Lok Sabha Chunav: मुस्लिम आरक्षण का जिन्हें मिला फायदा, उन्हें भविष्य को लेकर क्यों होने लगी चिंता?

Lok Sabha Election: लोकसभा के अभियान में इस बार मुस्लिम आरक्षण या मुसलमानों को कोटा देने के मामले ने बहुत तूल पकड़ा है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी गठबंधन खासकर कांग्रेस को निशाना बनाने के लिए इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया।

पीएम मोदी ने चुनाव अभियान के शुरू में ही राजस्थान के बांसवाड़ा में जिस मुद्दे को उठाया था, उसपर अंतिम चरण के प्रचार अभियान की समाप्ति वाले दिन पंजाब के वोटरों को लिखे अपने खत में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सफाई तक देनी पड़ गई।

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मुस्लिम आरक्षण बना बड़ा चुनावी मुद्दा
लेकिन, इस चुनावी और सियासी मुद्दे ने मुसलमानों के उस वर्ग में एक आशंका पैदा कर दी है, जो तकरीबन 17 वर्षों से इसका फायदा उठाते आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में धर्म के आधार पर मुसलमानों के लिए कोटा निर्धारित करने को लेकर कांग्रेस की सरकारों को घेरा है।

अविभाजित आंध्र प्रदेश ने की 4% मुस्लिम कोटे की व्यवस्था
इस मुस्लिम आरक्षण कोटे की शुरुआत अविभाजित आंध्र प्रदेश में 2007 में कांग्रेस सरकार में ही हुई थी। तब वहां वाईएसआर राजशेखर रेड्डी मुख्यमंत्री थे और उनकी सरकार ने मुसलमानों में आर्थिक रूप से पिछड़े 14 वर्गों को शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में 4% कोटा देना का ऐलान किया था। तब केंद्र की सत्ता में यूपीए काबिज थी, इसलिए वह अपने फैसले पर मुहर लगवाने में कामयाब हो पाए।

तेलंगाना में करीब 10% मुस्लिम आबादी
जब आंध्र प्रदेश का विभाजन हुआ और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव की अगुवाई में तेलंगाना राष्ट्र समिति की सरकार बनी तो उनकी नजर 6 करोड़ की आबादी वाले राज्य की 10% मुस्लिम वोट बैंक पर अटक गई।

वाईएसआर रेड्डी सरकार के फैसले के ठीक एक दशक बाद उन्होंने मुस्लिम कोटे को 4% से बढ़ाकर 12% करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा। लेकिन, तबतक केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बन चुकी थी और उसने केसीआर सरकार की सिफारिशें ठुकरा दीं।

कोटे का स्वाद चखने वाले मुसलमानों में भविष्य को लेकर चिंता
बीते 17 वर्षों में अनुमानित तौर पर इस कोटे का 20 लाख से ज्यादा मुस्लिम छात्रों को लाभ मिल चुका है। इस कोटे की वजह से लाखों मुस्लिम छात्र अबतक डॉक्टर, इंजीनियर और एमबीए बन चुके हैं। लेकिन, इस बार जिस तरह से इस मुद्दे ने तूल पकड़ा है और बीजेपी धर्म के आधार पर आरक्षण को असंवैधानिक बताकर आक्रामक है और विपक्ष बैकफुट पर दिखता है, उससे तेलंगाना में इसका लाभ उठा रहे मुसलमानों में अपने भविष्य को लेकर एक आशंका पैदा हो गई है।

कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले से भी बीजेपी को मिला आधार
ऊपर से कलकत्ता हाई कोर्ट ने जिस तरह से ममता बनर्जी सरकार की ओर से जारी किए गए 5 लाख से ज्यादा ओबीसी सर्टिफिकेट कैंसिल किए हैं, उससे भाजपा को एक और बड़ा कानूनी आधार भी मिल गया है। तथ्य यह है कि बंगाल सरकार ने जिन जातियों को ओबीसी की नई लिस्ट में शामिल किया था, उनमें कुछ को छोड़कर सारे मुसलमान ही थे।

कोटे का लाभ उठाने की बात करने से डर लगता है!
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम कोटे का लाभ उठाकर हैदराबाद में अच्छी जॉब करने वाले एक शख्स ने बताया, 'हां, मैं कोटा सिस्टम का लाभार्थी हूं। लेकिन, इन दिनों मैं इसे कबूल करने से खौफ खाता हूं।'

इसी तरह से एक और शख्स ने बताया, 'हां, वे आज इस बारे में बोलने से हिचकिचाने लगे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी उम्मीदें टूट सकती हैं। मैं दुआ करता हूं कि आरक्षण का विरोध करने वाले ये समझें कि ये धर्म पर आधारित (कोटा) नहीं है, बल्कि मौके से दूर रखने की प्रवृत्ति को ठीक करने के लिए है। इसे वापस लेने से लाखों युवा फिर से अपने काले अतीत में चले जाएंगे।'

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