Lok Sabha Election: केरल में LDF,UDF को जंगली जानवरों से क्यों हुई दुश्मनी? हत्या के लिए बदलना चाहते हैं कानून
Lok Sabha Election 2024 Kerala: केरल में एलडीएफ और यूडीएफ एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन, एक खास मुद्दे पर दोनों ही गठबंधनों में गजब की जुगलबंदी नजर आ रही है। ये एकता जंगली जानवरों को देखते ही रास्ते से हटाने को लेकर है। इसके लिए दोनों ही ओर से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 को बदलने की भी मांग हो रही है।
केरल में सत्ताधारी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और विपक्षी यूनाटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ही गठबंधनों में शामिल पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया ब्लॉक का भी हिस्सा हैं। लेकिन, राज्य में यह दोनों ही गठबंधन आमने-सामने हैं। इन दोनों गठबंधनों में कई मुद्दों पर भले ही परोक्ष सहमति हो, लेकिन जब जंगली जानवरों की हत्या करने की बात आती है तो दोनों में गजब का तालमेल हो जाता है।

ठोस समाधान की जगह वोटरों को खुश करने को दे रहे हैं प्राथमिकता
दरअसल, केरल में कोविड महामारी के बाद जंगली जानवरों और इंसान के बीच संघर्ष में अप्रत्याशित बढ़ोतरी देखी जा रही है। खासकर केरल के ऊंचाई वाले जिलों में यह समस्या बहुत ही गंभीर संकट का रूप ले चुकी है।
यहां सीपीएम की अगुला वाला सत्ताधारी गठबंधन और कांग्रेस की अगुवाई वाला विपक्षी गठबंधन दोनों के पास ही इस मुश्किल परेशानी का कोई ठोस समाधान नहीं है। इसलिए, ऐसी बातों को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे कम से कम मतदाताओं को खुश किया जा सकता है।
जंगली जानवरों के हमले से लोगों में दहशत का माहौल
तथ्य यह है कि इंसान और जंगली जानवरों के संघर्ष से प्रभावित जिलों में एक आम नागरिक लगातार डर के माहौल में जीने को मजबूर है। किसी को नहीं पता कि कब किधर से जंगली जानवरों का हमला हो जाए। लेकिन, नेताओं के पास इस समस्या से निपटने की कोई ठोस रणनीति नहीं है।
सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों का कन्नी काटने वाला रवैया
जब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी वायनाड में पूरे तामझाम के साथ नामांकन के लिए पहुंचे थे तो उन्होंने भी इस मुद्दे को उठाया था। लेकिन, कोई ठोस समाधान बताने के बजाए, टाइम पास करके निकल गए। राज्य के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन तो कई कदम और आगे हैं। राज्य में लगातार दो बार से उनकी सरकार है। लेकिन, वह जंगली जानवरों की वजह से पैदा हुई दिक्कतों का दोष बीजेपी और कांग्रेस पर डाल रहे हैं।
नेताओं को सिर्फ बेजुबानों की हत्या में दिख रहा है समाधान
सीएम विजयन चाहते हैं कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 को बदल दिया जाए। लेकिन, इस बात पर उनका ध्यान नहीं जा रहा है कि जानवरों के क्षेत्रों में जो कमी आई है और उनके लिए चारे का जो अभाव पैदा हुआ है,उसे कैसे दूर किया जाए। इसकी ही वजह से वह मजबूरन अपने मूल स्थानों से बाहर निकलने लगे हैं।
मेनिफेस्टो तक में जंगली जानवरों की हत्या का वादा डालने की तैयारी
नेताओं और चर्च की ओर से भी इसी तरह की बातें बताने की कोशिश हो रही है। मसलन, टीओआई ने वायनाड के सुल्तान बाथेरी से विधायक आईसी बालाकृष्णन से बात की है। उन्होंने हाल ही में जंगली जानवरी की वजह से तीन लोगों की जान जाने की ओर इशारा किया है। उनका कहना है, 'जंगली जानवरों का हमला बहुत बड़ी समस्या है। वर्षों से वन्यजीव संरक्षण कानून में संशोधन की मांग हो रही है। हम पार्टी (यूडीएफ) के मेनिफेस्टो में इसे शामिल करने की योजना बना रहे हैं।'
जंगली जानवरों के खिलाफ गजब की बढ़ रही है जुगलबंदी!
वहीं इडुक्की में हाई रेंजेज प्रोटेक्शन काउंसिल के चेयरमैन फादर सेबस्टियन कोचुपुरकल जैसे ईसाई समुदाय के नेता का कहना है, उम्मीदवार किसी भी दल का हो, जो कानून में संशोधन के लिए दबाव बना सकता है और संसद में मुद्दा उठा सकता है, मतदाता उसे ही चुनेंगे। ये माधव गाडगिल रिपोर्ट लागू करने के भी विरोधी थे।
संयोग से इडुक्की से एलडीएफ प्रत्याशी जॉयस जॉर्ज को गाडगिल रिपोर्ट के खिलाफ प्रदर्शन का फायदा भी मिल चुका है और वह 2014 में यहां से चुनाव जीत भी चुके हैं, जिसपर 1984 से कांग्रेस का कब्जा था। मतलब, जंगली जानवर किस तरह से जंगलों में ही रहें, इसका रास्ता खोजने की जगह बाहर निकलने पर उसे निपटाने की सोच को ही बढ़ावा दिया जा रहा है।
जंगली जानवरों की समस्या पर क्या कहते हैं जानकार?
पर्यावरण कार्यकर्ता आर नीलाकंदन को लगता है कि इस समस्या की वजह से राज्य सरकार को चुनाव में खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। उनके मुताबिक, 'क्योंकि, एलडीएफ राज्य में सत्ता में है, इस बार उसे इसका सामना करना पड़ेगा। ये एक हताशापूर्ण उपाय है, क्योंकि मतदाताओं के पास आज खास विकल्प नहीं है।'
वे कहते हैं,'कानून में बदलाव का प्रस्ताव और जंगल से बाहर आने वाले जंगली जानवरों को मारने की अनुमति देने की बात अनपढ़ नेताओं की ओर से ही कही जा सकती है। जबकि, पारिस्थितिक मुद्दों से निपटने की चुनौती का समय है।'
उनके मुताबिक, 'उन्हें पता है कि इस तरह के टुकड़ों वाला समाधान कभी कारगर नहीं होगा। एक जटिल मुद्दे से पीछा छुड़ाने का यह एक आसान तरीका है।' उनका कहना है अभी अगर किसी की जान चली जाती है तो राज्य सरकार की सोच मुआवजा बांटने और परिवार को नौकरी देने तक ही सीमित है।
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