सुप्रीम कोर्ट की फटकार का क्यों इंतजार करता है चुनाव आयोग?
नई दिल्ली। चुनाव आयोग (Election Commission) से गिला-शिकवा, वैधानिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा है। चुनाव आयोग पर पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पक्षपात के आरोप लगे हैं। अब तो अनुशासनात्मक कार्रवाई जिन मामलों में हुई है उसके पीछे भी सुप्रीम कोर्ट की सख्ती रही है। जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकारा था कि वह अपनी ताकत को नहीं पहचान रहा है तो उसके बाद आयोग ने चार नेताओं पर कार्रवाई की थी। मगर, उसके बाद भी चुनाव आयोग उस रूप में सक्रिय नहीं हो पाया जिससे उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती।

मायावती ने चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगाए थे
उदाहरण के लिए चुनाव आयोग ने पहली दफा योजना आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दोषी पाए जाने के बावजूद एडवाइजरी जारी कर छोड़ दिया। बाद में योगी आदित्यनाथ को एक अन्य मामले में चुनाव आयोग ने दोषी ठहराते हुए उन पर 72 घंटे की पाबंदी लगाय़ी। हालांकि उस दौरान भी तकनीकी तौर पर पाबंदी का पालन करते हुए मंदिर में पूजा अर्चना, दलित के घर भोजन और जबरदस्त मीडिया कवरेज देखने को मिला था। ऐसा लगा ही नहीं कि कोई पाबंदी चल रही है। तब पाबंदी झेल रही मायावती ने भी चुनाव आयोग पर पक्षपात के आरोप लगाए थे। ऐसा ही आरोप पाबंदी झेल रहे आज़म खां ने भी लगाया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें जवाब देने का मौका तक नहीं दिया गया।

पीएम मोदी और अमित शाह के खिलाफ शिकायत पर कार्रवाई ना करने का आरोप
चुनाव आयोग पर सबसे बड़ा आरोप है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों को संज्ञान में नहीं ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अहमदाबाद में वोट डालने के बाद राजनीतिक बयान देने के आरोप हैं। वहीं अमित शाह पर धार्मिक भावनाएं भड़काने वाले भाषण के आरोप हैं। विरोधी दलों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट इन मामलों की सुनवाई करेगा तो यह लगभग तय है कि चुनाव आयोग को एक बार फिर फटकार पड़ने वाली है। अगर चुनाव आयोग डांट खाकर कार्रवाई करने को मजबूर होता है तो नये सिरे से उसकी किरकिरी होगी।
ये भी पढ़ें: लोकसभा चुनाव 2019 की विस्तृत कवरेज

पीएम मोदी के हेलीकॉप्टर की जांच का मुद्दा भी गरमाया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हेलीकॉप्टर की जांच करने वाले अधिकारी पर भी चुनाव आयोग ने कार्रवाई की थी। उस मामले में भी चुनाव आयोग सवालों के घेरे में है। इसके अलावा संदिग्ध पेटियों की जांच नहीं करने जैस आरोप भी हैं। नमो टीवी पर लगातार बीजेपी के चुनाव प्रचार जारी हैं। मीडिया पर प्रधानमंत्री कभी इंटरव्यू के रूप में तो कभी गैर राजनीतिक इंटरव्यू के साथ स्क्रीन पर बने हुए हैं। इस पर भी चुप्पी साधे रहने के कारण चुनाव आयोग पर उंगलियां उठ रही हैं।

चुनाव आयोग पर उठ रहे हैं सवाल
प्रधानमंत्री ने खुद को अति पिछड़ा कहकर वोट मांगा है। उसका भी संज्ञान नहीं लिया गया। वहीं अमित शाह ने धर्म के आधार पर शरण देने और मुसलमानों को छोड़कर बाकी धर्म के लोगों को शरण देने की बात कहकर भी चुनाव के दौरान आचार संहिता को तोड़ा है। इसकी भी चुनाव आयोग ने अनदेखी की है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट पर देश की नज़र है। वहीं से चुनाव आयोग के लिए कोई ऐसा मंत्र निकलकर सामने आने की उम्मीद जतायी जा ररही है जिसके बाद चुनाव आयोग वास्तव में अधिकार के साथ चुनाव प्रक्रिया को सम्पूर्ण कराने में भूमिका निभाएगा। सवाल ये है कि आखिर कब तक चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट की फटकार का इंतज़ार करता रहेगा? चुनाव आयोग अपने आप में सम्पूर्ण और स्वायत्त संस्था है। वह किसी पर भी कार्रवाई करने को आज़ाद है। पक्षपात से ऊपर उठकर अगर वह यह काम करे, तो उसके पास असीमित ताकत है। मगर, अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करके चुनाव आयोग ने वास्तव में अपनी सार्थकता को खुद ही चुनौती दे डाली है।












Click it and Unblock the Notifications