झारखंड के भाजपा विधायकों का लिटमस टेस्ट है लोकसभा का चुनाव

रांची। मिशन 2019 के तहत भाजपा ने झारखंड की सभी 14 लोकसभा सीटों को जीतने का लक्ष्य रखा है। इसको लेकर भाजपा नेतृत्व कहीं कोई हीला-सवाल सुनना नहीं चाहता। इसके तहत पार्टी पदाधिकारियों के साथ-साथ विधायकों और मंत्रियों की जिम्मेदारी भी तय कर दी गयी है। चुनाव लोकसभा का हो रहा है, लेकिन झारखंड भाजपा के विधायकों की नींद उड़ गयी है। मंत्रियों की हालत तो और ज्यादा पतली है। भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की चेतावनी ने मंत्रियों-विधायकों की चैन छीन ली है। पार्टी आलाकमान ने साफ कर दिया है कि जिस विधायक या मंत्री के क्षेत्र से लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी पिछड़ेंगे, उन्हें विधानसभा चुनाव में खामियाजा भुगतना पड़ेगा। इसके अलावा यह भी साफ कह दिया गया है कि जो भी नेता भितरघात करेगा, उस पर पार्टी कड़ा एक्शन लेगी।

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भाजपा के लिए पिछले चुनाव और इस बार के चुनाव में कई असमानताएं हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर थी। सत्ता भाजपा के पास नहीं थी। 10 साल की यूपीए सरकार के खिलाफ देश के मूड का फायदा भाजपा को मिला। झारखंड में भाजपा के खिलाफ दूसरे दल एकजुट नहीं थे। पिछले चुनाव में भाजपा के खिलाफ कांग्रेस और झामुमो का गठबंधन था, लेकिन झाविमो अलग था। इस बार कांग्रेस, झामुमो, झाविमो एक साथ हैं। इससे राजनीतिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल गयी हैं। भाजपा को जहां सरकार विरोधी मूड का सामना करना होगा, वहीं एकजुट विपक्ष भी उसे कड़ी चुनौती पेश करेगा। इससे पार पाने के लिए भाजपा को कई मोर्चों पर काम करना होगा। भाजपा के लिए एक सुकून की बात यह है कि इस बार आजसू पार्टी उसके साथ है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि झारखंड में एक खास वर्ग पर आजसू की पकड़ अन्य राजनीतिक दलों से ज्यादा है।

जाहिर है कि यही सोच कर भाजपा ने अपनी सीटिंग सीट गिरिडीह आजसू को दी है। कह सकते हैं कि एक सीट का बलिदान कर भाजपा ने एक मजबूत दोस्त, जो पिछले कई महीने से नाराज चल रहा था, को अपने साथ कर लिया। इसमें कोई दो राय नहीं है कि कार्यकर्त्ता के मामले में भाजपा की किसी दल से सानी नहीं है। बूथ स्तर पर भाजपा का संगठन है। इसके बाद भी पार्टी आलाकमान चुनाव में कोई कसर बाकी नहीं रहने देना चाहता है। उसने विधायकों, मंत्रियों और पार्टी में महत्वपूर्ण पद पर बैठे नेताओं को सख्त ताकीद कर रखी है कि लोकसभा परिणाम ही विधानसभा चुनाव में टिकट की गारंटी देगा।

जो विधायक या मंत्री अपने क्षेत्र में लोकसभा चुनाव में पास नहीं होंगे, उन्हें टिकट से हाथ भी धोना पड़ सकता है। यहां यह उल्लेख करना उचित है कि पिछले वर्ष एक दिन के रांची प्रवास पर आये भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कई दौर की बैठकें की थीं। उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ-साथ विधायकों और राज्य सरकार के मंत्रियों से कहा था कि लोकसभा चुनाव का परिणाम सिर्फ लोकसभा क्षेत्र के लिए नहीं, विधानसभा क्षेत्र का भी परिणाम बतायेगा। अमित शाह का यह कथन विधायकों और मंत्रियों के लिए संकेत था।

राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल का भी कार्यक्रम रांची में हुआ था। उन्होंने भी कहा था कि लोकसभा चुनाव ही विधानसभा चुनाव की पटकथा लिखेगा। मालूम हो कि पिछले लोकसभा चुनाव में विधानसभावार देखा जाये, तो भाजपा को लगभग डेढ़ दर्जन सीटें ज्यादा हासिल हुई थीं। छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा को सीटों का नुकसान हुआ था। बाद के चुनावों में मिली हार से भाजपा सतर्क है। इस बार भाजपा 60 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। जाहिर है, इसमें मौजूदा विधायकों पर ज्यादा दारोमदार रहेगा।

जानकारी के अनुसार मंत्रियों को यहां तक कहा गया है कि उनके जिले में आनेवाली विधानसभा सीट पर जीत और हार को उनके नाम के साथ जोड़कर पार्टी निर्णय लेगी। शायद यही वजह है कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव में एक भी विधायक और मंत्री को टिकट नहीं दिया है। साथ ही संगठन के वैसे नेता, जो लोकसभा क्षेत्र के प्रभारी हैं, उनके नाम पर भी पार्टी ने विचार नहीं किया। जबकि सच्चाई यह है कि दर्जन भर से ज्यादा विधायक और सरकार के छह मंत्री लोकसभा चुनाव में टिकट की दौड़ में थे। दुमका के लिए मंत्री लुईस मरांडी, खूंटी के लिए नीलकंठ सिंह मुंडा, गोड्डा के लिए मंत्री राज पलिवार, कोडरमा के लिए मंत्री नीरा यादव, धनबाद के लिए मंत्री सरयू राय और रांची के लिए मंत्री सीपी सिंह टिकट की चाहत रखे हुए थे।

इसी तरह विधायकों में हजारीबाग के लिए मनीष जयसवाल, धनबाद के लिए बिरंची नारायण, ढुल्लू महतो और राज सिन्हा, लोहरदगा के लिए विधायक शिवशंकर उरांव, रांची के लिए नवीन जयसवाल, गिरिडीह के लिए जयप्रकाश वर्मा, ढुल्लू महतो, कोडरमा के लिए जानकी यादव लोकसभा चुनाव में टिकट की आस लगाये हुए थे। लोकसभा प्रभारी की बात करें तो प्रदेश उपाध्यक्ष प्रदीप वर्मा, प्रदेश महामंत्री दीपक प्रकाश और संजय सेठ रांची लोकसभा के लिए प्रयासरत थे। प्रदीप वर्मा तो चतरा लोकसभा के लिए भी लाइन में थे। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पार्टी आलाकमान टिकट बंटवारे के साथ ही विधायकों, मंत्रियों और संगठन के बड़े पदाधिकारियों के कार्यकलापों की तीसरी आंख से निगहबानी कर रहा है।

बहरहाल, इस चुनाव में इतना तो सच है कि भाजपा को पिछले चुनाव से ज्यादा मेहनत करनी होगी। यहां यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि भाजपा को लगभग चार लोकसभा सीटों पर पार्टी कार्यकर्ताओं के भितरघात का भी सामना करना पड़ सकता है। रांची से रामटहल चौधरी और गिरिडीह से रवींद्र पांडेय के समर्थक अभी से भाजपा के खिलाफ ताल ठोके हुए हैं। वे चुनाव भी लड़ेंगे। जाहिर है, उनका बड़ा मकसद भाजपा को सबक सिखाना ही होगा। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि 2014 की तुलना में 2019 का चुनाव भाजपा के लिए बहुत आसान नहीं होगा।

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