'भारत में मजदूर काम नहीं करना चाहते', L&T Chairman सुब्रह्मण्यन के बयान पर विवाद, BJP ने बताया- 'अपमानजनक'
L&T Chairman SN Subrahmanyan : '90 घंटे काम करने' वाला बयान देकर सुर्खियों में आए लार्सन एंड टुब्रो (L&T) के चेयरमैन एसएन सुब्रह्मण्यम एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने भारतीय श्रमिकों पर बयान देकर नया विवाद खड़ा कर दिया। उन्होंने हाल ही में आयोजित CII मिस्टिक साउथ ग्लोबल लिंकएज शिखर सम्मेलन 2025 में कहा कि भारत में मजदूर काम करने को तैयार नहीं है, इससे उद्योग जगत के लिए कई चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं।

एसएन सुब्रह्मण्यम के इस बयान की भाजपा सांसद और कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कड़ी आलोचना की है।
भारत के मजदूरों का मनोबल गिराने वाला बयान
प्रवीण खंडेलवाल ने सुब्रह्मण्यन के बयान को भारत के मेहनतकश मजदूरों के लिए "भ्रामक, अपमानजनक और मनोबल गिराने वाला" बताया। खंडेलवाल ने कहा, "सुब्रमण्यन की टिप्पणी न केवल भ्रामक है, बल्कि भारत में जमीनी स्तर पर हुई महत्वपूर्ण प्रगति और विकास के प्रति अपमानजनक और मनोबल गिराने वाली भी है।
उन्होंने आगे कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में मनरेगा, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी अनेक योजनाओं से भारतीय श्रमिकों को लाभ हो रहा है। इससे हमारी स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। सुब्रह्मण्यन का बयान सीधे तौर पर देश के श्रमिकों का अपमान है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिस तरीके से देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हो रहा है, उससे हमारे गांव और हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है।
अपने मजदूरों की स्थिति को सुधारें
प्रवीण खंडेलवाल ने एस.एन. सुब्रमण्यन पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि वे अपने यहां श्रमिकों के काम करने की स्थिति को सुधारें। उनके वेतन को ठीक करें और काम करने का अच्छा माहौल दें। उन्हें अपना बयान वापस लेना चाहिए।
सुब्रह्मण्यम ने क्या दिया था बयान?
सुब्रह्मण्यम ने कहा था कि दुनियाभर में लोग बेहतर रोजगार की तलाश में अपने देश से बाहर जा रहे हैं, लेकिन भारत में यह स्थिति उलट है। यहां के मजदूर काम करने के लिए गांवों से बाहर जाने को तैयार नहीं हैं। भारतीय श्रमिकों के काम करने में हिचकिचाने के पीछे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने MGNREGA,डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और जन धन खातों जैसे कार्यक्रमों को इसके लिए जिम्मेदार बताया। इन योजनाओं के तहत श्रमिकों को घर पर बैठकर काम के लिए पैसा मिलता है, जिससे उन्हें बाहर जाकर कठिन श्रम करने की जरूरत नहीं महसूस होती।
वह मानते हैं कि इन योजनाओं ने श्रमिकों को उनके घरों में ही रहकर रोजगार पाने की सुविधा प्रदान की है, और यही कारण है कि वे निर्माण उद्योग जैसे क्षेत्रों में काम करने के लिए गांवों से बाहर नहीं निकलते। उन्होंने आगे कहा, जब तक सरकार इन योजनाओं को जारी रखेगी, तब तक भारत में श्रमिकों की कमी बनी रहेगी और उद्योगों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
16 लाख से भी ज्यादा मजदूरों की आवश्यकता
एलएंडटी के चेयरमैन ने यह भी बताया कि वर्तमान समय में उद्योग जगत को श्रमिकों की गंभीर कमी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि एलएंडटी को करीब 4 लाख मजदूरों की आवश्यकता होती है, लेकिन कंपनी को 16 लाख मजदूरों की भर्ती करनी पड़ती है। यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हो रही है क्योंकि कई श्रमिक काम बीच में छोड़कर चले जाते हैं, जिससे कंपनियों को लगातार नई भर्तियां करनी पड़ती हैं।
सुब्रह्मण्यम ने यह भी कहा कि मजदूरों की सैलरी बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि उन्हें काम छोड़ने की वजह से अतिरिक्त दबाव का सामना न करना पड़े। उनके अनुसार, जब तक मजदूरों को उनके काम के हिसाब से उचित वेतन नहीं मिलेगा, तब तक उनके काम छोड़ने की समस्या जारी रहेगी।
गल्फ देशों में भारतीय श्रमिकों की प्राथमिकता
एलएंडटी के चेयरमैन ने यह भी कहा कि भारतीय श्रमिकों के लिए विदेशों, विशेषकर Gulf देशों में काम करने के अधिक अवसर हैं। इन देशों में भारतीय श्रमिकों को भारत की तुलना में 3 से 3.5 गुना अधिक वेतन मिलता है, यही कारण है कि भारतीय मजदूर अधिकतर Gulf देशों में काम करने के लिए प्राथमिकता देते हैं। यह स्थिति भारत में श्रमिकों की कमी को और भी गहरा बना देती है, जिससे निर्माण उद्योग जैसे क्षेत्रों में विकास रुक सकता है।
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