केरल में खिल सकता है पहला 'कमल', हिंदू बहुल तिरुवनंतपुरम में मुश्किल में थरूर, BJP से कांटे की टक्कर
Trivandrum Lok Sabha Seat Kerala: केरल में इस बार बीजेपी ने अपनी पहली जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरा जोर लगा दिया है। राज्य की कुछ लोकसभा सीटों पर जहां उसे ज्यादा उम्मीदें हैं, उनमें केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम भी शामिल है।
त्रिवेंद्रम से कांग्रेस ने इस बार भी अपने कद्दावर नेता और तीन बार के सांसद शशि थरूर को उतारा है। वे यहां अबतक काफी लोकप्रिय माने जाते रहे हैं। लेकिन, जैसे-जैसे 26 अप्रैल की चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है, तिरुवनंतपुरम की चुनावी फिजा बदली-बदली महसूस होने लगी है।

थरूर के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर का जोर
आज की तारीख में तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट पर कांग्रेस के शशि थरूर और बीजेपी के प्रत्याशी और केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर में कांटे की टक्कर की स्थिति है। थरूर के खिलाफ जो बात जा रही है, उनमें से सबसे बड़ी ये है कि वो 15 वर्षों से लगातार यहां का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और इसके चलते उनके पीछे एक तगड़ा एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर काम कर रहा है।
थरूर भी बीजेपी उम्मीदवार से मान रहे हैं चुनौती
जानकार बताते हैं कि त्रिवेंद्रम में इस समय बीजेपी के पक्ष में बहुत ही मजबूत अंडरकरंट महसूस हो रहा है। थरूर चौथी बार यहां से जीत के लिए अपने विकास कार्यों के नाम पर वोट मांग रहे हैं। वह एलडीएफ को अपने लिए चुनौती नहीं मान रहे। लेकिन, खुद स्वीकार करते हैं कि बीजेपी का चुनाव प्रचार अभियान बहुत ही 'ऊर्जा से भरा और पेशेवर' है।
बीजेपी से चुनौती की भड़ास लेफ्ट पर निकाल रही है कांग्रेस
भाजपा के चुनाव अभियान ने उन्हें इस कदर परेशान किया है कि वह सत्तादारी वामपंथी गठबंधन पर बीजेपी-विरोधी वोट बांटने का आरोप लगाने लगे हैं। लेकिन, थरूर के लिए अकेले यही सब चुनौतियां नहीं हैं।
कांग्रेस के अंदरूनी संकट से भी बढ़ी थरूर की परेशानी
त्रिवेंद्रम में उन्हें कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी का भी सामना करना पड़ रहा है। यह गुटबाजी केरल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के सुधाकरन और विपक्ष के नेता वीडी सतीसन के बीच नजर आती है। वहीं स्थानीय कांग्रेस नेता जिस तरह से भाजपा में शामिल हुए हैं, उससे पार्टी के सामने मुश्किल ही मुश्किल खड़ी हुई है।
'स्थानीय मुद्दों से दूर रहने से थरूर को नुकसान हो सकता है'
जहां तक एंटी-इंकंबेंसी की बात है तो कुछ मतदाताओं की शिकायत है कि तीन-तीन बार के सांसद होने के बावजूद उन्होंने क्षेत्र में कोई खास काम नहीं किया है। उनके लिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी पहले जैसे जोश की कमी नजर आ रही है। कथित रूप से पार्टी कार्यकर्ताओं की ओर से उम्मीदवार बदलने की भी मांग हो रही थी।
द हिंदू अखबार के संपादक गौरी दास नायर का कहना है कि 'त्रिवेंद्रम में शशि थरूर के लिए इस बार पहले जैसा आसान नहीं है। चौथी बार वे यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। स्थानीय मुद्दों से दूर रहने से उन्हें नुकसान हो सकता है। लोग मानते हैं कि वे राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय थे, लेकिन यहां के मुद्दों पर भी सक्रिय रहना था।'
महिला मतदाताओं ने भी थरूर से मुंह फेरा!
शशि थरूर को लगातार तीन बार सांसद बनाने में त्रिवेंद्रम की महिला मतदाताओं की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन, इस बार वह भी उनके पक्ष में पहले की तरह उत्साहित नहीं दिख रही हैं। कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव प्रचार में अपने रोडशो पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं।
तिरुवनंतपुरम में चुनाव प्रचार में भारी पड़ रही है बीजेपी
जबकि, बीजेपी प्रत्याशी चंद्रशेखर सेमीनार, लोगों के साथ बैठकों और प्रेस कांफ्रेंस के अलावा घर-घर जाकर भी अपनी बात रख रहे हैं। खासकर बीजेपी ने बूथ स्तर पर अपने प्रचार पर जैसा जोर दिया है, उससे लग रहा है कि जमीन पर वह कांग्रेस से आगे निकल चुकी है।
2014 याद करेंगे तो और चिंतित होंगे कांग्रेस के शशि थरूर
2019 में थरूर की जीत का फासला भाजपा प्रत्याशी से जरूर ज्यादा था, लेकिन तथ्य यह है कि 2014 में पार्टी के बुजुर्ग उम्मीदवार ओ राजगोपाल से वह करीब 2% मतों से ही आगे रह गए थे।
भाजपा को बहुसंख्यक हिंदू मतों पर भरोसा
बीजेपी मुख्य रूप से हिंदू वोटों पर फोकस कर रही है, जो कि 2019 के चुनाव में वहां करीब 76.8% थे। इसके अलावा भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा है, जो बीते दिनों से लगातार यहां के दौरे पर आ रहे हैं।
नादर और मछुआरा समुदाय के बीच सक्रिय है बीजेपी
त्रिवेंद्रम की राजनीति में नादर समुदाय की अपनी खास भूमिका है। बीजेपी ने उनका भरोसा जीतने के लिए विझिंजम जैसे इलाकों पर काफी फोकस कर रखा है, जो इस समुदाय का गढ़ माना जाता है। इनके अलावा बीजेपी ने उन लैटिन कैथोलिक ईसाई वोटरों तक भी पहुंचने की कोशिश की है, जो मूल रूप से मछुआरे समाज से आते हैं।
जहां मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस तटवर्ती समुदाय पर कांग्रेस की पकड़ ढीली पड़ी है, वहीं बीजेपी के चंद्रशेखर उनसे सीधे बात कर रहे हैं और पक्का मकान देने के साथ-साथ बोट के लिए सस्ता और स्वच्छ ईंधन देने का भी वादा कर रहे हैं।
पहली बार सबसे बड़े चुनावी संकट में थरूर!
त्रिवेंद्रम में ज्यादातर शहरी मतदाता हैं। अगर पिछले वोटिंग पैटर्न को देखा जाए तो इनमें से बड़ी तादाद तटस्थ मतदाताओं की है, जो राजनीतिक दलों के बजाए उम्मीदवारों की क्षमता को देखकर वोट देना पसंद करते हैं। इस मामले में पहली बार थरूर को एक बहुत ही सक्षम और मजबूत उम्मीदवार का सामना करना पड़ रहा है।
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