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JNU के चर्चित छात्र नेता लोकसभा की राह पर, क्या कर पाएंगे संसद की दहलीज पार? जानिए क्या कहता है समीकरण

Lok Sabha Election: लोकसभा चुनाव का मौसम है। कई उम्मीदवार इस चुनावी रण में अपना भाग्य आजमाने मैदान में हैं। इस बार के आम चुनाव में कुछ चर्चित छात्र नेताओं को भी लोकसभा चुनाव के लिए टिकट मिला है। इस चुनाव में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के तीन छात्र नेताओं को लेकर चर्चा गरम है।

दरअसल, जेएनयू उन विश्वविद्यालयों में से है जिसने देश को कई नामचीन राजनेता दिए हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि आज तक इनमें से कोई भी नेता लोकसभा के दरवाजे तक नहीं पहुंच सका है।
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अक्सर ऐसा देखा गया है कि इन नेताओं के यूनिवर्सिटी कैंपस से बाहर निकलने के बाद इनकी आवाज, विचार और मौजूदगी में वो बुलंदी नहीं रहती जो कैंपस के अंदर होती थी। अक्सर से मुख्य भूमिका से दूर ही रह जाते हैं। यूं कहें, यूनिवर्सिटी वाली राजनीति के हीरो रहे ये नेता बाहर की दुनिया की राजनीतिक फिल्म में सपोर्टिंग एक्टर्स बन जाते है हैं।

इस बार जेएनयू के तीन छात्र नेता चुनाव के मैदान में हैं। ये पहली बार है जब एक साथ जेएनयू के तीन नेता लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। खास बात ये है कि इन तीनों को ही टिकट इंडी गठबंधन की ओर से दिया गया है। ये तीन नाम हैं, कन्हैया कुमार, संदीप सौरभ और दीप्सिता धर।

नॉर्थ ईस्ट दिल्ली से कन्हैया कुमार
जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके कन्हैया कुमार ने 2021 में कांग्रेस ज्वाइन कर लिया था। इस बार के आम चुनाव में कन्हैया को कांग्रेस ने नॉर्थ ईस्ट दिल्ली लोकसभा सीट से टिकट दिया है। हालांकि, वो 2019 में सीपीआई के सिंबल पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन उन्हें बिहार की बेगूसराय सीट पर हार का सामना करना पड़ा था।

वर्तमान में कन्हैया कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई के प्रभारी भी हैं। मूल रूप से बिहार के बेगूसराय के रहने वाले कन्हैया 2016 में पहली बार सुर्खियों में तब आए थे जब उनपर देशद्रोह का आरोप लगा था। इस मामले में वे अभी जमानत पर हैं और उनके खिलाफ निचली अदालत में ट्रायल चल रहा है।

इस लोकसभा चुनाव में उनका मुकाबला बीजेपी के मनोज तिवारी से है। तिवारी 2014 से नॉर्थ ईस्ट दिल्ली सीट से सांसद हैं। कन्हैया के लिए यहां जीत आसान नहीं होने वाली है।
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2019 चुनाव में कांग्रेस को नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में सिर्फ 28 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बीजेपी के मनोज तिवारी ने करीब 54 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। यह करीब-करीब दोगुना है। इस लोकसभा के अधीन विधानसभा की 10 सीटें हैं, जिसमें से 3 पर बीजेपी और 7 पर कांग्रेस का कब्जा है। खास बात ये है कि इन दसों सीटों पर कांग्रेस पिछले चुनाव में या तो तीसरे या चौथे नंबर पर रही थी। ऐसे में कन्हैया के लिए जीत की राह आसान नहीं होने वाली। बता दें, 2019 में कन्हैया को बीजेपी के ही उम्मीदवार, गिरिराज सिंह से करारी हार मिली थी।

अगर बात नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली का जातीय समीकरण की करें तो वो कन्हैया कुमार के पक्ष में जाता दिखा रहा है। यहां 21 प्रतिशत मुस्लिम और 21 प्रतिशत दलित वोटर्स हैं। इसके बाद ब्राह्मण, पंजाबी और गुर्जर वोटरों का दबदबा है।

नालंदा से संदीप सौरभ को टिकट
जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व महासचिव रहे संदीप सौरभ इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर हैं। उन्हें बिहार के नालंदा सीट पर इंडिया गठबंधन के घटक दल माले से टिकट मिला है। बता दें, नालंदा लोकसभा सीट बिहार में जेडीयू का गढ़ माना जाता है। वर्तमान में यहां से जेडीयू के कौशलेंद्र कुमार सांसद हैं और पार्टी ने इस बार भी उन्हें ही टिकट दिया है।

संदीप पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। इससे पहले उन्होंने 2020 के विधानसभा चुनाव में पालीगंज सीट से जीत दर्ज की थी। जेएनयू से पीएचडी करने वाले संदीप 2013 में छात्रसंघ के महासचिव बने थे। वो अपने परिवार में पहली पीढ़ी के राजनेता हैं। हाल ही में बिहार विधानसभा में दिए गए उनके कई भाषण सोशल मीडिया पर जानकर शेयर किये गए थे। संदीप बिहार शिक्षक संघर्ष मोर्चा के संयोजक भी रह चुके हैं। यह संगठन शिक्षक मोर्चा ने नई नियमावली लाने के बाद बनाया था।

बात करें नालंदा सीट की तो यहां जीत हासिल करना संदीप के लिए आसान नहीं होने वला है। साल 1996 से यह सीट समता पार्टी-जेडीयू के कब्जे में है। पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने यहां 2 लाख 56 हजार वोटों से जीती दर्ज की थी। नालंदा लोकसभा के अंतर्गत विधानसभा की 7 सीटें हैं, जिसमें 5 जेडीयू,1 आरजेडी और 1 पर बीजेपी के पास है।
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सेरोमपुर से दीप्सिता धर को बनाया गया उम्मीदवार
जेएनयू एसएफआई की अध्यक्ष रहीं दीप्सिता धर को पश्चिम बंगाल की सेरामपुर लोकसभा सीट से टिकट दिया गया है। यह सीट तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। टीएमसी के कद्दावर नेता कल्याण बनर्जी यहां से सांसद हैं। इंडी गठबंधन की ओर से टिकट मिलने के बाद भी दीप्सिता का मुकाबला गठबंधन के घटक दल, टीएमसी के कद्दावर नेता से है, क्योंकि बंगाल में ममता बनर्जी ने 42 सीट पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया था।

बता दें, 2021 में सीपीएम की टिकट पर बाली सीट से विधानसभा चुनाव लड़ चुकी दीप्सिता पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं। 2021 विधानसभा चुनाव में वो तीसरे नंबर पर रही थीं।

दीप्सिता के लिए सेरमपुर का चुनाव काफी मुश्किलों भरा है। सेरमपुर में पिछले चुनाव में सीपीएम के उम्मीदवार रहे तीर्थंक रॉय की जमानत जब्त हो गई थी। दीप्सिता के लिए सेरमपुर का स्थानीय समीकरण भी एक बड़ी चुनौती है। सेरमपुर लोकसभा में विधानसभा की 7 सीटें हैं, लेकिन एक पर भी सीपीएम का कब्जा नहीं है। हालांकि, सीपीएम दीप्सिता की फायरब्रांड और जुझारू नेता की छवि को लेकर जीत का विश्वास बनाए हुए है।
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