जब सीतामढ़ी में कृपलानी के खिलाफ पंडित नेहरू ने हटा लिया था कांग्रेस प्रत्याशी
नई दिल्ली। सीतामढ़ी ऐतिहासिक स्थल है। माता सीता की यह जन्मभूमि है। इस ऐतिहासिक शहर का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। भारत के विद्वान प्रोफेसर, चिंतक और राजनेता आचार्य जेबी कृपलानी सीतामढ़ी से सांसद चुने गये थे। लोकसभा के पूर्व स्पीकर बलिराम भगत भी यहां से जीत चुके हैं। लेकिन अभी सीतामढ़ी लोकसभा क्षेत्र विवादों की वजह से सुर्खियों में है। यहां के मौजूदा सांसद राम कुमार शर्मा खाली हाथ बैठे हैं। वे उपेन्द्र कुशवाहा पर पैसा लेकर टिकट नहीं देने का आरोप लगा रहे हैं। राजद के खेमे में नाराजगी और जदयू के उम्मीदवार बदले जाने की भी पूरजोर चर्चा है।

राजनीति का गौरवमयी अतीत
आचार्य जे बी कृपलानी कांग्रेस के नेता होने का साथ साथ विद्वान शिक्षक भी थे। वे सिंध पाकिस्तान के रहने वाले थे। फिर मुम्बई आ गये थे। 1912 में वे बिहार के मुजफ्फरपुर शिक्षक बन कर आये थे। भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज (अब लंगट सिंह कॉलेज ) में वे इतिहास के लेक्चरर नियुक्त हुए थे। एक शिक्षक के रूप में उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी। 1917 में महात्मा गांधी जब चम्पारण जाने के लिए मुजफ्फरपुर पहुंचे थे तब आचार्य कृपलानी ने उनकी आगवानी की थी। इसकी वजह से अंग्रेजों ने उन्हें लेक्चरर पद से हटा दिया। फिर उनको महामना मदन मोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बुला लिया।
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नेहरू ने हटाया कांग्रेस प्रत्याशी
आचार्य कृपलानी बनारस तो चले गये लेकिन उनकी जेहन में मुजफ्फरपुर बसा रहा। 1957 के लोकसभा चुनाव में वे चुनाव लड़ने के लिए बिहार के सीतामढ़ी पहुंचे। सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर से सटा हुआ है। उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में पर्चा भरा। आचार्य कृपलानी कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके थे। प्रधानमंत्री नेहरू उनकी बहुत इज्जत करते थे। जब पंडित नेहरू को मालूम हुआ कि वे चुनाव लड़ने के लिए सीतामढ़ी गये हैं तो उन्होंने वहां से कांग्रेस प्रत्याशी को हटा लिया। प्रधानमंत्री नेहरू चाहते थे कि कृपलानी जैसे प्रखर नेता संसद में पहुंचे। इसलिए उन्होंने उनकी जीत का रास्ता तैयार कर दिया। उनके सामने अब निर्दलीय उम्मीदवार बुझावन सिंह बच गये थे जिनको आचार्य कृपलानी ने आसानी से हरा दिया। 1980 में बलिराम भगत यहां से जीते थे जो लोकसभा के पूर्व स्पीकर थे।

अब राजनीतिक विवादों से सीतामढ़ी की चर्चा
रामकुमार शर्मा सीतामढ़ी के मौजूदा सांसद हैं। लेकिन बदकिस्मती ये हैं कि वे 2019 के चुनाव से बाहर हैं। 2014 में वे उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा के टिकट पर चुने गये थे। एनडीए में रहने या नहीं रहने के सवाल पर जब रालोसपा में टूट हुई तो राम कुमार शर्मा, कुशवाहा के साथ बने रहे। सीट बंटवारे में जब कुशवाहा ने अपने सीटिंग सांसद के लिए सीट नहीं ली तो राम कुमार नाराज हो गये। अब उन्होंने आरोप लगाया है कि उपेन्द्र कुशवाहा ने पैसा लेकर भी टिकट नहीं दिया। यानी सीतामढ़ी के सांसद पैसा से टिकट खरीदना चाहते थे। इसके पहले भी एक स्टिंग ऑपरेशन के खुलासे से वे विवादों में आये थे। रामकुमार शर्मा मौजूदा राजनीति की एक मिसाल हैं। अब राजनीति में पैसे का बोलबाला है। पहले की तुलना में राजनीति बहुत नीचे गिर गयी है। कहां कृपलानी जी और नेहरू जी का जमाना और कहां आज का दौर। राजनीति अब कमाने खाने का जरिया बन गयी है। जाति और सम्प्रदाय का कार्ड खेल कर जीत हासिल की जा रही है। राजद ने अर्जुन राय को उम्मीदवार बनाया है जो पहले जदयू में थे। अर्जुन राय को टिकट मिलने से राजद के एक अन्य नेता सीताराम यादव नाराज हैं। सीताराम यादव का खेमा अर्जुन राय का विरोध कर रहा है। इस सीट पर जदयू ने पहले डॉ. वरुण पर दांव खेला था। लेकिन जब ये दांव उल्टा पड़ गया तो जदयू को आनन फानन में भाजपा के नेता सुनील कुमार पिंटू को अपना प्रत्याशी बनाना पड़ा। जीत के लिए अब राजनीतिक दल कुछ भी करने को तैयार हैं।
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