कुशवाहा, मांझी, सहनी को करारा तमाचा, टिकट के सौदागरों को जनता ने सबक सिखाया!

नई दिल्‍ली। घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने। बिहार में महागठबंधन का यही हाल रहा। राजद की शर्मनाक हार हुई तो उसके तीन सहयोगी दलों की मिट्टीपलीद हो गयी है। ये दल हैं राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी। ये तेजस्वी की सबसे बड़ी नाकामी और नादानी थी कि उन्होंने इन तीन छोटी पार्टियों को हैसियत से अधिक शेयर दिया था। रालोसपा, हम और वीआइपी पर आरोप लगा था कि उन्होंने टिकट बेचने के लिए ही अधिक सीटें ली थीं। जनता ने टिकट का कारोबार करने वाले नेताओं को करारा तमाचा मारा है। इन तीन दलों का खाता भी खुलता नजर नहीं आता।

औंधे मुंह गिरे उपेन्द्र कुशवाहा

औंधे मुंह गिरे उपेन्द्र कुशवाहा

उपेन्द्र कुशवाहा को अतिमहात्वाकांक्षा ले डूबी। वे इस चुनाव में बहुत तामझाम से दो सीटों पर खड़ा हुए। बड़बोलेपन की सारी सीमाएं पार कर दी। अपनी जाति की प्रभाव वाली उजियारपुर और काराकाट सीट पर पूरा जोर लगाया। लेकिन कुशवाहा वोटरों ने भी उपेन्द्र को नकार दिया। वे दोनों सीटों पर हारते हुए दिख रहे हैं। इंसान जब बिना क्षमता के सपने देखने लगता है तो उसका यही हस्र होता है। वे अच्छे भले केन्द्र सरकार में मंत्री थे। लेकिन वे मुगालता पाल बैठे कि वही कुशवाहा समुदाय का सबसे बड़ा नेता हैं। यहां तक कि उन्होंने भावी मुख्यमंत्री बनने की हसरत पाल ली। इसी होड़ में वे नीतीश कुमार से लड़ बैठे। अधिक सीट की मांग पर एनडीए से भी झगड़ा कर लिया। 2014 में मोदी के नाम पर तीन सीटों पर जीते तो खुद को बड़ा नेता मान लिया। लड़ झगड़ कर महागठबंधन में गये । वहां पांच सीटें मिली। काराकाट, उजियारपुर, पश्चिम चम्पारण, पूर्वी चम्पारण और जमुई में रालोसपा के प्रत्याशी हारते हुए दिख रहे हैं। इन सभी पांच सीटों पर संभावित हार से उपेन्द्र कुशवाहा की कलई खुल गयी। कुशवाहा वोटरों ने बता दिया कि वे मोदी और नीतीश के साथ हैं। पाला बदलना कुशवाहा के लिए आत्मघाती हो गया। अब उनका राजनीति भविष्य अंधेरे में घिर गया है।

मांझी को समझ में आ गयी हैसियत

मांझी को समझ में आ गयी हैसियत

जीतन राम मांझी को नीतीश कुमार ने बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था। सीएम बनने के बाद जीतन राम मांझी खुद को सबसे बड़ा दलित नेता मान बैठे। इस जोश में वे नीतीश कुमार से लड़ बैठे। जदयू से उन्हें बाहर होना पड़ा। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के नाम से पार्टी बनायी। पहले राजनीतिक लाभ के लिए एनडीए से सौदेबाजी की। अधिक लाभ के लोभ में महागठबंधन में चले गये। एक विधायक वाली मांझी की हम को तेजस्वी ने तीन सीटें दे दीं। मांझी की हालत ये थी कि उनके पास लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कोई ठंग का नेता भी नहीं था। आरोप लगा कि लेनदेन के बाद हम में दो टिकट दिये गये। इस खेल में औरंगाबाद में कांग्रेस का खेल बिगड़ गया। औरंगाबाद में हम के उपेन्द्र प्रसाद और नालंदा में अशोक कुमार बहुत पीछे हैं। उनकी हार तय लग रही है। यहां तक कि जीतन राम मांझी भी गया में चुनाव हार रहे हैं।

मुकेश सहनी की भी फजीहत

मुकेश सहनी की भी फजीहत

दरभंगा के रहने वाले मुकेश सहनी ने फिल्मी दुनिया में नाम और दाम कमाया तो उनको नेता बनने का शौक चर्राया। निषाद और मल्लाह जातियों को गोलबंद कर वे पिछले कुछ समय से नेता बनने की कोशिश कर रहे थे। पहले उन्होंने एनडीए से तोलमोल की। वहां बात नहीं बनी तो महागठबंधन का रुख कर लिया। पता नहीं तेजस्वी ने क्या देख कर उनको इतनी अहमियत दी और तीन सीटें दे दीं। उनके पास भी चुनाव लड़ने लायक नेता नहीं थे। पैसा फिर बोलने लगा। आरोप लगा कि सहनी ने मधुबनी और मुजफ्फरपुर की सीट नजराना लेकर ऐसे लोगों को दे दी जिनकी कोई राजनीतिक पहचान नहीं थी। वे खुद को मल्लाहों का सबसे बड़ा नेता मान रहे थे। जाति की संख्या देख कर वे खगड़िया चुनाव लड़ने चले गये। सहनी तो खुद हारते हुए दिख ही रहे हैं, मुजफ्फरपुर और मधुबनी में भी उनकी नैया डूबती लग रही है। जनता ने इस बार मौसमी नेताओं को सबक सीखा दिया है। जाति के ठेकेदारों को जोरदार तमाचा लगा है। किसी जाति और समुदाय को अपना जागीर समझने वाले नेताओं को जनता ने बता दिया कि उन्हें टिकट के सौदागरों से सख्त परहेज है।

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