केरल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: 25 साल पुराने महिला IFS शील भंग मामले में पूर्व मंत्री बरी, जानें क्यों?

Kerala High Court: केरल उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में पूर्व वन मंत्री नीलालोहितदासन नादर को 1999 के शील भंग मामले में बरी कर दिया। यह मामला, जो पिछले 25 साल से कानूनी जंग का हिस्सा था, सोमवार को न्यायमूर्ति कौसर एडापगथ की एकल पीठ ने सुनवाई के बाद समाप्त कर दिया।

कोझिकोड में एक महिला भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी ने नादर पर शील भंग का आरोप लगाया था, जिसके बाद यह केस सुर्खियों में आया था।

Kerala High Court

क्या था पूरा मामला?

1999 में कोझिकोड के सरकारी गेस्ट हाउस में हुई एक घटना को लेकर महिला IFS अधिकारी ने नादर पर गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत के मुताबिक, 27 फरवरी 1999 को जब वह नादर से मिलने पहुंची थीं, तब पूर्व मंत्री ने उनके साथ यौन संबंध बनाने की कोशिश की थी। इस घटना के बाद नादर को वन और परिवहन मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

कोझिकोड की निचली अदालत ने 2002 में नादर को एक साल की सजा सुनाई थी, जिसे 2005 में सत्र अदालत ने घटाकर तीन महीने कर दिया। इसके बाद नादर ने इस फैसले को केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट का फैसला: शिकायत पर उठाए सवाल

केरल हाई कोर्ट ने मामले की गहन सुनवाई के बाद नादर को बरी करने का फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि शिकायत दर्ज करने में दो साल से अधिक की देरी हुई थी। महिला अधिकारी ने 25 मार्च 2001 को पुलिस महानिदेशक को शिकायत सौंपी थी, जिसके आधार पर 9 मई 2001 को FIR दर्ज की गई।

शिकायतकर्ता ने दावा किया कि वह नादर के खिलाफ शिकायत दर्ज करने से डर रही थीं, क्योंकि वह उनके विभाग के प्रमुख थे। उन्होंने नादर के 2000 में इस्तीफे के बाद शिकायत दर्ज करने का फैसला लिया।

हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता का डर और धमकियों का दावा अस्पष्ट और बिना सबूतों के है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता के बयानों में कई बार बदलाव किए गए, और उनके कोर्ट में दिए गए बयान पुलिस को दिए गए शुरुआती बयान से मेल नहीं खाते। न्यायमूर्ति ने कहा, "शिकायतकर्ता की गवाही को गहन जांच और कानूनी मानदंडों के आधार पर परखने के बाद यह स्पष्ट है कि उन्हें 'विश्वसनीय गवाह' नहीं माना जा सकता। उनकी गवाही बिना किसी पुष्टि के स्वीकार नहीं की जा सकती, और इसे दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।"

कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को पलटा

हाई कोर्ट ने निचली अदालत और सत्र अदालत के फैसलों को गलत ठहराते हुए कहा कि साक्ष्यों और कानूनी आधारों पर नादर की दोषसिद्धि उचित नहीं है। कोर्ट ने नादर को संदेह का लाभ देते हुए कहा, "यह एक ऐसा मामला है जहां याचिकाकर्ता को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। निचली अदालत और अपीलीय अदालत के फैसले को रद्द किया जाता है।" इसके साथ ही, नादर को IPC की धारा 354 के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

Who Is Neelalohithadasan Nadar : कौन हैं नीलालोहितदासन नादर?

पुल्लुविला के मूल निवासी नादर जनता दल और जनता दल (सेक्युलर) से जुड़े रहे हैं। उन्होंने 1999-2000 तक एलडीएफ सरकार में वन और परिवहन मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके अलावा, वह 1980 से 1984 तक लोकसभा सांसद भी रहे। इस मामले के बाद उनकी राजनीतिक छवि को गहरा धक्का लगा था।

क्या है इस फैसले का असर?

25 साल बाद आए इस फैसले ने न केवल नादर को राहत दी है, बल्कि इसने लंबे समय तक चलने वाले कानूनी मामलों में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और समयबद्धता पर सवाल उठाए हैं। यह मामला अब सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया है, जहां लोग इस फैसले पर अलग-अलग राय जता रहे हैं। क्या यह फैसला पीड़ितों की आवाज को कमजोर करेगा, या यह कानूनी प्रक्रिया में साक्ष्यों की मजबूती को रेखांकित करता है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं!

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