केरल की कचरा प्रबंधन प्रणाली: विशेषज्ञों ने कहा- तत्काल बदलाव ज़रूरी
केरल में अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली को लेकर गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। पर्यावरण पत्रकार एम. सुचित्रा और अपशिष्ट प्रबंधन विशेषज्ञ सी. सुरेंद्रनाथ के अनुसार, राज्य में तेजी से हो रहे शहरीकरण, बढ़ते कचरे की मात्रा और पर्यावरणीय क्षरण ने इस मुद्दे को और जटिल बना दिया है। मार्च 2023 में ब्रह्मपुरम में लगभग 800,000 टन असुरक्षित कचरे के जलने की घटना ने इन समस्याओं को उजागर किया, जिससे कोच्चि 12 दिनों तक धुएं में डूबा रहा।

ब्रह्मपुरम आपदा के बाद, राज्य सरकार ने स्रोत पर कचरे को अलग करने और डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण जैसी पहल शुरू की। हालांकि, विश्वसनीय डेटा की कमी और अपशिष्ट संरचना की जटिलता जैसी बाधाएं अब भी मौजूद हैं। ये प्रयास राज्य की अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली में सुधार लाने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
नीतिगत कमियों और बुनियादी ढांचे की चुनौतियां
"विषाक्त धुएं से घुटन - ब्रह्मपुरम अपशिष्ट आपदा और केरल में नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन" शीर्षक वाली रिपोर्ट ने राज्य की अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली में नीतिगत और बुनियादी ढांचे की कमियों को रेखांकित किया है। इसमें अपर्याप्त सुविधाएं, मौजूदा संसाधनों का सीमित उपयोग, कचरे को अलग करने और निपटान प्रक्रिया की कमी, धन का दुरुपयोग और स्थानीय स्तर पर व्यापक योजनाओं का अभाव शामिल है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2017 से केरल में नगरपालिका कचरे का उत्पादन 3.7 मिलियन टन पर स्थिर है। हालांकि, प्लास्टिक प्रदूषण, ई-कचरा प्रबंधन नियमों का कमजोर अनुपालन और विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (ईपीआर) नीति का सीमित कार्यान्वयन इस स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। ये समस्याएं शहरी विकास के दबावों के बीच राज्य की रणनीति में महत्वपूर्ण खामियों को उजागर करती हैं।
पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास
रिपोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण और विकासात्मक आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। अक्सर देखा गया है कि शून्य-अपशिष्ट महत्वाकांक्षाएं नवउदारवादी विकास पथ से टकराती हैं, जो बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर केंद्रित है। राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका विकास मॉडल पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के साथ जुड़ा हुआ हो।
राज्य को प्लास्टिक प्रदूषण, अविश्वसनीय डेटा और अपशिष्ट-से-ऊर्जा (डब्ल्यूटीई) संयंत्रों की अस्थिरता जैसी समस्याओं का समाधान करना होगा। इन चुनौतियों से निपटकर ही केरल एक अधिक टिकाऊ भविष्य की ओर बढ़ सकता है।
स्थिरता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि विकासात्मक योजनाएं पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दें। इससे राज्य समावेशी और टिकाऊ प्रगति सुनिश्चित कर सकता है, जिसमें पर्यावरणीय सुरक्षा एक अभिन्न हिस्सा बनी रहेगी।












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