One Nation One Election: जानें किन देशों में लागू है वन नेशन-वन इलेक्शन मॉडल, क्या होगा इसका फायदा?

One Nation One Election: 'वन नेशन-वन इलेक्शन' के प्रस्ताव को बुधवार 18 सितंबर को मोदी कैबिनेट से मंजूरी मिल गई। वन नेशन-वन इलेक्शन पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में बनाई कमेटी द्वारा रिपोर्ट केंद्रीय कैबिनेट के समक्ष रखी गई थी, जिसपर कैबिनट ने अपनी मुहर लगा दी।

आइए जानते है कि वन नेशन-वन इलेक्शन का कॉन्सेप्ट? भारत के अलावा कितने देशों में वन नेशन-वन इलेक्शन की व्यवस्था है और इससे कितना फायदा या नुकसान होगा?

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क्या है इसका कॉन्सेप्ट?
पहले हम यह समझ लेते है कि भारत में वन नेशन-वन इलेक्शन का कॉन्सेप्ट क्या है। दरअसल, भारत में वन नेशन-वन इलेक्शन की अवधारणा है कि संसद के निचले सदन यानी लोकसभा चुनाव के साथ ही सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव के साथ-साथ नगर पंचायत और ग्राम पंचायतों के चुनाव भी एक साथ कराए जाएं।

बार-बार चुनाव देश में विकास की गति को करते है बाधित
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण के दौरान वन नेशन-वन इलेक्शन की वकालत की थी। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे बार-बार चुनाव देश की विकास गतिविधियों को बाधित करते हैं और राष्ट्र से इस चुनाव सुधार को अपनाने का आह्वान किया।

इन देशों में लागू है वन नेशन-वन इलेक्शन मॉडल
संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, स्वीडन और कनाडा जैसे देशों में भी ऐसी ही चुनावी व्यवस्था है, जहां सरकार के विभिन्न स्तरों के लिए चुनाव एक साथ होते हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति, कांग्रेस और सीनेट के चुनाव हर चार साल में एक पूर्व निर्धारित तिथि पर होते हैं, जिसे संघीय कानून द्वारा सुगम बनाया जाता है।

इसी तरह, फ्रांस हर पांच साल में अपनी राष्ट्रीय सभा, संघीय सरकार के प्रमुख और राज्य प्रतिनिधियों का चुनाव करता है। स्वीडन में हर चार साल में संसदीय और स्थानीय सरकार के चुनाव एक साथ होते हैं, जिसमें नगरपालिका और काउंटी परिषद के चुनाव शामिल हैं। कनाडा का तरीका थोड़ा अलग है, जहां हाउस ऑफ कॉमन्स के चुनाव हर चार साल में निर्धारित किए जाते हैं।

क्या है वन नेशन-वन इलेक्शन के फायदे?
वन नेशन-वन इलेक्शन प्रणाली अपनाने का सबसे ज्यादा फायदा यह है कि चुनाव व्यय (खर्च) घट जाएगा। अलग-अलग चुनाव कराने से हर बार भारी-भरकम पैसे खर्च होता है। इतना ही नहीं, बार-बार चुनाव ड्यूटी के कारण प्रशासनिक और सुरक्षा बलों पर भारी बोझ पड़ता है। चुनावों को एकीकृत करके, न केवल वित्तीय संसाधनों को संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सरकारें चुनाव अवधि के निरंतर व्यवधान के बिना अपना पूरा ध्यान विकास कार्यों पर लगा सकती हैं।

राजनीतिक दलों के बीच भी है मतभेद
बता दें कि वन नेशन-वन इलेक्शन के प्रस्ताव ने भारत में राजनीतिक दलों के बीच मतभेद पैदा कर दिया है। जबकि राष्ट्रीय दलों को संभावित लाभ दिखाई दे रहे हैं, क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय एजेंडे द्वारा राज्य-स्तरीय मुद्दों पर हावी होने की चिंता है। क्षेत्रीय दलों का मानना है कि अगर वन नेशन-वन इलेक्शन की व्यवस्था की गई तो राष्ट्रीय मुद्दों के सामने राज्य स्तर के मुद्दे दब जाएंगे। इससे राज्यों का विकास प्रभावित होगा।

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