ऐ दिल समझ ले ! कोरोना संग जीना सीख ले…लॉकडाउन के बाद भी नॉर्मल लाइफ मुमकिन नहीं
नई दिल्ली। बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने कोरोना संक्रमण पर एक लेख लिखा है। उन्होंने लिखा है, “आज तक किसी वायरस का पूर्णरुपेण उन्मूलन नहीं हो पाया है। वायरस का अनुवांशिकी रूपांतरण होते रहता है। इसलिए हमें भी परीक्षित उपायों और अनुभव के आधार पर भविष्य का रास्ता बनाना है।” दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी कह चुके हैं कि कोरोना के साथ जीना सीखना होगा। तो क्या अब हम कोरोना वायरस के साथ जीने के लिए मजबूर हैं ? तो क्या लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी जीवन पहले की तरह नहीं हो पाएगा ? अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. एंथोनी फौसी ने कहा है, “अब हमारा जीवन उस तरह से सामान्य नहीं हो पाएगा जैसा कि कोरोना संकट से पहले था। यह बीमारी पूरी तरह तब तक खत्म नहीं हो सकती जब तक कि कोई वैक्सीन न खोज ली जाय या कोई कारगर इलाज न खोज लिया जाए।” ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेष दूत डेविड नबारो की भी राय है कि अब दुनिया को कोरोना वायरस के खतरे के बीच ही जीना होगा।

अब कोरोना संग ही जीना
वैक्सीन की खोज और उसके कारगर इस्तेमाल में अभी समय लगेगा। लॉकडाउन तो कोरोना संक्रमण को रोकने का एक तात्कालिक उपाय है। इलाज नहीं। इसका इलाज तो किसी वैक्सीन या दवा से ही मुमकिन है। चूंकि दवा के बनने में देर है इसलिए लॉकडाउन को लंबा नहीं खींच सकते। ऐसा इसलिए, क्योंकि तब गरीबी और भुखमरी का सामना करना मुश्किल हो जाएगा। डेढ़-दो महीने के लॉकडाउन में ही दुनिया के धनी देशों की माली हालत इतनी खराब हो गयी कि उन्हें उद्योग धंधे शुरू करने की इजाजत देनी पड़ी। इसलिए अब हमें कोरोना के खतरों के बीच ही जीने की कला सीखनी होगी। वैज्ञानिक डेविड नबारो का कहना है कि अभी दुनिया के कई देश कोरोना वैक्सीन की खोज में लगे हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं कि उनकी यह खोज सुरक्षित और प्रभावकारी हो। कुछ वायरस की प्रकृति ऐसी होती है उसका वैक्सीन खोजना कठिन होता है। हम कब तक इससे डर कर घऱों में कैद रह सकते हैं। कोरोना का खतरा लगातार बना रहेगा और हमें जीने के लिए बाहर निकलना पड़ेगा। अब ये हम पर निर्भर है कि बाहर निकल कर कैसे अपनी सुरक्षा करते हैं। यानी अब दिल को समझाना पड़ेगा कि हमें कोरोना संग ही जीना है।

ऐ दिल ! अब हकीकत समझ ले
एड्स की बीमारी 1981 में पहली बार दुनिया के सामने आयी थी। इस बीमारी से अब तक 30 करोड़ लोग जान गंवा चुके हैं। 40 साल हो गये लेकिन वैज्ञानिक आज तक इसका इलाज नहीं खोज पाये। इस बीमारी के खौफ के बीच आज भी लोग जी ही रहे हैं। डेंगू की बीमारी ने 1970 से कहर ढाना शुरू किया था। नेचर माइक्रोबायोलॉजी साइंस पेपर के मुताबिक दुनिया के 125 देश डेंगू की चपेट में हैं और हर साल करीब 10 करोड़ लोग इस बीमारी से मरते हैं। 2019 में इस बीमारी ने भारत में सैकड़ों लोगों की जान ली थी। डेंगू का भी आज तक कारगर इलाज संभव नहीं हो पाया। इंसेफेलाइटिस या चमकी बुखार से बिहार के मुजफ्फऱपुर में हर साल सैकड़ों बच्चों की जान जाती है, लेकिन इसका भी तोड़ आज नहीं खोजा जा सका। भारत में कई ऐसी बीमारियां हैं जिनका कोई इलाज नहीं है। फिर भी हम जी रहे हैं क्यों कि इसके खतरों से अभ्यस्त हो गये हैं। उसी तरह कोरोना के खौफ के बीच भी हमें जीना पड़ेगा। इसके लिए भी वैसी ही मन:स्थिति बनानी होगी। मन को अनुशासन के बंधन में बांधना होगा। लॉकडाउन रहे या न रहे सामाजिक दूरी रखनी होगी। पार्टी तो बनती है, जैसे जुमले भूल जाने पड़ेंगे। अड्डेबाजी, मौज-मस्ती, अब बीते दिनों की बात हो जाएगी। अब जीवन का एक ही मूलमंत्र होगा, सुरक्षित रहना और रोजी-रोटी का इंतजाम करना।

लॉकडाउन के बाद भी रहेगी मुश्किल
कोरोना से मौत के मामले में इटली दूसरे स्थान पर है। यहां 29 हजार से अधिक लोगों की जान गयी है। लॉकडाउन से जब अर्थव्यवस्था चरमरा गयी तो इसमें छूट देनी पड़ी। रिश्तेदारों के साथ लोगों को घूमने की इजाजत दी गयी। लोग पार्कों में घूमने जा रहे हैं। सड़कों पर तफरीह कर रहे हैं लेकिन अंदर ही अंदर डरे हुए भी हैं। इन्हें डर है कि कोरोना का फिर हमला हो सकता है। इटली में करीब 45 लाख लोग दो महीने बाद काम पर लौटे हैं। कई फैक्टरियों और कंपनियों में काम करने की मंजूरी दी गयी है। बसों और मोटरगाड़ियों की आवाजाही भी शुरू हुई। लेकिन पहले जैसी बात नहीं। लोग सावधानी बरत रहे हैं। सामाजिक दूरी का पालन कर रहे हैं। फिर भी सहमे हुए हैं। इम्पीरियल कॉलेज के शोधकर्ताओं के मुताबिक इटली पर कोरोना का दोबारा हमला हो सकता है जो पहले से ज्यादा घातक होगा। इसका मतलब है कि लॉकडाउन खुलने के बाद भी जिंदगी पटरी पर आने वाली नहीं। कोरोना के खौफ के बीच जीना ही नियति है।
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