लोकसभा चुनाव 2019: एमपी विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस का असमंजस
नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेता असमंजस में है कि विंध्य की सीटों पर किसकी दावेदारी को अंतिम रूप दें। रीवा लोकसभा सीट पर पूर्व सांसद तथा गत विधानसभा चुनाव में हारे प्रत्याशी सुंदरलाल तिवारी के निधन से भी कांग्रेस की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि सुंदरलाल तिवारी रीवा से लोकसभा चुनाव लड़ने की दावेदारी कर रहे थे। 1999 में सुंदरलाल तिवारी यहां से चुनाव जीते थे। अब उनके बेटे सिद्धार्थ राज का नाम चर्चा में है, लेकिन कांग्रेस के नेता तय नहीं कर पा रहे है कि वे सिद्धार्थ राज को टिकट दें या नहीं। भाजपा के नेता और पूर्व विधायक राजेन्द्र शुक्ला के भाई विनोद शुक्ला भी कांग्रेस में शामिल हो गए है और लोकसभा टिकट के लिए दावा पेश कर रहे है।

अर्जुन सिंह के समय विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस का रहा बोलबाला
सतना, सीधी और शहडोल की सीटें भी विंध्य क्षेत्र में है। विधानसभा चुनाव में ये चारों ही सीटें कांग्रेस के लिए कमजोर साबित हुई। शहडोल लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने 4-4 सीटों पर कब्जा किया था, लेकिन रीवा की सभी 8 सीटों पर भाजपा विधानसभा चुनाव में जीती थी। सतना और सीधी विधानसभा क्षेत्रों में भी कांग्रेस की स्थिति खराब थी। अब इन सीटों पर कांग्रेस के दो दिग्गज अजय सिंह और राजेन्द्र सिंह जोर आजमा रहे हैं।
अर्जुन सिंह के जीते जी विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस का बोलबाला रहा है। अर्जुन सिंह के निधन के बाद उनके बेटे अजय सिंह उर्फ राहुल भैया ने इस क्षेत्र में सक्रियता दिखाई, लेकिन राहुल भैया का वह प्रभाव नहीं है, जो उनके पिता का था। कई लोग कहते है कि अजय सिंह पार्ट टाइम पॉलिटिशियन हैं। वे राजनीति के लिए बहुत समय खर्च नहीं करते। ऐसे में भाजपा को जड़ों से उखाड़ना संभव नहीं है।

कांग्रेस बीजेपी के विद्रोही नेताओं के भरोसे
विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस बीजेपी के विद्रोही नेताओं के भरोसे भी है। शहडोल लोकसभा सीट से कांग्रेस ने पूर्व विधायक प्रमिला सिंह को टिकट दिया है। जो पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान ही कांग्रेस में आई थी। कांग्रेस के लोकसभा का चुनाव लड़ने वाली हिमाद्री सिंह ने भी पाला बदल दिया। हिमाद्री सिंह अब भाजपा की प्रत्याशी है। शहडोल के वर्तमान सांसद ज्ञान सिंह भी भाजपा से बगावत कर रहे है। कुल मिलाकर शहडोल में आयाराम-गयाराम का बोलबाला है। सीधी में 30 साल में कांग्रेस केवल दो बार लोकसभा चुनाव जीत सकी है।
अभी कांग्रेस सीधी, सतना और रीवा की सीटों पर प्रत्याशी का चयन कर रही है। कांग्रेस को ऐसे प्रत्याशी की तलाश है, जो पार्टी में चल रही बगावत को ध्यान में रखते हुए कार्य कर सकें और विरोधी पार्टी के असंतुष्टों को भी साध सके। प्रत्याशियों के चयन पर ही चुनाव का दारोम्दार काफी हद तक टिका रहे। रीवा संसदीय क्षेत्र में कभी किसी एक पार्टी का वर्चस्व नहीं रहा। बहुजन समाज पार्टी का भी इस इलाके में प्रभाव रहा है। यहां से 1980 में महाराजा मार्तण्ड सिंह निर्दलीय चुनाव जीत चुके हैं। बाद में वे कांग्रेस का टिकट पर भी चुनाव में खड़े हुए और जीते। 1989 में यहां से जनता पार्टी और 1991 और 1996 में बहुजन समाज पार्टी ने जीत हासिल की, लेकिन 1998 में भाजपा ने इस पर कब्जा कर लिया। इसके बाद फिर कांग्रेस और बीजेपी की जीत यहां से हुई। 2009 में बसपा को यहां से कामयाबी मिली थी। इस तरह रीवा में कांग्रेस 6 बार और बसपा तथा भाजपा 3-3 बार जीत चुकी है।

रीवा में 84 प्रतिशत ग्रामीण आबादी
रीवा संसदीय क्षेत्र में करीब 84 प्रतिशत ग्रामीण आबादी है। इसके अलावा 16 प्रतिशत से अधिक अजा और करीब 14 प्रतिशत से अधिक अजजा के मतदाता है। इस इलाके में जाति का कार्ड भी चलता है। शहडोल अजजा सुरक्षित सीट पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा रखी है। भाजपा के दलपत सिंह यहां से तीन बार चुनाव जीत चुके है। यहां की 8 में से 4 सीटें भाजपा और 4 कांग्रेस के पास है। कृषि के मामले में बेहद पिछड़ा शहडोल ग्रामीण मतदाताओं के भरोसे है, जिनकी संख्या करीब 80 प्रतिशत है। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद यहां विकास कार्य तो हुए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में उसका असर कम ही देखने को मिलता है। प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण शहडोल लोकसभा क्षेत्र विकास का इंतजार कर रहा है।












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