दिल्ली में कांग्रेस के लिए नई शीला दीक्षित साबित हो पाएंगे कन्हैया कुमार?
North East Delhi Lok Sabha Election 2024: कांग्रेस दिल्ली की राजनीति में एक दशक से ज्यादा वक्त में लगभग निष्प्रभावी हो चुकी। ऐसे में उत्तर पूर्वी दिल्ली सीट पर वामपंथी विचारों को त्याग कर आए कन्हैया कुमार को टिकट देने का क्या मतलब हो सकता है? अगर दिल्ली में कांग्रेस के इतिहास को देखें तो इसके पीछे एक बड़ी वजह नजर आती है।
करीब ढाई दशक पहले पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के साथ भी कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली में इसी तरह का एक प्रयोग किया था। वही शीला दीक्षित 15 वर्षों तक कांग्रेस सरकार में सीएम रहीं। क्योंकि, भाजपा के गढ़ में मनोज तिवारी जैसे पूर्वांचली चेहरे के सामने कन्हैया कुमार को उतारना पार्टी के लिए चुनाव से पहले ही बड़ी चुनौती नजर आ रही है।

बेगूसराय में बुरी तरह हार चुके हैं कन्हैया
कन्हैया कुमार जेएनयू की घटना के बाद जिस तरह से सीपीआई के बहु-प्रचारित प्रत्याशी के तौर पर बिहार की बेगूसराय सीट पर बीजेपी के दिग्गज गिरिराज सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने पहुंचे थे, वह सब जानते हैं। लेकिन, दिल्ली के मीडिया के एक वर्ग में उनको जितना प्रचार मिला था, बिहार की अपनी जमीन पर वह चारों खाने चित होकर दिल्ली वापसी को मजबूर हो थे।
उत्तर पूर्वी दिल्ली में कितनी मजबूत है बीजेपी?
उत्तर पूर्वी दिल्ली वह सीट है, जहां 2019 में भाजपा प्रत्याशी मनोज तिवारी को 7,87,799 वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस की दिग्गज शीला दीक्षित भी उनके मुकाबले 4,21,697 वोट ही जुटा सकी थीं। आम आदमी पार्टी ने भी ब्राह्मण प्रत्याशी दिलीप पांडे पर ही दांव लगाया था। वह तो दिल्ली में सरकार में होने के बावजूद 1,90,856 वोट जुटा सके थे।
अगर पिछली बार आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को मिले वोटों को मिला भी दिया जाए तो भी बीजेपी को 1,75,246 वोटों की बढ़त हासिल हुई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि कन्हैया कुमार मनोज तिवारी के खिलाफ कितनी बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं?
दिल्ली में पूर्वांचली वोटर की भूमिका अहम
अब कांग्रेस की संभावित रणनीति का दूसरा पक्ष देखना जरूरी है। पूरी दिल्ली में आज की तारीख में करीब 40% वोटर बिहार, यूपी, झारखंड के रहने वाले हैं। माना जाता है कि दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से यह कम से कम 30 सीटों पर चुनावों का रुख मोड़ सकते हैं।
बीजेपी और आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अपने नेतृत्व में जिस तरह से पूर्वांचली नेताओं को तबज्जो दे रखा है, उसके पीछे भी यही कारण है। तिवारी खुद ही पूर्वांचली हैं और अपनी गायकी की वजह से पहले से लोकप्रिय भी हैं। इसी तरह आम आदमी पार्टी ने संजीव झा, दुर्गेश पाठक, दिलीप पांडे जैसे नेताओं को काफी प्राथमिकता दे रखी है।
दिल्ली में आगे भी कांग्रेस के काम आ सकते हैं कन्हैया कुमार?
दरअसल, 2013 के चुनाव के बाद से दिल्ली में जिस तरह से कांग्रेस का ग्राफ गिरा है, उसे एक ऐसे चेहरे की तलाश है, जो राख में से भी फलदार पेड़ उगा सके। इंडिया टुडे ने कांग्रेस सूत्रों के हवाले से बताया है कि पार्टी नेतृत्व की सोच ये है कि अगर कन्हैया चुनाव हार भी जाते हैं तो भी पार्टी दिल्ली में खुद को फिर से जिंदा करने में उन्हें काम में ला सकती है।
कांग्रेस के लिए नई शीला दीक्षित साबित हो पाएंगे कन्हैया कुमार?
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने इसके लिए शीला दीक्षित की दिल्ली में राजनीतिक एंट्री का उदाहरण दिया है। 1998 में कांग्रेस ने उन्हें इसी तरह से पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार बनाया था। लेकिन, वो बीजेपी के लाल बिहारी तिवारी से पहला ही चुनाव हार गई थीं। लेकिन, पार्टी ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया और उनकी अगुवाई में पार्टी उसी साल विधानसभा चुनाव जीत गई।
पूर्वांचली मतदाताओं की वजह से पार्टी नेतृत्व ने पिछले साल भी कन्हैया को दिल्ली कांग्रेस में अहम जिम्मेदारी देने की सोची थी, लेकिन प्रदेश ईकाई से कोई जुड़ाव नहीं होने की वजह से इसमें रुकावट आ गई। लेकिन, एक बार दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद नेतृत्व के लिए यह काम आसान हो सकता है और पार्टी को लगता है कि उसे एक मजबूत पूर्वांचली चेहरा मिल सकता है।












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