'उसने मुझे अकेला छोड़ दिया', वायनाड तबाही में बची 80 वर्षीय बुजुर्ग की रुला देगी आपबीती, बेघर हुए सैकड़ों लोग
Wayanad Landslide Survivor: मंगलवार का दिन केरल के वायनाड में भारी तबाही बनकर आया। सुबह भारी बारिश के बीच पहाड़ी इलाकों में भारी भूस्खलन हुआ, जिसके बाद चट्टानों का मलबा अपने पीछे तबाही का भयानक मंजर छोड़ा दिया। इस आपदा में 158 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं खोज और बचाव अभियान अभी भी जारी है।
मूसलाधार बारिश की वजह से हुए भूस्खलन ने वायनाड जिले के मेप्पाडी के वेल्लारीमाला गांव के मुंडक्कई और चूरलमाला इलाकों में तबाही मचा दी। इस आपदा में बचे लोग कुछ भी बोलने या सुनाने के लायक नहीं है। उनके घर पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं। जहां कभी उनका आशियाना हुआ करता था, अब सिर्फ वहां मलबा ही मलबा है।

पेड़ों से लेकर घर तक सब कुछ खत्म होते दिखाई दे रहे हैं। बाढ़ के पानी में बह गए वाहनों को पेड़ों के तने में फंसा हुआ देखा जा सकता है। इस घटना से पीड़ितों और उनके परिवारों की जिंदगी पर गहरा असर पड़ा है, वो सहमे हुए हैं। उनका घर और आजीविका सब कुछ खत्म हो चुका है।
दुख की गहराई में डूब लोग
इसी के साथ उन्हें पता है कि उनके कई करीबी और प्रिय लोग कभी वापस नहीं आएंगे। 30 जुलाई की सुबह-सुबह हुई दर्दनाक घटनाओं ने मृतकों के परिजनों के बीच एक अजीब सा खालीपन छोड़ दिया। उदासी के बीच कई लोगों ने आधी रात की उथल-पुथल को याद किया, जिसने उनके जीवन को दुख की गहराई में डूबो दिया।
मुंडक्कई से बचे एक शख्स प्रांजीश ने कहा कि लगभग 12:40 बजे, भूस्खलन हुआ। हमने एक बहुत बड़ी आवाज सुनी। मेरे परिवार के तीन सदस्य मेरे घर के ठीक सामने हुए भूस्खलन में खो गए। उन्होंने आगे कहा, "अब, हम एक शिविर में हैं और सुरक्षित हैं। हम आठ लोग हैं। मेरी मां की बहन और उसका परिवार पीछे रह गया।"
चूरलमाला की त्रासदी
चूरलमाला की एक और 40 वर्षीय महिला, जिसका नाम प्रसन्ना है, अपनी आपबीती सुनाते हुए रो पड़ी, उसने बताया कि उसने अपनी बहन और उसके परिवार को कीचड़ भरे पानी में बहते हुए देखा। उसने कहा, "मैं केवल अपने पिता की मदद कर सकती थी। मैं उन्हें उठाकर जंगल की ओर भागी। मैं अपनी बहन की मदद नहीं कर सकी। मैं उसे बचा नहीं सकी। दो बच्चे बाहर भागे और बह गए। मैं उनकी चीखें सुन सकती थी। हमारा घर बह गया।"
80 वर्षीय बुजुर्ग महिला रह गई अकेली
प्रसन्ना ने कहा कि विनाशकारी घटना को देखने के बाद जो बच्चे बच गए, वे सो नहीं पा रहे हैं। वे अभी भी उस दर्दनाक अनुभव से पीड़ित हैं और भूस्खलन के दोबारा आने के डर से आधी रात को जाग जाते हैं। वहीं पद्मावती नाम की 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला जिसने अपनी बहू को खो दिया, उन्होंने कहा, "उसने मुझे अकेला छोड़ दिया। अब मेरी देखभाल कौन करेगा। मैं बिल्कुल अकेली हूं।"
राहत शिविरों में रह रहे लोग
स्कूलों, चर्चों, आंगनवाड़ियों और अन्य उपलब्ध संसाधनों में स्थापित राहत शिविरों में इन बचे लोगों को आश्रय दिया जा रहा है, जो मुख्य रूप से कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा से लगे पहाड़ी जिले अट्टामाला, मुंडक्कई और चूरलमाला से आते हैं।












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