका कोई इरादा धर्म के नाम पर मतदान की अपील करना नहीं था. चूंकि आयोग ने यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के सवाल उठाने पर की है, इसलिए लगता नहीं कि वह सजा पर पुनर्विचार करेगा.

तीन दिन तक चुनाव प्रचार से दूर रहने की सजा चुनाव आयोग ने दी
प्रसंगवश बता दें कि पिछले दिनों एक एनआरई की पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा था कि धर्म और जाति के आधार पर वोट मांग कर आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों पर क्या कार्रवाई की जा रही है. तब आयोग की तरफ से कोर्ट को बताया गया कि उसके अधिकार सीमित हैं. वह सिर्फ नोटिस देकर जवाब मांग सकता है और एफआईआर दर्ज करा सकता है. इस पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई तनिक आक्रोश में कहा था कि अब हम चुनाव आयोग की शक्तियों पर कल सुनवाई करेंगे. इसी टिप्पणी के फौरन बाद आयोग ने उक्त चार नेताओं को दो-से तीन दिन तक प्रचार करने से रोक दिया .
आचार संहिता लोड़ने के कारण चुनाव प्रचार से रोके गये अन्य तीन नेता फिलहाल आराम कर रहे हैं. मायावती अपने घर में ही अगले चरणों की रणनीति बना रही हैं. मंगलवार को उन्हें नगीना में सपा-बसपा-रालोद की संयुक्त रैली को सम्बोधित करना था. उनकी जगह उनके भतीजे आकाश ने वहाँ भाषण दिया. इस तरह आकाश को अपना पहला राजनैतिक भाषण देने का मौका मिला. आकाश को वे अपने उत्तराधिकारी के रूप में बढ़ा रही हैं. उसके लिए अखिलेश यादव और अजित सिंह की संगत में यह प्रशिक्षण रैली साबित हुई.

बैन के बाद आजम खान रामपुर के अपने घर में ही रहे
आजम खान रामपुर के अपने घर में ही रहे, उनके बेटे अब्दुला ने उनके लिए प्रचार किया. उसने सम्वाददाता सम्मेलन में कहा कि मेरे पिता के खिलाफ आयोग ने इसलिए कार्रवाई की है क्योंकि वे मुसलमान हैं. उनके इस बयान पर विवाद छिड़ना ही था. ऐसा ही बयान एक दिन पहले मायावती ने भी दिया था. उन्होंने चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लागाते हुए कहा था कि दलित होने के कारण मेरे खिलाफ कार्रवाई की गयी है. चुनाव आयोग दलित विरोधी मानसिकता से काम कर रहा है.
चुनाव आयोग द्वारा प्रचार करने से रोके गये ये नेता दरअसल इस प्रतिबंध को भी अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. इनमें से किसी भी नेता को अपने आपत्तिजनक भाषणों पर खेद नहीं है. ये सभी मानते हैं और कह भी चुके हैं कि उन्होंने आचार संहिता नहीं तोड़ी है. चुनाव आयोग को दिये जवाब में भी इन्होंने यही कहा है. मायावती और आजम खान क्रमश: दलित और मुस्लिम होने की बात कह कर सजा से सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे हैं तो योगी बजरंगबली प्रकारांतर से यह संदेश देना चाह रहे हैं कि मुझे तो बजरंगबली का नाम लेने पर सजा दी गयी है.
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