Kesavanada Bharti Case: वो केस जिसने इंदिरा गांधी को झुका दिया, संसद को अपनी सीमा बता दी
Kesavanada Bharti Case: आखिर क्यों है केशवानंद भारती केस इतना लोकप्रिय। केरल हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हार के बावजूद देश के इतिहास में इस केस को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

Kesavanada Bharti Case: वर्ष 1951 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जब अपना पहला संविधान संशोधन करते हैं तो उसमे आर्टिकल 31 के तहत संपत्ति के अधिकार पर अंकुश लगाने की शुरुआत करते हैं इस पूरे विवाद की शुरुआत होती है।
केस की पृष्ठभूमि
संविधान के पहले संशोधन अधिनियम 1951 के तहत जब संपत्ति के अधिकार में कटौती की गई तो इसकी संवैधानिक वैद्यता को चुनौती दी गई। शंकरी प्रसाद मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अनुच्छेद 368 के तहत संसद मूल अधिकारों में संशोधन कर सकती है।
वहीं 1967 में 17वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत गोलकनाथ मामले में जब भूमि सुधारों से जुड़े मामले को चुनौती दी गई तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 368 के तहत संसद को मूल अधिकारों में संशोधन करने का अधिकार नहीं है। यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं।
इस मामले के बाद संसद ने संविधान में 24वां संशोधन किया, इसमे कहा गया कि मूल अधिकारियों में संसद किसी भी तरह का संशोधन कर सकती है। 25वें संविधान संशोधन में कहा गया कि सरकार खुद ही भूमि पर कब्जा करेगी और इसकी कीमत भी सरकार तय करेगी कि व्यक्ति को उस जमीन की कीमत कितनी मिलेगी।
केशवानंद भारती की एंट्री
जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट और संसद के बीच टकराव देखने को मिल रहा था उसके बीच जगतगुरू शंकराचार्य केशवानंद भारती की इस पूरे मामले में एंट्री होती है। वह केरल के एडनीर में स्थित शैव मठ के मठाधीश थे। केशवानंद भारती शंकराचार्य परंपरा से आते थे, उन्होंने 19 साल की उम्र में संन्यास ले लिया था।
केरल सरकार के खिलाफ कोर्ट पहुंचा मामला
1971 में केरल मे वामपंथी सरकार थी, इस समय भूमि सुधार कानून बनाया गया। उस वक्त केरल में कई धार्मिक संस्थाओं के पास काफी जमीन थी, लेकिन केरल सरकार ने इस भूमि सुधार कानून के तहत जमीन को अपने कब्जे में ले लिया। एडनीर स्थित शैव मठ की हजारों एकड़ जमीन को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया था। इन जमीनों को भूमिहीनों में बांटा जाने लगा।
केस के हीरो नानी पालकीवाला
यहां ध्यान देने वाली बात है कि नानी पालकीवाला जोकि जाने माने वकील और संविधान के ज्ञाता थे, उन्होंने इस पूरे मामले में केशवानंद भारती की ओर से कोर्ट में पैरवी की। संविधान के संशोधन 24, 25, 26 और 29वें को चुनौती दी गई, जिसकी पालकीवाला ने कोर्ट में मठ की ओर से पैरवी की। इस केस की वजह से नानी पालकीवाला इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए। दिलचस्प बात यह है कि केशवानंद भारती और नानी पालकीवाला की कभी भी आपस में मुलाकात नहीं हुई।
केरल हाई कोर्ट में मिली हार
केरल सरकार के इस फैसले को केशवानंद भारती ने केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी। 1970 में केशवानंद ने केरल हाई कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 26 का का हवाला देते सरकार के फैसले को चुनौती दी। अनुच्छेद 26 धार्मिक संपत्ति के रख-रखाव और एवं प्रबंधन का मूल अधिकार देता है। साथ ही केरल सरकार के भूमि सुधार कानून को भी चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
केरल हाई कोर्ट में केशवानंद भारती को हार का सामना पड़ा, जिसके बाद केशवानंद भारती सुप्रीम कोर्ट पहुंचते हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने संविधान के अनुच्छेद 368, 13, 25,, 26,29, 31 समेत कई अनुच्छेद की व्याख्या करने की चुनौती थी। ऐसे में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले की सुनवाई के लिए अभी तक की सबसे बड़ी 13 जजों की बेंच गठित की गई, जिसने 68 दिनों तक इस मामले की लगातार सुनवाई की।
सुप्रीम कोर्ट में भी मिली हार
अहम बात है कि 1972 में 7 जज केशवानंद भारती के विरोध में फैसला देते हैं और 6 जज केशवानंद भारती के पक्ष में फैसला देते हैं और केशवानंद भारती यह केस हार जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संसद संविधान के किसी भी अनुच्छेद में संशोधन कर सकता है। लेकिन संविधान की मूल भावना में बदलाव नहीं कर सकती है।
इंदिरा गांधी के लिए साख का सवाल
सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की पीठ में से 7 जजों का मानना था कि संसद संविधान की मूल भावना को बदल नहीं सकती है, जबकि 6 जजों का मानना था कि संसद संविधान की मूल भावना को बदल सकती है। अहम बात है कि इन 6 जजों में से एक जज जस्टिस एएन राय को तत्कीलन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया।
अहम बात यह है कि यह जज वरिष्ठता में चौथे नंबर पर थे, बावजूद इसके उन्हें मुख्य न्यायाधीश बनाया गया और उनपर यह दबाव बनाया गया कि इस मामले की फिर से सुनवाई की जाए और संविधान की मूल भावना में संशोधन नहीं किया जा सकता है इसे बदला जाए।
फिर से सुनवाई के लिए गठित हुई बेंच
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने केशवानंद भारती केस के फैसले को बदलने की कोशिश की। अटॉर्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की। तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एएन राय ने इस फैसले पर पुनर्वनिचार के लिए 13 जजों की बेंच बनाई। उनपर उस वक्त आरोप लगा कि सीजेआई इंदिरा सरकार के एजेंडा को आगे बढ़ा रहे हैं।
बेंच को कर दिया गया भंग
कोर्ट में फिर से पालकीवाला पेश हुए और ऐतिहासिक दलीलें दी। जिसे सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में सबसे प्रभावी दलील माना जाता है। बात में यह बात सामने आई कि सरकार की ओर से इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर नहीं की गई थी। ऐसे में बिना पुनर्विचार याचिका के चीफ जस्टिस ने बेंच कैसे बनाई। इसपर बेंच के बाकी जजों ने सवाल खड़ा कर दिया। बाकी जजों के दबाव के चलते मुख्य न्यायाधीश ने 12 नवंबर 1975 को इस बेंच को भंग कर दिया।
आखिर क्या है मूल ढांचे यानि Basic Structure
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य में फैसला सुनाते हुए कहा था कि संसद संविधान में किसी भी तरह का संशोधन कर सकती है लेकिन इसके मूल ढांचे में बदलाव नहीं कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समय-समय पर हम बताते रहेंगे कि संविधान का मूल ढांचा क्या होता है।
संविधान की सर्वोच्चता, केंद्र और राज्य के बीच शक्ति का विभाजन, पंथ निरपेक्षता, विधि के समक्ष समता, स्वतंत्र न्यायपालिका, संसदीय प्रणाली, आदि मूल ढांचा है जिसमे बदलाव नहीं किया जा सकता है। संविधान की प्रस्तावना को भी सुप्रीम कोर्ट ने मूल ढांचा बताया था।












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